ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलोगोंको इस नदीके विषयमें आदर है। भक्ति है। आत्मीयता है। भारतके गांव गांवमें गंगाजलसे भरा कलश रहता है जिससे मरते समय गंगाजल दे सकें। भारतके आचार्योंने, संतोंने, मनीषियोंने कवियोंने, साहित्यिकोंने इसको वंदन करके इसके गुण गाये हैं। गंगानदी भारतीय संस्कृतिका तथा एकताका प्रतीक बन गयी है। गीता अ० १०. श्लो० ३२-विद्याओंमें अध्यात्म मैं— विद्या—विद्याका अर्थ है जानना। प्रयत्न पूर्वक जानकारी प्राप्त करना। जानकारी प्राप्त करनेकी इस प्रक्रियाको विद्याध्ययन कहते। देखना, सुनना, पाठ करना, स्मरण रखना, चिंतन करना, मनन करना, प्रयोग करना और अनुभवना ये अध्ययनके प्राचीन साधन। फिर इसमें और एक साधन, वाचन आ गया। सुनकर पाठ करनेके स्थानपर पढकर स्मरण रखनेकी प्रक्रिया भी इसमें जुड गयी। इस प्रकारकी विद्याके "प्राचीन पोथियोंमें चौदह प्रकार गिने हैं। किंतु आगे चलकर इसके प्रकार बदले भी हैं। प्रथम चार वेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद अथर्ववेद-छ वेदांग-छंद, शिक्षा, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, और कल्प, शास्त्र-न्याय, मीमांसा, पुराण, धर्मशास्त्र, ऐसे चौदह विद्याओंकी इस तालिकामें कुछ परिवर्तन होकर आगे (१) आत्मज्ञान, (२) वेदज्ञान (३) धनुर्विद्या, (४) लेखन, (५) गणित (६) शस्त्रविद्या (७) तैराकी (८) बुनना (९) वैद्यक (१०) ज्योतिष (११) संगीत (१२) रमल (१३) पाकविद्या (१४) गारुडी विद्या ये चौदह विद्याएँ बनीं और आगे इसमें भी परिवर्तन होकर (१) ब्रह्मज्ञान (२) रसायन (३) श्रुतिकथा (४) वैद्यक (५) नाट्य (६) ज्योतिष (७) व्याकरण (८) धनुर्विद्या (९) जलतरण (१०) कामविद्या (११) सामुद्रिकज्ञान (१२) तंत्रविद्या (१३) मंत्रविद्या (१४) चौर्य-विद्या!! ये १४ विद्याएँ बनीं! इन चौदह विद्याओंमें कब कैसे और क्यों परिवर्तन होते गये यह संशोधन करनेवालोंका काम हैं। इनमें— अध्यात्मविद्या—आत्म-स्वरूपके विषयमें जानना। आत्म-बोध होना। ब्रह्मकी अथवा आत्माकी सहज-स्थितिको अध्यात्म कहा गया है। जिस ज्ञानसे प्रापंचिक ज्ञानके परे परमात्मवस्तुका बोध होता है उसको अध्यात्म ज्ञान् कहा गया है। वैसे ही ब्रह्मांडके मूलभूत तत्वके अनुभवोंका विवेचन विश्लेषण करनेवाले शास्त्रको अध्यात्म-शास्त्र कहा गया है। उपनिषद गीता आदि अध्यात्म-विद्या और अध्यात्म शास्त्र है। समग्र ज्ञानेश्वरी अध्यात्म-विद्याका विस्तृत विवेचन करनेवाला सागर ही है। आत्मा क्या है? उस आत्माका बोध कैसे होता है? उसके लिये मनुष्यको क्या क्या करना चाहिए? यह सब उपनिषद् गीता, ज्ञानेश्वरी आदि ग्रंथोंमें भली भांति समझाया गया है। अन्य विद्याओंकी भांति यह केवल पठनसे नहीं जानी जाती। उसके लिये चिंतन और प्रयोग "अध्यात्म-विद्याके ये दो पाठ हैं"। इससे मनुष्यको आत्म-बोधकी अथवा आत्म-साक्षात्कारकी अवस्थाको प्राप्त करना है। इस अंतिम स्थितिको आत्म-ज्ञान, अपरोक्षानु- भूति, आत्म-बोध, आदि कहा गया है। गीता अ० १०. श्लो० ३३-अक्षरोंमें अकार मैं— अनेक शास्त्रोंने अक्षरके अनेक अर्थ कहे हैं। वस्तुतः जिसका क्षय नहीं होता, न पिघलने- वाला, न घुलनेवाला, अविकारी, नित्य, भावातीत्त आदि अक्षर शब्दका अर्थ है। प्रत्येक शब्दका ७५ परिशिष्ट ३