ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1020, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंनाथ तक, ऋग्वेदके सूक्तोंसे प्रादेशिक भाषाओंकी कविताओं तक, यह परंपरा सभी भाषाके कवियोंने निभाई है । देव-पूजाके समय पुजारी अपने अभिषेकके कलशमें गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी इन सप्त नदीका अधिष्ठान देखता है । भारतके प्रत्येक प्रदेशमें नदी पूजाकी परिपाठी है । पर्वकालमें सभी नदी स्नानके लिये आते हैं । वस्तुतः नदीके किनारों पर ही भारतीय संस्कृतिका जन्म और विकास हुआ है । मानो प्रत्येक नदी भारतीय संस्कृतिका एक एक प्रवाह है । इसमें गंगा नदीका विशेष महत्व है । गंगा—इस शब्दका अर्थ करनेवाले निरुक्तकारोंमेंसे किसीने “स्नान करनेवालोंको परमात्माके चरणों तक पहुंचानेवाली” ऐसा किया तो किसीने “मुमुक्षु-मोक्षार्थी जिसके पास जाते हैं वह गंगा !” ऐसा किया है। इसी नदीको विष्णुपदी, त्रिपथगा और भागीरथी कहा गया है। महादेवने अपने कमंडलुके पानीसे विष्णुके पैर धोये जिससे वह बहने लगी इस लिये इसे विष्णुपदी कहते हैं तो स्वर्ग मृत्यु पाताल इन तीनों लोकमें यह बहती है इसलिये त्रिपथगा कहते हैं और भगीरथ राजाकी तपस्यासे यह मृत्युलोक आयी थी इसलिये भागीरथी कहते हैं । सूर्यवंशके सगर राजाने कभी अश्वमेध यज्ञ किया था। इस घोडेके रक्षणमें उसके पुत्र थे । घोडा भटकते भटकते कपिल मुनिके आश्रममें गया। अश्वरक्षक उसको खोजते खोजते थक कर कपिलाश्रममें पहुंचे और मुनिने घोडेको चुराया इस भ्रमसे ध्यानस्थ मुनि पर हमला करने गये तो मुनिकी आंखें खुलतेही उस तेजसे जल कर राख हो गये । घोडेकी खोजमें सगरका पोता अंशुमान कपिलाश्रममें पहुंचा । उसको जब सारी बातकी जानकारी हुई तब उसने कपिलकी प्रार्थना की । प्रसन्न हृदय कपिलने अपने पितरोंके उद्धारके लिये स्वर्गके गंगाप्रवाहको भूतलपर लानेको कहा और अंशुमान हिमालयमें जा तपमें बैठ गया । अंशुमान तप करते करते वहीं खप गया इसके बाद योग्य समय देखकर उसके पुत्र दिलीपने पिताका अनुकरण किया और दिलीप भी हिमालयकी गोदमें सो गया तब उसके पुत्र भगीरथने पितामह और पिताके अधूरे कामको हाथमें लिया । वह इस महा कार्यमें यशस्वी हुवा । टेहरी गढवालके १३८०० फूट ऊंचे गंगोत्री पहाडसे इसका उगम होता है। इसको पुराणोंमें गोमुखी कहा है । इस प्रवाहको यहां भागीरथी कहते हैं। इसी प्रवाहसे कुछ आगे चलकर जान्हवी और अलकनंदाका प्रवाह मिलते हैं । इस स्थानका प्राचीन नाम मंदारगिरि है । आगे आगे इसमें अन्य अनेक प्रवाह आ मिलते हैं जिससे इस भागमें सप्त-संगम बने हैं । बदरीनाथमें विष्णुगंगा-सरस्वती ?-आती है । जोशी मठके पास धौलीगंगा विष्णुगंगासे आ मिलती है । विष्णु प्रयागके बाद इस संयुक्त प्रवाहको अलकनंदा कहते हैं । फिर नंदप्रयागमें मंदाकिनी अलकनंदासे आ मिलती है । कर्णप्रयागमें पिंडरगंगा इस प्रवाहमें आ मिलती है । रुद्रप्रयाग और देवप्रयागमें इन्ही नदियोंके दूसरे प्रवाह इसमें मिलते हैं । तब यह गंगाके नामसे आगे बहती है । हिमालयकी स्वर्ग भूमिसे यह हृषीकेशमें भूतलपर आती है । कनखलको गंगाद्वार कहते हैं । वहांसे यह दक्षिण वाहिनी होकर मेरठ, रोहलखंड, फरुखाबाद, अवध, प्रयाग, मिर्जापुर, वाराणसी, बलिया, पटना इस मार्गसे कलकत्तामें आकर समुद्रसे मिलती है । फरुखाबादमें रामगंगाका प्रवाह जो कूर्माचलकी ओरसे आता है गंगामें मिलता है । प्रयागमें गंगा और यमुनाका मिलन होता है । इस नदीको लोग प्रेम और पूज्य भावसे गंगा-मैया कहते हैं । सारे भारतवर्षके ज्ञानेश्वरी ७३