भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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द्वंद्व समास-द्वंद्व समासके तीन प्रकार हैं। समाहार द्वंद्व, वैकल्पिक द्वंद्व, इतरेतर द्वंद्व । इस समासके सर्व शब्द समान महत्त्वके होते हैं। तथा इस समाससे जो सामासिक शब्द बनता है उसमें सर्वार्थ समावेश होता है। जैसे कृष्ण और अर्जुन कृष्णार्जुन अथवा कर्ण और अर्जुन कर्णार्जुन । कृष्णार्जुन और कर्णार्जुन भावनाकी दृष्टिसे उत्तरध्रुव और दक्षिणध्रुव है। कृष्णार्जुन द्वंद्वमें प्रेमजन्य अद्वैत है। और कर्णार्जुन द्वंद्वमें विरोधजन्य द्वैत है। यह द्वंद्व समास द्वैत और अद्वैत दोनोंको अपनेमें समालेता है अथवा पचालेता है। यही परमात्म-तत्त्वकी विशेषता है। परमात्म तत्त्व द्वैत और अद्वैत दोनोंमें पूर्ण है। जीवनमरण, बंधमोक्ष, ये परस्पर विरोधी द्वंद्व उत्तरध्रुव और दक्षिणध्रुवको एकत्र लाते हैं। मानो कहते हों एकही "वस्तुके दो छोर हैं!" इसमें भी ऐक्य है। जैसे दो आँखें एक देखती हैं, दो होंठ एक बोलते हैं, दो कान एक सुनते हैं, दो पैर एक चलते हैं। विरोधमें एकता द्वंद्व समासकी विशेषता है। वैसे ही आचारविचार, मातापिता, आदि एकताका द्वंद्व है। यहां अद्वैतमें द्वैत है। और द्वैतमें अद्वैत। मैं हूं द्वंद्व समासोंमें कह कर परमात्माने द्वैत और अद्वैतको अपनेमें पचा लिया है। मै दोनोंमें और दोनोंसे परे कहा है। गीता अ० १०, श्लो० ३४-सर्वनाशक मैं मृत्यु- नाशका अर्थ रूपका बदलना। विश्वमें जो कुछ बनता है अर्थात आकार लेता है वह नष्ट होता है। इस नाशको संहार कहा गया है। जो कुछ आकार लेता है उस सबको नाश करनेवाली सर्व-नाशक जो शक्ति अथवा देवता है उसको मृत्यु कहा गया है। ब्रह्माने इसका निर्माण करके समय पर संहार कार्यकरनेकी आज्ञा दी तो मृत्युने प्राणियोंको दुःख देनेवाला कार्य मुझसे नहीं होगा कहकर तपस्या करना प्रारंभ किया। इस तपसे प्रसन्न ब्रह्माने वर मांगनेको कहा तो मृत्युने 'जगतसंहारका काम मेरे पास न हो' का वर मांगा तब ब्रह्माने तू विश्व-नाशका प्रत्यक्ष कारण नहीं बनेगी "अप्रत्यक्ष कारण" तेरा काम करेंगे! ऐसा वर दिया। इसी मृत्यु देवताने नचिकेताको ब्रह्मविद्या सिखाई। यहां मृत्युके विषयमें तात्त्विक विवेचन हुआ है। मृत्यु स्वतंत्र नहीं है। वह भी परतंत्र है। वह "बिना कोई बहाना मिले" मृत्यु अपना कार्य नहीं कर सकता। गीता अ० १०, श्लो० ३५-गायत्री सब छंदोंमें- "मानवी भाषाकी प्राथमिक अवस्था गुनगुनानेकी भांति थी" ऐसे कुछ विद्वानोंकी मान्यता है। और सामान्यतया किसी भी भाषाके प्रारंभिक ग्रंथ पद्यमय ही मिलते हैं। विश्व-साहित्यका आदि ग्रंथ ऋग्वेद पद्यमय है। छंदोबद्ध है। ग्रीक लोगोंका सर्वप्राचीन ग्रंथ भी पद्यमय अर्थात् छंदोबद्ध है। होमरके पूर्ववर्ती भी कुछ कवि हो गये थे ऐसी जानकारी होमरके "इलीयड" काव्यग्रंथमेंसे मिलती है। पर्सियाका वेदतुल्य साहित्य अवेस्ता भी छंदोबद्ध है। हिब्रू लोगोंका धर्मग्रंथ, लेटीन भाषाके प्राचीन ग्रंथ भी छंदोबद्ध हैं। भारतके प्राचीनतम ऋग्वेद संहितामें (१) अतिजगती (२) अतिधृति (३) अतिशक्करी (४) अत्यष्टि (५) अनुष्टुप (६) अष्टि (७) उष्णिक् (८) एकपाद (९) ककुभ (१०) गायत्री (११) जगती (१२) त्रिष्टुभ् (१३) द्विपाद (१४) धृति (१५) पंक्ति (१६) प्रगाथबर्हत (१७) बृहती (१८) महाबर्हत (१९) शक्करी; ये उन्नीस छंद हैं। ७७ परिशिष्ट ३