ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअर्थ करनेवाले नैयायिकोंने “वर्णका स्मरण कर देनेवाला लिपि प्रकार” ऐसा इसका अर्थ किया तो वेदांतमें “परब्रह्म” कहा है और स्वयं गीतामें ओंकार वेद सार तथा ईश्वर ऐसा वर्णन किया है। किंतु कुछ प्राचीन पोथियोंमें “छः महीने बाद ज्ञानके विषयमें भ्रम होता है, संदेह निर्माण होता है। इसलिये अक्षर पत्रारूढ किये।” ऐसा लिखा गया है। विश्वकी विविध भाषाओंकी ध्वनियोंको व्यक्त करनेवाले चिन्होंको अक्षर कहते हैं। साहित्यमें अक्षरके विषयमें “ध्वन्यात्मक” और “सांकेतिक” ऐसे दोनों अर्थ मिलते हैं। ऋग्वेदमें वर्णमालाको अक्षर कहा गया है। विद्वा- नोंका यह मंतव्य है कि ऋग्वेदकालमें तराशकर अक्षर लिखते होंगे ! क्यों कि वहां अक्षरका अर्थ न फैलनेवाला न पिघलनेवाला ऐसा है ! उस समयके अक्षर ध्वन्यात्मक न होकर संकेतात्मक होंगे। अक्षरोंमें स्वर और व्यंजन ऐसे दो प्रकार हैं। स्वर दीर्घ, लघु तथा प्लुत ऐसे तीन प्रकारके होते हैं। दीर्घ स्वरांत अक्षर गुरु कहलाता है तो ह्रस्व स्वरांत अक्षर लघु कहलाता है। तीन मात्राओंका अक्षर प्लुत कहाता है। ध्वन्यात्मक तथा वर्णात्मक अक्षरोंका विकास लेखन कलाका विकसित रूप है। इन वर्णोंमें शुभ अशुभ तथा दग्ध ऐसे तीन प्रकार किये गये हैं। काव्य-शास्त्र के ग्रंथोंमें कहा गया है कि काव्यारंभ अशुभ अक्षरसे नहीं होना चाहिये । सभी अक्षर अ. क. च. ट. त. प. य. श. इन आठ वर्णोंमें विभाजित किये गये हैं। प्रत्येक वर्गका एक देवता है। उसका फल है। जैसे— अ. सोम, आयुर्वृद्धि, क, अंगारक, कीर्ति, च. बुध धनप्राप्ति. ट. गु, सौभाग्य, त, शुक्र, कीर्ति प. शनि मंदता. य. सूर्य, मृत्यु, श, राहु, शून्यता इसके अलावा ज्योतिष्य आदि शास्त्रोंमें, अक्षर-संकेतादि अलग शास्त्र ही है। अ—आदिवर्ण है। वाङ्मयका आदि बीज है। प्रणवकी पहिली मात्रा है। वैसे ही अ नेति नेति सूचक भी है। देवताओंमेंसे ब्रह्मा, शिव, वायु, तथा वैश्वानर=अग्नि इनका बोधक है। नानार्थ मंजरीमें : (१) ज्वाला (२) मंत्र (३) पर्जन्य (४) रथका घोडा (५) चक्र (६) मुर्गेका सिर (७) चंद्रबिंब (८) ब्रह्मा (९) शिव (१०) विष्णु अ के इतने अर्थ कहे गये हैं। यह अ सभी भाषाओंके अक्षरोंमें प्रथमाक्षर है। वह कंठ्य अक्षर है। पाणिनीके अनुसार इसके अठारह उच्चार भेद होते हैं। तंत्र-शास्त्रानुसार अ : इस अक्षरमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा उनकी शक्तियां महासरस्वती, महालक्ष्मी तथा महाकाली विद्यमान है। चित्तकी एकाग्रताके लिये इस अक्षरका जाप कहा गया है। गीता अ० १०. श्लो० ३३-मैं हूं द्वंद्व समासोंमें— दो या दोसे अधिक शब्दोंमें आनेवाले प्रत्यय अव्यय आदि हटा कर दो या दोसे अधिक शब्दोंको जोडकर एक शब्द तैयार करनेको समास कहते हैं। और ऐसे शब्दोंको सामासिक शब्द । इस प्रकार शब्दोंको जोडनेके तीन प्रकार हैं। (१) जिसमेंसे सभी शब्द समान योग्यताके होते हैं वह (२) जिसमें पहलेके पद गौण हो कर बादके मुख्य होते हैं वह (३) तथा जिनमें पहले मुख्य हो कर बादके गौण होते हैं वह । इनमें तत्पुरुष, बहुव्रीहि, अव्ययीभाव तथा द्वंद्व ऐसे चार प्रकारके समास होते हैं। इनमेंसे प्रत्येकमें अन्य अनेक उप-विभाग हैं। ज्ञानेश्वरी ७३