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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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परिवर्तन होगया है। संभव है कि गीता युगमें इसका स्मरण रहा हो और भगवानने पूर्व परंपराके अनुसार वर्षारंभके मासको महत्व देकर "मैं मार्गशीर्ष मासोंमें" ऐसे कहा हो। गीता अ० १०. श्लो० ३५-ऋतूमें कुसुमाकर- ऋतु छ हैं और सौर-मासको ऋतु कहते हैं। इन ऋतुओंको (१) वसंत (२) ग्रीष्म (३) वर्षा (४) शरद् (५) हेमंत (६) शिशिर ऐसे नाम हैं। चैत्र-वैशाख वसंतऋतु ! ऐसी इनकी गणना होती है। वर्षके विविध मौसम इस अर्थमें ऋतु शब्द ऋग्वेदमें भी कई बार आया है। किंतु ऋग्वेदमें केवल तीन ऋतुओंकी कल्पना है। चार महीनेका एक ऋतु। वसंत ग्रीष्म शरद् ये उनके नाम हैं। आगे चल कर पांच और छ ऋतु हो गये। ऋग्वेदमें भी वसंत मुख्य ऋतु ऐसे स्वतंत्र रूपसे कहा गया है। तैत्तिरीय ब्राह्मणमें संवत्सरको एक पक्षी मानकर उसका शिर वसंत। ग्रीष्म दहिना पंख। वर्षा है पुच्छ। शरद् बायां पंख। हेमंत है मध्य। ऐसा वर्णन किया है। अर्थात् संवत्सरका शीर्षस्थ वसंत विभूति कही गयी है ! गीता अ० १०. श्लो० ३५-द्यूत मैं छलियोमें हूं- धोखे बाजीमें, धूर्तताके व्यवहारमें भी चातुरी होती है। बुद्धिकी चमक होती है। और जूआ या द्यूत इसका आदर्श है। यह अत्यंत प्राचीन खेल है। इसको द्यूत-क्रीडा कहते हैं। इस खेलके लिये अलग स्वतंत्र स्थान होते थे। जिन्हे द्यूत-सभा कहा जाता था। आज भी जूएके अड्डे स्वतंत्र होते हैं ! जुआरी लोग वहां जमते हैं। पहले इसके प्रमुखको "सभिक" कहते थे। जैसे द्यूतक्रीडा अत्यंत प्राचीन-कालसे चली आयी है वैसे ही "द्यूत-क्रीडा बुरी है!" यह भावना भी ऋग्वेद कालसे देखनेको मिलती है। ऋग्वेदका "कवष ऐलूष" नामका ऋषि द्यूत क्रीडाकी अनेक बुराइयोंका वर्णन करके द्यूत-क्रीडा त्याग कर खेती करनेका संदेश देता है। द्यूत-क्रीडाकी बुराई कहते समय "उनके हाथ नहीं किंतु जिनके हाथ हैं ऐसे पुरुषोंको वे निकम्मा बनाता है। दीन बनाता है। वह हाथको शीतल लगता है किंतु कलेजा जला देता है !" ऐसे कहा है। मनुस्मृतिमें द्यूतको अठारह निषिद्ध व्यसनोंमें एक गिना है। वहां विनोदके लिये भी द्यूतका निषेध किया है। भारतके प्राचीन साहित्यमें अक्ष-क्रीडा द्यूत-क्रीडा नामसे जूएका विस्तृत वर्णन है। साथ ही साथ इससे जिनका सर्वनाश हुवा उनका हृदयद्रावक वर्णन भी। द्यूत यह प्रभुका विनाशकारी छलनामय विभूति है अवकृपाका द्योतक ! गीता अ० १०. श्लो० ३७-वासुदेव, धनंजय परिशिष्ट पहलेमें-देखिये- गीता अ० १०. श्लो० ३७-व्यास मैं मुनियोंमें हूं- मुनि मनन करनेवाले। चिंतन मनन करके मूलभूत सिद्धांत तक जानेवालोंको मुनि कहा गया है। इन मुनियोंमें बादरायण व्यास सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। व्यास-पराशर सत्यवतीका पुत्र। पराशर वसिष्ठऋषीका पोता। इस लिये व्यास वसिष्ठ-कुलका था। इनका जन्म यमुना द्वीपमें हुवा था। इसलिये इनको द्वैपायन अथवा द्वैपायन व्यास कहते हैं। कृष्ण द्वैपायन भी कहा गया है। साथ साथ इनका जन्म बोरीवनमें हुवा था सो बादरायण भी कहा गया है। इनके गुरुका नाम विष्वक्सेन। इन्होंने सत्य शब्द पर विचार किया है। ७९ परिशिष्ट ३