ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेद मंत्रोंको ही छंदस् कहा गया है। सामान्यतया सभी वैदिक छंद अक्षरछंद हैं मात्रा छंद नहीं । अवेस्तामें भी सभी अक्षर छंद हैं। किंतु उदात्त अनुदात्त स्वर यह वेदका वैशिष्ट्य है। अर्थ निश्चितीमें इन स्वरोंका महत्व माना जाता है। साथ साथ पठनमें संगीतका भास होता है। इसके बाद वैदिक छंदःशास्त्रका पर्याप्त विकास हुआ है। आठ अक्षरोंके अनुष्टुप छंदसे आगे अनेक प्रकारके छंद बनते गये हैं। अनुष्टुप् यह सबसे छोटा और सरल छंद है। कुछ विद्वानोंका कहना हैं कि यह छंद भारतीय संस्कृति और धार्मिक साहित्यका हृदय है। पिंगलाचार्य अथवा पिंगलनागके छंदःसूत्रोंको प्राचीन छंदःशास्त्र माना जाता है। इसमें प्राचीन वैदिक छंद और अन्य लौकिक छंदोंका विचार किया गया है। इसके बाद काव्य कालमें प्रथम प्रथम यही आर्ष छंद लिये गये हैं। किंतु इस समय इसमें कुछ सुधार भी किये गये हैं। जैसे अनुष्टुपका पांचवा अक्षर लघु हो । छठा दीर्घ हो आदि ! त्रिष्टुभ जगती आदिमेंसे कुछ अन्य छंदोंका अथवा इन्हींकी शाखाओंका विकास हुआ। कालिदासादि महाकवियोंने अपने काव्योंमें वैदिक वातावरण साकार करनेके लिये त्रिष्टुभ आदि छंदोंका उपयोग किया है। इन्हीं वैदिक छंदोंमेंसे कुछ वृत्तोंका विकास हुआ जैसे वैदिक अनुष्टुपमेंसे विद्युन्माला अथवा त्रिष्टुभमेंसे इंद्रवज्रा आदि। आगे काव्य-नाटककी दृष्टिसे भरतमुनिने इसका विचार और विकास किया। आगे अनेक लोगोंने छंदःशास्त्र लिखा। भारतकी विविध भाषाओंमें अनेक विद्वानोंने उन उन भाषाओंके छंद-शास्त्र पर पुस्तकें लिखी हैं। जैसे कन्नडके प्रा. कर्की मराठीके प्रा. माधवराव पटवर्धन, हिंदीके प्रा. पुत्तुलाल शुक्ल, गुजरातीके प्रा. नारायणभाई पाठक, बंगळके श्री. मोतीलाल मुजुमदार आदि विद्वानोंने इस पर खूब विचार विमर्श किया है। अर्थात् इ० पू० ४०००-६००० वर्षोंसे आज तक इस शास्त्रका विकास होता आया है और इन सभी छंदोंमें— गायत्री— महान् है । वेदके सात विशिष्ट छंदोंमें वह पहला है। गायत्रीका अर्थ वाणीकी रक्षा करनेवाला ऐसा होता है। गायत्रीका और एक अर्थ “गानेवालेका गाना” ऐसा भी होता है। शतपथ ब्राह्मणमें “कृतकृत्य भावसे पृथ्वी गाने लगी तभी उसे गायत्री कहा गया!” ऐसा कहा है। ऐतरेयब्राह्मणमें “गायत्री सुवर्णपक्षिणीका रूप लेकर स्वर्गसे सोम लायी” ऐसा लिखा है। गायत्री छंदके तीन चरण होते हैं। प्रत्येक चरणमें आठ अक्षर होते हैं। इसलिये इसे “अष्टाक्षरी गायत्री” भी कहते हैं। कभी कभी गायत्रीके उच्चारके पहले प्रणवोच्चार करनेकी भी परिपाटी है। ऋग्वेदमें २४६७ मंत्र इस छंदमें हैं। सामान्यतया अग्नि सूक्त इसी छंदमें हैं। ऋग्वेदका महान गायत्री मंत्र इसी छंदमें हैं। वह मंत्र हिंदीमें गायत्री छंदमें ऐसा होगा। वरणीय तू सविता तेज दे अवर्णनीय। उद्बोधन कर धी को ॥ गायत्री मंत्रके प्रथम ओंकारका उच्चार होता है तथा “भूर्भुवस्स्वः” कहा जाता है। उपनयनमें गायत्री मंत्रका उपदेश दिया जाता है। गीता अ० १०, श्लो० ३५-में मार्गशीर्ष मासोंमें— लोकमान्य तिलकजीने गीतामें भगवानने मैं मार्गशीर्ष मासोंमें ऐसे क्यों कहा है? इसका विचार करते हुए ओरायनमें लिखा है “आजसे ६०००-८००० वर्ष पूर्व मार्गशीर्षसे वर्षारंभ होता था। तथा मार्गशीर्षमें वसंत ऋतु आता था।” हजारों वर्षोंकी इस कालावधीमें ऋतु मानमें पर्याप्त ज्ञानेश्वरी ५५