ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
नाथ तक, ऋग्वेदके सूक्तोंसे प्रादेशिक भाषाओंकी कविताओं तक, यह परंपरा सभी भाषाके कवियोंने निभाई है । देव-पूजाके समय पुजारी अपने अभिषेकके कलशमें गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी इन सप्त नदीका अधिष्ठान देखता है । भारतके प्रत्येक प्रदेशमें नदी पूजाकी परिपाठी है । पर्वकालमें सभी नदी स्नानके लिये आते हैं । वस्तुतः नदीके किनारों पर ही भारतीय संस्कृतिका जन्म और विकास हुआ है । मानो प्रत्येक नदी भारतीय संस्कृतिका एक एक प्रवाह है । इसमें गंगा नदीका विशेष महत्व है । गंगा—इस शब्दका अर्थ करनेवाले निरुक्तकारोंमेंसे किसीने “स्नान करनेवालोंको परमात्माके चरणों तक पहुंचानेवाली” ऐसा किया तो किसीने “मुमुक्षु-मोक्षार्थी जिसके पास जाते हैं वह गंगा !” ऐसा किया है। इसी नदीको विष्णुपदी, त्रिपथगा और भागीरथी कहा गया है। महादेवने अपने कमंडलुके पानीसे विष्णुके पैर धोये जिससे वह बहने लगी इस लिये इसे विष्णुपदी कहते हैं तो स्वर्ग मृत्यु पाताल इन तीनों लोकमें यह बहती है इसलिये त्रिपथगा कहते हैं और भगीरथ राजाकी तपस्यासे यह मृत्युलोक आयी थी इसलिये भागीरथी कहते हैं । सूर्यवंशके सगर राजाने कभी अश्वमेध यज्ञ किया था। इस घोडेके रक्षणमें उसके पुत्र थे । घोडा भटकते भटकते कपिल मुनिके आश्रममें गया। अश्वरक्षक उसको खोजते खोजते थक कर कपिलाश्रममें पहुंचे और मुनिने घोडेको चुराया इस भ्रमसे ध्यानस्थ मुनि पर हमला करने गये तो मुनिकी आंखें खुलतेही उस तेजसे जल कर राख हो गये । घोडेकी खोजमें सगरका पोता अंशुमान कपिलाश्रममें पहुंचा । उसको जब सारी बातकी जानकारी हुई तब उसने कपिलकी प्रार्थना की । प्रसन्न हृदय कपिलने अपने पितरोंके उद्धारके लिये स्वर्गके गंगाप्रवाहको भूतलपर लानेको कहा और अंशुमान हिमालयमें जा तपमें बैठ गया । अंशुमान तप करते करते वहीं खप गया इसके बाद योग्य समय देखकर उसके पुत्र दिलीपने पिताका अनुकरण किया और दिलीप भी हिमालयकी गोदमें सो गया तब उसके पुत्र भगीरथने पितामह और पिताके अधूरे कामको हाथमें लिया । वह इस महा कार्यमें यशस्वी हुवा । टेहरी गढवालके १३८०० फूट ऊंचे गंगोत्री पहाडसे इसका उगम होता है। इसको पुराणोंमें गोमुखी कहा है । इस प्रवाहको यहां भागीरथी कहते हैं। इसी प्रवाहसे कुछ आगे चलकर जान्हवी और अलकनंदाका प्रवाह मिलते हैं । इस स्थानका प्राचीन नाम मंदारगिरि है । आगे आगे इसमें अन्य अनेक प्रवाह आ मिलते हैं जिससे इस भागमें सप्त-संगम बने हैं । बदरीनाथमें विष्णुगंगा-सरस्वती ?-आती है । जोशी मठके पास धौलीगंगा विष्णुगंगासे आ मिलती है । विष्णु प्रयागके बाद इस संयुक्त प्रवाहको अलकनंदा कहते हैं । फिर नंदप्रयागमें मंदाकिनी अलकनंदासे आ मिलती है । कर्णप्रयागमें पिंडरगंगा इस प्रवाहमें आ मिलती है । रुद्रप्रयाग और देवप्रयागमें इन्ही नदियोंके दूसरे प्रवाह इसमें मिलते हैं । तब यह गंगाके नामसे आगे बहती है । हिमालयकी स्वर्ग भूमिसे यह हृषीकेशमें भूतलपर आती है । कनखलको गंगाद्वार कहते हैं । वहांसे यह दक्षिण वाहिनी होकर मेरठ, रोहलखंड, फरुखाबाद, अवध, प्रयाग, मिर्जापुर, वाराणसी, बलिया, पटना इस मार्गसे कलकत्तामें आकर समुद्रसे मिलती है । फरुखाबादमें रामगंगाका प्रवाह जो कूर्माचलकी ओरसे आता है गंगामें मिलता है । प्रयागमें गंगा और यमुनाका मिलन होता है । इस नदीको लोग प्रेम और पूज्य भावसे गंगा-मैया कहते हैं । सारे भारतवर्षके ज्ञानेश्वरी ७३
लोगोंको इस नदीके विषयमें आदर है। भक्ति है। आत्मीयता है। भारतके गांव गांवमें गंगाजलसे भरा कलश रहता है जिससे मरते समय गंगाजल दे सकें। भारतके आचार्योंने, संतोंने, मनीषियोंने कवियोंने, साहित्यिकोंने इसको वंदन करके इसके गुण गाये हैं। गंगानदी भारतीय संस्कृतिका तथा एकताका प्रतीक बन गयी है। गीता अ० १०. श्लो० ३२-विद्याओंमें अध्यात्म मैं— विद्या—विद्याका अर्थ है जानना। प्रयत्न पूर्वक जानकारी प्राप्त करना। जानकारी प्राप्त करनेकी इस प्रक्रियाको विद्याध्ययन कहते। देखना, सुनना, पाठ करना, स्मरण रखना, चिंतन करना, मनन करना, प्रयोग करना और अनुभवना ये अध्ययनके प्राचीन साधन। फिर इसमें और एक साधन, वाचन आ गया। सुनकर पाठ करनेके स्थानपर पढकर स्मरण रखनेकी प्रक्रिया भी इसमें जुड गयी। इस प्रकारकी विद्याके "प्राचीन पोथियोंमें चौदह प्रकार गिने हैं। किंतु आगे चलकर इसके प्रकार बदले भी हैं। प्रथम चार वेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद अथर्ववेद-छ वेदांग-छंद, शिक्षा, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, और कल्प, शास्त्र-न्याय, मीमांसा, पुराण, धर्मशास्त्र, ऐसे चौदह विद्याओंकी इस तालिकामें कुछ परिवर्तन होकर आगे (१) आत्मज्ञान, (२) वेदज्ञान (३) धनुर्विद्या, (४) लेखन, (५) गणित (६) शस्त्रविद्या (७) तैराकी (८) बुनना (९) वैद्यक (१०) ज्योतिष (११) संगीत (१२) रमल (१३) पाकविद्या (१४) गारुडी विद्या ये चौदह विद्याएँ बनीं और आगे इसमें भी परिवर्तन होकर (१) ब्रह्मज्ञान (२) रसायन (३) श्रुतिकथा (४) वैद्यक (५) नाट्य (६) ज्योतिष (७) व्याकरण (८) धनुर्विद्या (९) जलतरण (१०) कामविद्या (११) सामुद्रिकज्ञान (१२) तंत्रविद्या (१३) मंत्रविद्या (१४) चौर्य-विद्या!! ये १४ विद्याएँ बनीं! इन चौदह विद्याओंमें कब कैसे और क्यों परिवर्तन होते गये यह संशोधन करनेवालोंका काम हैं। इनमें— अध्यात्मविद्या—आत्म-स्वरूपके विषयमें जानना। आत्म-बोध होना। ब्रह्मकी अथवा आत्माकी सहज-स्थितिको अध्यात्म कहा गया है। जिस ज्ञानसे प्रापंचिक ज्ञानके परे परमात्मवस्तुका बोध होता है उसको अध्यात्म ज्ञान् कहा गया है। वैसे ही ब्रह्मांडके मूलभूत तत्वके अनुभवोंका विवेचन विश्लेषण करनेवाले शास्त्रको अध्यात्म-शास्त्र कहा गया है। उपनिषद गीता आदि अध्यात्म-विद्या और अध्यात्म शास्त्र है। समग्र ज्ञानेश्वरी अध्यात्म-विद्याका विस्तृत विवेचन करनेवाला सागर ही है। आत्मा क्या है? उस आत्माका बोध कैसे होता है? उसके लिये मनुष्यको क्या क्या करना चाहिए? यह सब उपनिषद् गीता, ज्ञानेश्वरी आदि ग्रंथोंमें भली भांति समझाया गया है। अन्य विद्याओंकी भांति यह केवल पठनसे नहीं जानी जाती। उसके लिये चिंतन और प्रयोग "अध्यात्म-विद्याके ये दो पाठ हैं"। इससे मनुष्यको आत्म-बोधकी अथवा आत्म-साक्षात्कारकी अवस्थाको प्राप्त करना है। इस अंतिम स्थितिको आत्म-ज्ञान, अपरोक्षानु- भूति, आत्म-बोध, आदि कहा गया है। गीता अ० १०. श्लो० ३३-अक्षरोंमें अकार मैं— अनेक शास्त्रोंने अक्षरके अनेक अर्थ कहे हैं। वस्तुतः जिसका क्षय नहीं होता, न पिघलने- वाला, न घुलनेवाला, अविकारी, नित्य, भावातीत्त आदि अक्षर शब्दका अर्थ है। प्रत्येक शब्दका ७५ परिशिष्ट ३
अर्थ करनेवाले नैयायिकोंने “वर्णका स्मरण कर देनेवाला लिपि प्रकार” ऐसा इसका अर्थ किया तो वेदांतमें “परब्रह्म” कहा है और स्वयं गीतामें ओंकार वेद सार तथा ईश्वर ऐसा वर्णन किया है। किंतु कुछ प्राचीन पोथियोंमें “छः महीने बाद ज्ञानके विषयमें भ्रम होता है, संदेह निर्माण होता है। इसलिये अक्षर पत्रारूढ किये।” ऐसा लिखा गया है। विश्वकी विविध भाषाओंकी ध्वनियोंको व्यक्त करनेवाले चिन्होंको अक्षर कहते हैं। साहित्यमें अक्षरके विषयमें “ध्वन्यात्मक” और “सांकेतिक” ऐसे दोनों अर्थ मिलते हैं। ऋग्वेदमें वर्णमालाको अक्षर कहा गया है। विद्वा- नोंका यह मंतव्य है कि ऋग्वेदकालमें तराशकर अक्षर लिखते होंगे ! क्यों कि वहां अक्षरका अर्थ न फैलनेवाला न पिघलनेवाला ऐसा है ! उस समयके अक्षर ध्वन्यात्मक न होकर संकेतात्मक होंगे। अक्षरोंमें स्वर और व्यंजन ऐसे दो प्रकार हैं। स्वर दीर्घ, लघु तथा प्लुत ऐसे तीन प्रकारके होते हैं। दीर्घ स्वरांत अक्षर गुरु कहलाता है तो ह्रस्व स्वरांत अक्षर लघु कहलाता है। तीन मात्राओंका अक्षर प्लुत कहाता है। ध्वन्यात्मक तथा वर्णात्मक अक्षरोंका विकास लेखन कलाका विकसित रूप है। इन वर्णोंमें शुभ अशुभ तथा दग्ध ऐसे तीन प्रकार किये गये हैं। काव्य-शास्त्र के ग्रंथोंमें कहा गया है कि काव्यारंभ अशुभ अक्षरसे नहीं होना चाहिये । सभी अक्षर अ. क. च. ट. त. प. य. श. इन आठ वर्णोंमें विभाजित किये गये हैं। प्रत्येक वर्गका एक देवता है। उसका फल है। जैसे— अ. सोम, आयुर्वृद्धि, क, अंगारक, कीर्ति, च. बुध धनप्राप्ति. ट. गु, सौभाग्य, त, शुक्र, कीर्ति प. शनि मंदता. य. सूर्य, मृत्यु, श, राहु, शून्यता इसके अलावा ज्योतिष्य आदि शास्त्रोंमें, अक्षर-संकेतादि अलग शास्त्र ही है। अ—आदिवर्ण है। वाङ्मयका आदि बीज है। प्रणवकी पहिली मात्रा है। वैसे ही अ नेति नेति सूचक भी है। देवताओंमेंसे ब्रह्मा, शिव, वायु, तथा वैश्वानर=अग्नि इनका बोधक है। नानार्थ मंजरीमें : (१) ज्वाला (२) मंत्र (३) पर्जन्य (४) रथका घोडा (५) चक्र (६) मुर्गेका सिर (७) चंद्रबिंब (८) ब्रह्मा (९) शिव (१०) विष्णु अ के इतने अर्थ कहे गये हैं। यह अ सभी भाषाओंके अक्षरोंमें प्रथमाक्षर है। वह कंठ्य अक्षर है। पाणिनीके अनुसार इसके अठारह उच्चार भेद होते हैं। तंत्र-शास्त्रानुसार अ : इस अक्षरमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा उनकी शक्तियां महासरस्वती, महालक्ष्मी तथा महाकाली विद्यमान है। चित्तकी एकाग्रताके लिये इस अक्षरका जाप कहा गया है। गीता अ० १०. श्लो० ३३-मैं हूं द्वंद्व समासोंमें— दो या दोसे अधिक शब्दोंमें आनेवाले प्रत्यय अव्यय आदि हटा कर दो या दोसे अधिक शब्दोंको जोडकर एक शब्द तैयार करनेको समास कहते हैं। और ऐसे शब्दोंको सामासिक शब्द । इस प्रकार शब्दोंको जोडनेके तीन प्रकार हैं। (१) जिसमेंसे सभी शब्द समान योग्यताके होते हैं वह (२) जिसमें पहलेके पद गौण हो कर बादके मुख्य होते हैं वह (३) तथा जिनमें पहले मुख्य हो कर बादके गौण होते हैं वह । इनमें तत्पुरुष, बहुव्रीहि, अव्ययीभाव तथा द्वंद्व ऐसे चार प्रकारके समास होते हैं। इनमेंसे प्रत्येकमें अन्य अनेक उप-विभाग हैं। ज्ञानेश्वरी ७३
द्वंद्व समास-द्वंद्व समासके तीन प्रकार हैं। समाहार द्वंद्व, वैकल्पिक द्वंद्व, इतरेतर द्वंद्व । इस समासके सर्व शब्द समान महत्त्वके होते हैं। तथा इस समाससे जो सामासिक शब्द बनता है उसमें सर्वार्थ समावेश होता है। जैसे कृष्ण और अर्जुन कृष्णार्जुन अथवा कर्ण और अर्जुन कर्णार्जुन । कृष्णार्जुन और कर्णार्जुन भावनाकी दृष्टिसे उत्तरध्रुव और दक्षिणध्रुव है। कृष्णार्जुन द्वंद्वमें प्रेमजन्य अद्वैत है। और कर्णार्जुन द्वंद्वमें विरोधजन्य द्वैत है। यह द्वंद्व समास द्वैत और अद्वैत दोनोंको अपनेमें समालेता है अथवा पचालेता है। यही परमात्म-तत्त्वकी विशेषता है। परमात्म तत्त्व द्वैत और अद्वैत दोनोंमें पूर्ण है। जीवनमरण, बंधमोक्ष, ये परस्पर विरोधी द्वंद्व उत्तरध्रुव और दक्षिणध्रुवको एकत्र लाते हैं। मानो कहते हों एकही "वस्तुके दो छोर हैं!" इसमें भी ऐक्य है। जैसे दो आँखें एक देखती हैं, दो होंठ एक बोलते हैं, दो कान एक सुनते हैं, दो पैर एक चलते हैं। विरोधमें एकता द्वंद्व समासकी विशेषता है। वैसे ही आचारविचार, मातापिता, आदि एकताका द्वंद्व है। यहां अद्वैतमें द्वैत है। और द्वैतमें अद्वैत। मैं हूं द्वंद्व समासोंमें कह कर परमात्माने द्वैत और अद्वैतको अपनेमें पचा लिया है। मै दोनोंमें और दोनोंसे परे कहा है। गीता अ० १०, श्लो० ३४-सर्वनाशक मैं मृत्यु- नाशका अर्थ रूपका बदलना। विश्वमें जो कुछ बनता है अर्थात आकार लेता है वह नष्ट होता है। इस नाशको संहार कहा गया है। जो कुछ आकार लेता है उस सबको नाश करनेवाली सर्व-नाशक जो शक्ति अथवा देवता है उसको मृत्यु कहा गया है। ब्रह्माने इसका निर्माण करके समय पर संहार कार्यकरनेकी आज्ञा दी तो मृत्युने प्राणियोंको दुःख देनेवाला कार्य मुझसे नहीं होगा कहकर तपस्या करना प्रारंभ किया। इस तपसे प्रसन्न ब्रह्माने वर मांगनेको कहा तो मृत्युने 'जगतसंहारका काम मेरे पास न हो' का वर मांगा तब ब्रह्माने तू विश्व-नाशका प्रत्यक्ष कारण नहीं बनेगी "अप्रत्यक्ष कारण" तेरा काम करेंगे! ऐसा वर दिया। इसी मृत्यु देवताने नचिकेताको ब्रह्मविद्या सिखाई। यहां मृत्युके विषयमें तात्त्विक विवेचन हुआ है। मृत्यु स्वतंत्र नहीं है। वह भी परतंत्र है। वह "बिना कोई बहाना मिले" मृत्यु अपना कार्य नहीं कर सकता। गीता अ० १०, श्लो० ३५-गायत्री सब छंदोंमें- "मानवी भाषाकी प्राथमिक अवस्था गुनगुनानेकी भांति थी" ऐसे कुछ विद्वानोंकी मान्यता है। और सामान्यतया किसी भी भाषाके प्रारंभिक ग्रंथ पद्यमय ही मिलते हैं। विश्व-साहित्यका आदि ग्रंथ ऋग्वेद पद्यमय है। छंदोबद्ध है। ग्रीक लोगोंका सर्वप्राचीन ग्रंथ भी पद्यमय अर्थात् छंदोबद्ध है। होमरके पूर्ववर्ती भी कुछ कवि हो गये थे ऐसी जानकारी होमरके "इलीयड" काव्यग्रंथमेंसे मिलती है। पर्सियाका वेदतुल्य साहित्य अवेस्ता भी छंदोबद्ध है। हिब्रू लोगोंका धर्मग्रंथ, लेटीन भाषाके प्राचीन ग्रंथ भी छंदोबद्ध हैं। भारतके प्राचीनतम ऋग्वेद संहितामें (१) अतिजगती (२) अतिधृति (३) अतिशक्करी (४) अत्यष्टि (५) अनुष्टुप (६) अष्टि (७) उष्णिक् (८) एकपाद (९) ककुभ (१०) गायत्री (११) जगती (१२) त्रिष्टुभ् (१३) द्विपाद (१४) धृति (१५) पंक्ति (१६) प्रगाथबर्हत (१७) बृहती (१८) महाबर्हत (१९) शक्करी; ये उन्नीस छंद हैं। ७७ परिशिष्ट ३
वेद मंत्रोंको ही छंदस् कहा गया है। सामान्यतया सभी वैदिक छंद अक्षरछंद हैं मात्रा छंद नहीं । अवेस्तामें भी सभी अक्षर छंद हैं। किंतु उदात्त अनुदात्त स्वर यह वेदका वैशिष्ट्य है। अर्थ निश्चितीमें इन स्वरोंका महत्व माना जाता है। साथ साथ पठनमें संगीतका भास होता है। इसके बाद वैदिक छंदःशास्त्रका पर्याप्त विकास हुआ है। आठ अक्षरोंके अनुष्टुप छंदसे आगे अनेक प्रकारके छंद बनते गये हैं। अनुष्टुप् यह सबसे छोटा और सरल छंद है। कुछ विद्वानोंका कहना हैं कि यह छंद भारतीय संस्कृति और धार्मिक साहित्यका हृदय है। पिंगलाचार्य अथवा पिंगलनागके छंदःसूत्रोंको प्राचीन छंदःशास्त्र माना जाता है। इसमें प्राचीन वैदिक छंद और अन्य लौकिक छंदोंका विचार किया गया है। इसके बाद काव्य कालमें प्रथम प्रथम यही आर्ष छंद लिये गये हैं। किंतु इस समय इसमें कुछ सुधार भी किये गये हैं। जैसे अनुष्टुपका पांचवा अक्षर लघु हो । छठा दीर्घ हो आदि ! त्रिष्टुभ जगती आदिमेंसे कुछ अन्य छंदोंका अथवा इन्हींकी शाखाओंका विकास हुआ। कालिदासादि महाकवियोंने अपने काव्योंमें वैदिक वातावरण साकार करनेके लिये त्रिष्टुभ आदि छंदोंका उपयोग किया है। इन्हीं वैदिक छंदोंमेंसे कुछ वृत्तोंका विकास हुआ जैसे वैदिक अनुष्टुपमेंसे विद्युन्माला अथवा त्रिष्टुभमेंसे इंद्रवज्रा आदि। आगे काव्य-नाटककी दृष्टिसे भरतमुनिने इसका विचार और विकास किया। आगे अनेक लोगोंने छंदःशास्त्र लिखा। भारतकी विविध भाषाओंमें अनेक विद्वानोंने उन उन भाषाओंके छंद-शास्त्र पर पुस्तकें लिखी हैं। जैसे कन्नडके प्रा. कर्की मराठीके प्रा. माधवराव पटवर्धन, हिंदीके प्रा. पुत्तुलाल शुक्ल, गुजरातीके प्रा. नारायणभाई पाठक, बंगळके श्री. मोतीलाल मुजुमदार आदि विद्वानोंने इस पर खूब विचार विमर्श किया है। अर्थात् इ० पू० ४०००-६००० वर्षोंसे आज तक इस शास्त्रका विकास होता आया है और इन सभी छंदोंमें— गायत्री— महान् है । वेदके सात विशिष्ट छंदोंमें वह पहला है। गायत्रीका अर्थ वाणीकी रक्षा करनेवाला ऐसा होता है। गायत्रीका और एक अर्थ “गानेवालेका गाना” ऐसा भी होता है। शतपथ ब्राह्मणमें “कृतकृत्य भावसे पृथ्वी गाने लगी तभी उसे गायत्री कहा गया!” ऐसा कहा है। ऐतरेयब्राह्मणमें “गायत्री सुवर्णपक्षिणीका रूप लेकर स्वर्गसे सोम लायी” ऐसा लिखा है। गायत्री छंदके तीन चरण होते हैं। प्रत्येक चरणमें आठ अक्षर होते हैं। इसलिये इसे “अष्टाक्षरी गायत्री” भी कहते हैं। कभी कभी गायत्रीके उच्चारके पहले प्रणवोच्चार करनेकी भी परिपाटी है। ऋग्वेदमें २४६७ मंत्र इस छंदमें हैं। सामान्यतया अग्नि सूक्त इसी छंदमें हैं। ऋग्वेदका महान गायत्री मंत्र इसी छंदमें हैं। वह मंत्र हिंदीमें गायत्री छंदमें ऐसा होगा। वरणीय तू सविता तेज दे अवर्णनीय। उद्बोधन कर धी को ॥ गायत्री मंत्रके प्रथम ओंकारका उच्चार होता है तथा “भूर्भुवस्स्वः” कहा जाता है। उपनयनमें गायत्री मंत्रका उपदेश दिया जाता है। गीता अ० १०, श्लो० ३५-में मार्गशीर्ष मासोंमें— लोकमान्य तिलकजीने गीतामें भगवानने मैं मार्गशीर्ष मासोंमें ऐसे क्यों कहा है? इसका विचार करते हुए ओरायनमें लिखा है “आजसे ६०००-८००० वर्ष पूर्व मार्गशीर्षसे वर्षारंभ होता था। तथा मार्गशीर्षमें वसंत ऋतु आता था।” हजारों वर्षोंकी इस कालावधीमें ऋतु मानमें पर्याप्त ज्ञानेश्वरी ५५
परिवर्तन होगया है। संभव है कि गीता युगमें इसका स्मरण रहा हो और भगवानने पूर्व परंपराके अनुसार वर्षारंभके मासको महत्व देकर "मैं मार्गशीर्ष मासोंमें" ऐसे कहा हो। गीता अ० १०. श्लो० ३५-ऋतूमें कुसुमाकर- ऋतु छ हैं और सौर-मासको ऋतु कहते हैं। इन ऋतुओंको (१) वसंत (२) ग्रीष्म (३) वर्षा (४) शरद् (५) हेमंत (६) शिशिर ऐसे नाम हैं। चैत्र-वैशाख वसंतऋतु ! ऐसी इनकी गणना होती है। वर्षके विविध मौसम इस अर्थमें ऋतु शब्द ऋग्वेदमें भी कई बार आया है। किंतु ऋग्वेदमें केवल तीन ऋतुओंकी कल्पना है। चार महीनेका एक ऋतु। वसंत ग्रीष्म शरद् ये उनके नाम हैं। आगे चल कर पांच और छ ऋतु हो गये। ऋग्वेदमें भी वसंत मुख्य ऋतु ऐसे स्वतंत्र रूपसे कहा गया है। तैत्तिरीय ब्राह्मणमें संवत्सरको एक पक्षी मानकर उसका शिर वसंत। ग्रीष्म दहिना पंख। वर्षा है पुच्छ। शरद् बायां पंख। हेमंत है मध्य। ऐसा वर्णन किया है। अर्थात् संवत्सरका शीर्षस्थ वसंत विभूति कही गयी है ! गीता अ० १०. श्लो० ३५-द्यूत मैं छलियोमें हूं- धोखे बाजीमें, धूर्तताके व्यवहारमें भी चातुरी होती है। बुद्धिकी चमक होती है। और जूआ या द्यूत इसका आदर्श है। यह अत्यंत प्राचीन खेल है। इसको द्यूत-क्रीडा कहते हैं। इस खेलके लिये अलग स्वतंत्र स्थान होते थे। जिन्हे द्यूत-सभा कहा जाता था। आज भी जूएके अड्डे स्वतंत्र होते हैं ! जुआरी लोग वहां जमते हैं। पहले इसके प्रमुखको "सभिक" कहते थे। जैसे द्यूतक्रीडा अत्यंत प्राचीन-कालसे चली आयी है वैसे ही "द्यूत-क्रीडा बुरी है!" यह भावना भी ऋग्वेद कालसे देखनेको मिलती है। ऋग्वेदका "कवष ऐलूष" नामका ऋषि द्यूत क्रीडाकी अनेक बुराइयोंका वर्णन करके द्यूत-क्रीडा त्याग कर खेती करनेका संदेश देता है। द्यूत-क्रीडाकी बुराई कहते समय "उनके हाथ नहीं किंतु जिनके हाथ हैं ऐसे पुरुषोंको वे निकम्मा बनाता है। दीन बनाता है। वह हाथको शीतल लगता है किंतु कलेजा जला देता है !" ऐसे कहा है। मनुस्मृतिमें द्यूतको अठारह निषिद्ध व्यसनोंमें एक गिना है। वहां विनोदके लिये भी द्यूतका निषेध किया है। भारतके प्राचीन साहित्यमें अक्ष-क्रीडा द्यूत-क्रीडा नामसे जूएका विस्तृत वर्णन है। साथ ही साथ इससे जिनका सर्वनाश हुवा उनका हृदयद्रावक वर्णन भी। द्यूत यह प्रभुका विनाशकारी छलनामय विभूति है अवकृपाका द्योतक ! गीता अ० १०. श्लो० ३७-वासुदेव, धनंजय परिशिष्ट पहलेमें-देखिये- गीता अ० १०. श्लो० ३७-व्यास मैं मुनियोंमें हूं- मुनि मनन करनेवाले। चिंतन मनन करके मूलभूत सिद्धांत तक जानेवालोंको मुनि कहा गया है। इन मुनियोंमें बादरायण व्यास सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। व्यास-पराशर सत्यवतीका पुत्र। पराशर वसिष्ठऋषीका पोता। इस लिये व्यास वसिष्ठ-कुलका था। इनका जन्म यमुना द्वीपमें हुवा था। इसलिये इनको द्वैपायन अथवा द्वैपायन व्यास कहते हैं। कृष्ण द्वैपायन भी कहा गया है। साथ साथ इनका जन्म बोरीवनमें हुवा था सो बादरायण भी कहा गया है। इनके गुरुका नाम विष्वक्सेन। इन्होंने सत्य शब्द पर विचार किया है। ७९ परिशिष्ट ३
इन्होंने वेदोंका संहितीकरण किया। भारतकी रचना की। हरिवंश लिखा। ब्रह्मसूत्र लिखे। सारे पुराण इन्होंने लिखे ऐसा कहते हैं। किंतु विद्वानोंका मत है यह गलत है। पुराण अर्वाचीन हैं। शुक और सूत इनके शिष्य। शुक इनका पुत्र ही था। दीर्घ तपस् नामका भी एक पुत्र था। इनके अनेक शिष्य थे। इनकी शिष्यपरंपरा भी उदण्ड है। इनकी शिष्यपरंपराने वेदकी अन्यान्य शाखाओंका संपादन किया है। व्यासने वैशंपायनको यजुर्वेद सिखाया था। वैशंपायनने यजुर्वेदकी अनेक शाखाओंकी रचना करके उनको अन्यान्य शिष्योंको दे दिया। जिससे वे पाठांतरसे उन उन शाखाओंकी रक्षा करें। याज्ञवल्क्याय वैशंपायनका शिष्य है। इनका ऋग्वेदका शिष्य पैल है। इन्होंने ऋग्वेदकी दो शाखाएँ करके अपने सात शिष्योंको दीं। जो पाठांतरसे शिष्यपरंपरा निर्माण करके वेदकी रक्षा करें। वैसे जैमिनी भी वेदव्यासका शिष्य है। जिन्होंने सामवेद वेदव्याससे पाया और अपने पुत्र और शिष्योंको इसकी शाखायें दे कर सामवेदकी रक्षा की। जैमिनीने धर्म-शास्त्रके विषयमें अध्ययन करके पूर्व-मीमांसा लिखी है। जैमिनीके धर्मसूत्र आज भी धर्म-कर्मका निर्णायक ग्रंथ है। जैमिनीने पांडवोंके अश्वमेधके विषयमें लिखा है जिसे जैमिनी भारत कहते हैं। अथर्ववेदका व्यासशिष्य सुमंतु है। सुमंतूने भी अपनीशिष्यपरंपराको अथर्ववेद दिया। इनके ब्रह्मसूत्र अत्यंत प्रसिद्ध हैं। इसमें चार अध्याय सोलह पाद पांच सौ पंचावन्न सूत्र हैं। ये सूत्र सभी उपनिषद् वाक्योंका, तथा सिद्धांतोंका सार है। भारतके चारों महान आचार्य जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य, श्रीरामानुजाचार्य, श्रीमध्वाचार्य, तथा श्रीवल्लभाचार्यने इन सूत्रों पर भाष्य लिखा है। श्रीमध्वाचार्यके भाष्यमें अपने पूर्ववर्ती एकवीस भाष्यकारोंके नाम दिये हैं। ब्रह्म-सूत्र भारतीय दर्शन-शास्त्रका अजोड ग्रंथ है। इनके जीवनका अध्ययन करते समय ऐसा लगता है कि इनका शिष्य समूह इतना अधिक था उनको अन्न वस्त्र देना भी व्यासके लिये एक बडी समस्या बन जाती! अन्यान्य पुराणोंमें इनके शिष्योंकी नामावली देखनेको मिलती है तभी पुरानी पोथियोंमें लिखा है। बिना चार मुखका ब्रह्म दो हाथका यह है हरि। भाल लोचन बिना शंभु भगवान बादरायण ॥ गीता अ० १०. श्लो० ३७—कवीमें मैं उशना कवि— संस्कृत कवि शब्दका अर्थ सर्वज्ञ, दृष्टा ऐसा होता है। कु धातुको इ प्रत्यय लग । कर यह शब्द बना है। "कु" का अर्थ विश्व, व्यास, आकाश । "कवि" को श्रुतिमें मनीषी, परिभूः, स्वयंभूः ऐसे विशेषण दिये हैं। अर्थात जो अपने दृष्टि-पथमें, अथवा अनुभवमें सारे विश्वको अथवा ब्रह्मांडको समालेता है, इस अनुभवके लिये दूसरों पर, या बाह्य साधनों पर निर्भर न हो कर अपने परही निर्भर रहता है तथा जो अपनेमें, आपसे, आप ही सारे विश्वका अनुभव करता है वह स्वयंभूः है! इसी लिये वह भाव-सृष्टिका सम्राटन बनता है। कविके अनुभव परावलंबी नहीं निरालंब हैं। वह दृष्टा है; सारे विश्वको वह अपनेमें देखता है। अपने हृदयको सारे विश्वका केंद्र बिंदु मान कर विश्वसे समरस हो कर काव्य-रचना करता है। इसी अर्थमें ऋषी शब्द भी आया है। कविको क्रांत-दर्शी कहा गया है। मानो वह काव्य-सृष्टिका प्रजापति है। अपने काव्यमें ज्ञानेश्वरी ५०
वह वही विश्व निर्माण करता है जो उसके हृदयमें होता है। सूर्य-प्रभा बाह्य विश्वको प्रकाशित करती है, तो कवि-प्रतिभा विश्वके अंतर तमको उजलाती है। इस अर्थमें काव्य सारी विद्याओं अथवा शास्त्रका सार तत्व है ! कविको अपने काव्यमें व्यक्ति, विश्व, विश्व-शिल्प और उसके शिल्पीको मूर्तिमान करके सामूहिक साक्षात्कार करना और कराना होता है। श्रुतिमें ब्रह्माको आदि कवि माना है अर्थात् यह कविका लौकिक रूप है। ऐसे कवियोंमें उशनाकवि अग्निका दूत है। वह असुरोंका कुलगुरु । वारुणी भृगु इसका पिता। पुलोमा माता। इसका काव्य उशना काव्य। काव्य और कवि एक हैं। उशनाका दूसरा नाम शुक्र है। इसकी माताको कहीं कहीं ख्याती भी कहा गया है। इसकी अनेक पत्नियां थीं। यह संजीवनी विद्याका ज्ञाता। कई सूक्तोंका द्रष्टा। इसने अपनी संजीवनी विद्यासे मृत माता, तथा प्रिय शिष्य कचको पुनर्जीवन दिया। इसीने सुरापानका निषेध किया। यह महान् राजनीतिज्ञ था। कौटिल्य अर्थ-शास्त्रमें स्थान स्थान पर इसके राजनीति शास्त्रका उल्लेख है। धर्मशास्त्र पर भी इसका ग्रंथ है ! उशना कवि और शुक्राचार्य एक हैं। गीता अ० १०, श्लो० ३८-दंड में दमवंतोंका- मानवी समाज जंगली अवस्थामेंसे विकसित होता आया है। नीति नियमोंकी दीर्घ परंपरासे वह सुसंस्कृत बना है। किंतु भारतीय समाज ज्ञात-इतिहासके पूर्वकालसे ही सुसंस्कृत था। किसी भी समाजकी संस्कृतिका दर्पण उसकी नीति है। नीति यह शब्द नी=आगे ले चलनेवाला इस अर्थका द्योतक है। और “दम” इसका आधार है। मनोनियह इस शब्दके अर्थमें “दम” शब्द आया है। समाजको सबके हितकी दृष्टिसे आगे बढनेके लिये ही नहीं सिर उठाकर स्थिर रहनेके लिये भी दमकी आवश्यकता है। अपनेको संयत रखनेकी आवश्यकता है। समाजको स्थिर रूपसे आगे बढानेवाले विचारोंको नीति कहते हैं। इस नीति शास्त्रमें अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राज्यशास्त्र, जीवनशास्त्र, तथा अध्यात्मशास्त्रका समावेश होता है। और इन सभी शास्त्रोंको एक न एक रूपसे “दम” अपनेको “संयत” रखनेकी आवश्यकता है। इंद्रियनिग्रह, मनोनियह, अनुशासन, आदि शब्दोंसे भिन्न भिन्न शास्त्रोंमें इसका विवेचन किया है। व्यक्ति, कुटुंब, जाति, वर्ग, राष्ट्र ये समाजके घटक हैं। साथ साथ सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक आदि क्षेत्रोंमें सामूहिक उत्थानके लिये कुछ संस्थाएँ भी बनी होती हैं। इन सबमें परस्पर विरोध आनेके पहले सबका, सामूहिक और अविरोधी विकासके साधनीभूत जो गुण है, उसको “दम” कहते हैं। इस दमके दो रूप हैं। एक विवेकसे स्व-निर्मित दम, स्वानुशासन । दूसरा संस्था, समाज, राज्यादिकी ओरसे किया गया शासन । स्वानुशासनमें “दंड” प्रायश्चित्त रूप है तो परानुशासनमें सजाके रूप ! अर्थात् दममें दंड अनिवार्य है। दम और दंड समाज-धारणाके लिये अनिवार्य हैं। नीतिशास्त्रका अध्यात्मशास्त्र प्रत्येक व्यक्तिको स्वानुशासित करता है। अध्यात्मशास्त्रका अर्थ ही आत्मानुशासन है ! इसको वहां “संयम” कहा गया है। चित्तवृत्तिके निरोधको ही योग कहा गया है। इंद्रिय-निग्रहको तप कहा गया है। अथर्ववेदमें पुत्रको पित्रव्रतका पालन करना चाहिए, माताकी आज्ञा माननी चाहिए, बहनको भाईका द्वेष नहीं करना चाहिए, पत्नीको पतिसे मधुर बर्ताव करना चाहिए आदि शब्दोंमें संयम सिखाया गया है। और इस “दम” के पालनके लिये “दंड” रखा। अध्यात्म-क्षेत्रमें वह प्रायश्चित्त है। राजनैतिक शास्त्रमें दंड। दंड अनुशासन शक्ति है। इस दंडके विषयमें हमारे ८१ परिशिष्ट ३
प्राचीन ग्रंथोंमें लिखा है "राजाकी दंडनीति जब उत्तम चलती है तब कृतयुग आता है ।" "जिस राज्यमें दंड नहीं उस राज्यकी प्रजाका नाश होगा !" "दंड ही प्रजाको सही दिशा दिखाकर उसकी रक्षा करता है !" "ज्ञानी लोग कहते हैं दंड ही धर्म है।" "दंडसे लोगोंका रक्षण होता है" "बिना दंडके ब्रह्मचारी (विद्यार्थी) वेदाध्ययन (अध्ययन) नहीं करेंगे। गाय दूध नहीं देगी, लडकियोंके विवाह नहीं होंगे, समाजव्यवस्था टूट जायेगी !" कहीं कहीं राजनीतिको दंडशास्त्र कहा गया है। भारतीय समाज-शास्त्रमें कई प्रकारके दंड है। ब्रह्मचारी, विद्यार्थी-का मार्गदर्शक, प्रतीक रूप दंड, संन्यासीका इंद्रिय दमनात्मक दंड, इसके अलावा गुरुदंड, समाजदंड, राजदंड, और इन सबसे श्रेष्ठ आत्मानुशासनका ब्रह्मदंड। सर्वान्तर्यामी हृदयका दंड। जिसके लिये उपनिषदमें कहा गया है। मानो वह उठाया हुवा वज्र । उसके भयसे तपता अग्नि ॥ उसीसे प्रकाशता है भास्कर । करते अपने नियत कर्म ॥ यही आत्म-दंड मनुष्यको सदैव स्वतंत्र रखता है । सर्वत्र स्वतंत्र रखता है। क्यों कि इसके ऊपर दूसरा कोई दंड नहीं। इस दंडके भयसे मनुष्य जो बर्ताव करता है उसे देखकर दूसरे किसीको उस पर शासन करनेका, उसको दंड देनेका साहस ही नहीं हो सकता। जैसे अग्नि, वायु, सूर्य आदि पर कोई किसी प्रकारका शासन करनेका साहस नहीं करता । ज्ञानेश्वरी ८२
परिशिष्ट चौथा ज्ञानेश्वरीके कुछ पौराणिक संदर्भ ज्ञानेश्वरीमें कुछ पौराणिक संदर्भ आये हैं। उनके साथ जो कथा-संदर्भ है उसको इस परिशिष्टमें दिया गया है जिससे अर्थ समझनेमें अधिक सुविधा हो।
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अध्याय १७: श्रद्धात्रयविभागयोग
परिशिष्ट चौथा नष्ट हुए दोष जनमेजयके । ज्ञा० १-३७ ऋषिके शापके कारण जनमेजयके पिता परीक्षितको सर्पदंश हुवा और वह चल बसा । इसका बदला लेनेके लिये जनमेजयने सर्पसत्र नामका यज्ञ किया और सर्प-जातिका संहार करना प्रारंभ किया । किंतु इस संहारमें मुख्य जो तक्षक वही रह गया । उसकी आहुति नहीं पड़ती थी । क्यों कि उसको इंद्रका सहारा मिला था । इंद्रने ब्राह्मण वेषमें आकर जनमेजयसे याचना करके तक्षकको जीवन-दान दिलाया ! इस घटनासे-इंद्रके ब्राह्मण-वेषमें आकर जनमेजयको धोखा देनेसे-जनमेजयके मनमें ब्राह्मणोंके विषयमें तिरस्कार उत्पन्न हुवा । उसने ब्राह्मणोंको अपने राज्यसे निकलवा दिया । यह सुनकर वेदव्यासजीको बड़ा दुःख हुवा । जनमेजयके कुलके विषयमें वेदव्यासजीको अभिमान था, आत्मीयता थी । सदैव वे उस कुलके उत्कर्षकी कामना करते थे । उसके गौरवकी आशा करते थे । वे चाहते थे कि उस कुलका जयजयकार मैं सुनूं । इसलिये वेदव्यासजीने महाभारत-ग्रंथके साथ अपने दो शिष्योंको जनमेजयके पास भेज दिया क्यों कि जिस ग्रंथमें उसके कुलगौरवकी गाथा है वह सुने । उसको सही गलत बातका बोध हो, किंतु जनमेजयने उच्छ्रंखल होकर वेदव्याससे आये हुए शिष्योंको अपमानित किया । अपने पूर्वजोंको भी भला बुरा कहा । अपने पूर्वजोंको मूर्ख बतानेवाले जनमेजयकी उच्छ्रंखलतासे वे शिष्य क्रुद्ध हुए । उन्होंने शाप दिया "इस अशोभनीय कर्मके परिणाम स्वरूप तुम्हे कुष्ठ रोग हो !" इसके बाद वेदव्यास उससे मिले । उन्होने जनमेजयसे कहा "तुम निश्चित दिशामें मत जाओ । वहां जो स्त्री मिलेगी उससे विवाह मत करो । उसके कहनेके अनुसार बर्ताव मत करो" आदि । किंतु जनमेजयने यह सभी किया । राजाने रानीकी सम्मतिसे पिपीलिका पर्वत पर "नरयाग" किया । उस यज्ञमें इंद्रकी आहुति पड़नेका प्रसंग आया और इंद्र विष्णुकी शरण गया । विष्णुने यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणोंको मोहित किया । उन ब्राह्मणोंको निद्राने घेर लिये । वे आहुति देते देते वहीं सो गये । यज्ञकुंड बुझ गया । राजा रानीको जब यह ज्ञात हुवा वे यज्ञशालामें आये । सभी ऋत्विज सो गये हैं । रानीके सलाहसे राजाने उनको जगानेके लिये उन पर ठंडे जलके छींटे डाले । किंतु वे जल कण ही भयंकर शस्त्र बने और वे सब ब्राह्मण वहीं टुकड़े टुकड़े होकर मर गये । इससे जनमेजय कुष्ठ-रोगी हो गया । जनमेजय यह देखकर घबड़ा गया । वह वेदव्यासकी शरण गया । वेदव्याससे रोग-मुक्तिका उपाय पूछा । वेदव्यासने तब उससे कहा "तूने अपने पूर्वजोंकी निंदा की । इसलिये यह सब हुवा । अब तू भगवानका स्मरण कर । उसकी कृपासे तू रोग-मुक्त हो जायेगा !" ८५ परिशिष्ट ४
जनमेजयने भगवदाराधना की । भगवानने वेदव्यासको जनमेजयको भारत सुनाकर शापमुक्त करनेको कहा । वैशंपायन ऋषिने वेदव्यासकी आज्ञासे जनमेजयको भारत सुनाया । भारत श्रवणसे जनमेजय रोग मुक्त होगया । ज्ञानेश्वर महाराजने महाभारतका माहात्म्य कहते समय इस प्रसंगका उल्लेख किया है । अथवा जैसे टिटहर । सुखाना चाहता सागर । वैसे अल्पज्ञ यह भार । उठाता है ॥ ज्ञा० १-६८ ॥ भारत भरमें एक जनश्रुति प्रचलित है । एक बार एक टिटहरने समुद्र किनारे अपने अंडे रखे थे । समुद्रके पानीके बढ़ावमें वे बह गये । तब टिटहर समुद्रसे अपने अंडे मांगने लगा । समुद्र वह अंडे नहीं देता । टिटहरने यह देखकर समुद्रको सुखाकर अपने अंडे लेनेका निश्चय किया और अपनी चोंचसे समुद्र सुखाने लगा !! ज्ञानेश्वर महाराज नम्रतासे अपने गीतार्थ कहनेके प्रयासको उस टिटहरके प्रयाससे तुलना कर रहे हैं । ध्वजस्तंभ पर वानर । जो है मूर्तिमंत शंकर । सारथी स्वयं शांर्गधर । अर्जुनका ॥ ज्ञा० १-१४१ ॥ ध्वजस्तंभ पर वानर, अर्जुनको कपिध्वज कहा गया है। महाभारतके युद्धमें स्वयं हनुमानजी अर्जुनके रथका ध्वज संभालकर बैठे थे । इस घटनाके विषयमें ऐसी एक जनश्रुति है कि अर्जुनने एक बार प्राचीन ऐतिहासिक घटनाओंके विषयमें श्रीकृष्णसे चर्चा करते समय कहा “ रामको लंकामें जाते समय सेतु बांधनेकी भला क्या आवश्यकता थी ? उन्होंने अपने बाणोंसे ही सेतु क्यों न बनाया ? इस परसे लगता है राम धनुर्विद्यामें उतना निपुण नहीं था !” श्रीकृष्ण अर्जुनके मनकी बात समझ गये । साथ साथ श्रीकृष्णने यह भी सोचा कि अर्जुनके अहंकारको तोडनेका मौका भी सहज मिल रहा है । श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा “ रामकी सेना बडी शक्तिशाली थी । उनके सैनिक शक्तिशाली थे । बाणका सेतु उनके चलनेसे टूट जाता !” “ मैं किसी भी हालतमें न टूटनेवाला सेतु बना सकता हूं । संभव है कि राममें यह शक्ति नहीं थी किंतु मुझमें अवश्य है !” अर्जुनने कहा । ‘ रामसेनाका एक सैनिक हनुमानजी अब भी जीवित है ।’ श्रीकृष्णने कहा । “ तुम यमुना पर बाणका सेतु बनाओ और हनुमानजीको उस सेतु परसे उस ओर ले जाकर दिखाओ !” अर्जुनने मान लिया । श्रीकृष्णने हनुमानजीको बुला लिया । हनुमानजी आये । अर्जुनने सेतु बनवाया । हनुमानजी सेतु परसे उस पार जानेको तैयार नहीं । अर्जुनने कहा “ सेतु बडा सुदृढ है ! डरनेकी कोई बात नहीं है ।” कृष्णने भी ढाढस दिलाया और हनुमानजीने एक पैर रखते ही सेतु टूटकर नीचे आगया ! इससे अर्जुन लज्जित हुआ । उन्होंने धनुर्बाण डाल दिये । मेरी धनुर्विद्या व्यर्थ है । मेरा जीना व्यर्थ है ! वह अग्निप्रवेश करनेका विचार करने लगा । वानरका एक पैर रखते ही मेरे बाणोंका सेतु टूट गया । मैं किस कामका हूँ ! तब श्रीकृष्णने अर्जुनको दुबारा सेतु बांधनेको कहा । “ एक बार कुछ हुआ । देखो दुबारा प्रयत्न करो ।” अर्जुनने दुबारा सेतु बांधा । श्रीकृष्णने सेतुको सुदर्शनका सहारा दिया । ज्ञानेश्वरी ८६
हनुमानजी उस सेतु पर चढे, उछले, कूदे । किंतु कुछ नहीं हुआ । हनुमानजीने अनुभव किया राम और कृष्ण एक हैं। मैंने पहले जो स्वामीकार्य किया था वही अब यह अर्जुन कर रहा है । “हनुमानजीने जब मुझे तुम बुलाओ तब सहायतार्थ आऊंगा !” ऐसा वचन दिया और अर्जुननें “महाभारतके युद्धमें आप मेरे रथ पर बैठ कर ध्वज संभालिये !” ऐसा वर मांग लिया ! इसलिये ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं—ध्वज स्तंभपर वानर । सारथी स्वयं शांर्गधर—भारत युद्धका जब निश्चय हो गया तब दुर्योधन और अर्जुन दोनों श्रीकृष्णकी सहायता मांगने गये थे, तब भगवान सो गये थे, । दुर्योधन अपने पदानुसार श्रीकृष्णके सिरहाने बैठ गया और अर्जुन चरणोंमें । श्रीकृष्णके जागते ही स्वाभाविक ही अर्जुन पर दृष्टि पडी, फिर दुर्योधन पर । दोनोंने भारत-युद्धमें श्रीकृष्णकी सहायता मांगी । श्रीकृष्णने कहा “अब मैं वृद्ध हो गया हूं। हाथमें हथियार नहीं उठाता । शस्त्रसंन्यास लिया है। तुम दोनों मेरी सहायता मांगने आये हो । दोनों मेरे आप्त । आपसमें बांधव । फिर भी आपसमें लड़ रहे हो । यदि कोई युद्धमें सहायता मांगने क्षत्रियके पास आये तो उनको सहायता देना क्षत्रियका कर्तव्य है। मैं अपनी शक्तिके दो विभाग करता हूं एक ओर मैं निःशस्त्र कृष्ण दूसरी ओर मेरी तीन अक्षौहिणी सशस्त्र नारायणी सेना ! इन दोनोंमेंसे जो जिसको चाहिये वह चुन लें । किंतु तुम दोनोंमें अर्जुन छोटा है । इस लिये मांगनेका प्रथम अधिकार अर्जुनका है ।” यह सुन कर अर्जुनने कहा “मैं केवल निःशस्त्र श्रीकृष्ण चाहता हूं !” अर्जुनकी मांग सुनकर दुर्योधन मन ही मन प्रसन्न हुआ । उसने सोचा अर्जुनने आयी हुई स्वर्ण-संधि खोई है । उसने अत्यंत प्रसन्नतासे तीन अक्षौहिणी नारायणी सेनाका स्वीकार किया । महाभारतके युद्धमें कृतवर्माके आधिपत्यमें यह सेना पांडवी सेनासे लडी । तब श्रीकृष्णने अर्जुनसे पूछा “तू कितना मूर्ख है ! तीन अक्षौहिणी सशस्त्र नारायणी सेनाको मांगना छोड़कर निःशस्त्र वृद्ध कृष्णहीं मांग लिया ? निःशस्त्र और वृद्ध कृष्ण क्या करेगा ?” अर्जुनने नम्र होकर कहा “मार्गदर्शन ! सारथ्य !!” इसी बातको लेकर ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं सारथी स्वयं शांर्गधर ! शांग श्रीकृष्णका धनुष्य है— जीता जिसने रणमें शिवको । मिटाया है निवात कवचको ॥ ज्ञा० १-२०० ॥ उन दिनोंमें पाशुपतास्त्र अत्यंत महान अस्त्र था । “जिसके पास पाशुपतास्त्र उनकी विजय निश्चित !” ऐसी स्थिति थी और पांडव , वनवासके बाद कौरव पांडव युद्ध अनिवार्य हो गया था । यह जानकर दूरदृष्टि अर्जुनने पाशुपतास्त्र प्राप्त करनेका निश्चय किया । इसके लिये वह इंद्रकील पर्वत पर जाकर शिवजीकी आराधना करने लगा । शिवजीने अर्जुनकी परीक्षा लेना चाहा । पाशुपतास्त्र जैसे महान विश्वसंहारक अस्त्र देनेके पहले उसको धारण करने वालेकी “धारणा शक्ति” देखना अत्यंत अवश्य था । शिवजी किरात बने और शिकारीके रूपमें एक वराहका पीछा करते करते अर्जुनके सामने आये । वराह-पूर्व संकेतानुसार-झपट्टा मारकर तपस्वी अर्जुनको धक्का देकर-क्षत्रिय अर्जुनको शिकारीमें प्रवृत्त करके अथवा आव्हान देकर-आगे दौडा । अर्जुनने तुरंत वराह पर शस्त्र चलाया, तभी किरातने भी उस पर भाला फेंका । वराह अर्जुनके तीर और किरात-शिवजीके भालेसे मृत हुआ और शिवजी और ८७ परिशिष्ट ४
अर्जुनसे "शिकार किसका ?" इस बात पर वाग्वाद हुआ । शिकार शास्त्रकी सैद्धांतिक चर्चाने उन दोनोंके द्वंद्व युद्धका रूप ले लिया । इस द्वंद्व युद्धमें अर्जुनने अपने पराक्रमका अनुत्तम प्रदर्शन किया । शिवजीने भी प्रसन्न होकर अर्जुनको पाशुपतास्त्र दिया । मिटाया निवात कवचको-प्रह्लादका छोटा भाई सम्हाद । उस सम्हादके दो पुत्र थे । उनका नाम था निवात और कवच । ये दोनों अत्यंत पराक्रमी थे । ये समुद्रके किनारे रहते थे । देव भी इनसे डरते थे । इंद्र भी इनको नहीं जीत सका था । इंद्रने इनको मारनेके लिये अर्जुनकी सहायता मांगी । अर्जुनको आवश्यक युद्ध-सामग्री दी । शस्त्रास्त्र दिये । ये राक्षस जैसे पराक्रमी थे वैसे मायावी थे । धोखा देनेमें सिद्धहस्त थे । फिर भी अर्जुनने बहुतही वीरता और कुशलतासे इन राक्षसोंको मारा । इस पर इंद्रने अपना आधा आसन देकर अर्जुनका सम्मान किया था । तथा हराया है गंधर्वोंको । पराक्रमसे ॥ ज्ञा० २-१० ॥ अर्जुनने कई बार कई गंधर्वोंको जीता है । लाक्षागृहसे बच निकलनेके बाद पांडव गुप्त रूपसे द्रौपदी स्वयंवरके लिये जा रहे थे । उसी समय रास्तेमें अंगारपर्ण नामका एक गंधर्व अपनी स्त्रियोंके साथ जल-क्रीड़ा कर रहा था । वहां एकांत स्थलमें पांडवोंको देखकर अंगारपर्णने उनको रोका “ऐसी अप-रात्रीमें तुम कहां जा रहे हो ?” पांडवोंने उसको समझानेका बहुतेरा प्रयास किया किंतु व्यर्थ गया । अंगारपर्ण पांडवोंका रास्ता रोकके खडा था । तब अर्जुनने अंगारपर्णको युद्धके लिये ललकारा । दोनोंमें जो द्वंद्व युद्ध हुआ उसमें अंगारपर्ण बुरी तरह हार गया और वह अर्जुनके पराक्रमको देखकर प्रसन्न भी हुआ । उसने अर्जुनको "चाक्षुषी विद्या" सिखाई । राजसूय यज्ञमें जब वह उत्तर दिग्विजयको गया था तब भी उसने गंधर्वरक्षित देशोंकी विजय यात्रा की और गंधर्वोंको जीता । तथा चित्रसेन गंधर्वको भी जीतकर उससे गीत-वाद्य-नृत्यकला सीखली जिसका उपयोग अर्जुनने अज्ञातवासमें विराट गृहमें बृहन्नला बनते समय हुआ । अर्जुनने बृहन्नला बनकर उत्तराको वह विद्या सिखाई थी । जिसकी कृपासे मिला वर । उसीसे मनमें अभिचार । ऐसा बनूं क्या मैं भस्मासुर । कहता अर्जुन ॥ ज्ञा० २-३८ ॥ मैं द्रोण पर शर-संधान कैसे करूं ? वह मेरे अग्र गुरु हैं-यह कहते समय अर्जुन पूछता है क्या मैं भस्मासुर बनूं ? भस्मासुर शिव-भक्त है । वह शिवजीके भस्मसे उत्पन्न हुआ था इसलिये भस्मासुर कहलाता है । इसने तप करके शिवजीको प्रसन्न कर लिया । प्रसन्न शिवजीने वर मांगनेको कहा । तमोगुणी असुर वर मांगेगा भी क्या मांगेगा ? उसने वर मांगा “मैं जिसके सिर पर हाथ रखुं वह जलकर राख हो जाय ।” शिवजीने कहा “तथास्तु ।” बस, वह जो मिले उसके सिर पर हाथ रखकर शक्ति प्रदर्शन करने लगा । एक बार नारद उसकी चपेटमें आ गये । नारद पर वह अपनी शक्ति-परीक्षण करने लगा । नारदने कहा "अरे मूर्ख ! मेरे सिर पर हाथ रखकर क्या मिलेगा ? कोई काम करते समय “इससे क्या लाभ होगा ?” यह देखकर करना चाहिये । यही बुद्धिमानीका लक्षण है। मेरे सिर पर हाथ न रखकर यदि शिवजीके सिर पर हाथ रखोगे तो शिवजी राख हो जायेंगे। तुमको कैलास पर्वतके साथ पार्वती जैसी सुंदर पत्नी मिलेगी !" ज्ञानेश्वरी ८८
बात भस्मासुरको जच गयी । उसने नारदको प्रणाम किया । "आपने बढ़िया बात बताई । और किसीने ऐसी बात नहीं बतायी थी" कहकर वह एक साथ कैलासपति और उमापति बननेकी उमंगमें शंकर पर दौड़ गया ! नारदने भस्मासुरमें लोभ जगाया और लोभका अंधा अपनी ही जड़ काटने चल पड़ा । शंकर पर अब संकट आया । वे विष्णुकी ओटमें गये । बिना सोचे समझे "मांगा वरदान, दिया वरदान" का परिणाम भी चखनेको मिल गया उनको । तब विष्णुने, नारदके जगाये हुए लोभके अनुरूप पार्वतीसे भी सुंदर, मोहिनीके रूपमें सामने आकर भस्मासुरको नृत्यमें उलझा कर अपने हाथसे अपनी राख बननेको बाध्य किया । इसीको उदाहरणके रूपमें रख कर अर्जुन श्रीकृष्णसे पूछ रहा है "मैं भस्मासुर जैसा पाप करूं क्या ?" देख तू जनकादिक । कर्मजात हैं अशेष । न छोड़के मोक्ष सुख । पाये यहां ॥ ज्ञा० ३-१५२ ॥ मिथिलेश जनकराजा कर्मयोगी, अनासक्त न करनेकासा सब कुछ कर्म करनेमें कुशल । इसलिये वह क्षत्रियोचित सब कुछ कर्म करने पर भी फलासक्त न होनेसे-मुक्तावस्थाको प्राप्त हुआ । यह श्रीकृष्णने कहा है । जनकराजाने कर्म-द्वारा मोक्ष प्राप्तिका आदर्श विश्वके सामने रखा है । मृत गुरु-पुत्रको दिया जीवन । तूने देखा है यह कार्य महान् । औ' मैं कर रहा कर्म स-लगन । प्रसन्न चित्तसे ॥ ज्ञा० ३-६३ ॥ "कर्म बंधन कारक नहीं । वह अनिवार्य साधन है !" इस बातको कहते हुए अपना ही उदाहरण अर्जुनके सम्मुख रखकर यह बात कही है । कृष्ण सांदीपनीके शिष्य । बलरामके साथ श्रीकृष्ण धनुर्वेद सीखनेके लिये अवंती नगरके पास रहनेवाले आचार्य सांदीपनीके पास गये । वह शस्त्राभ्यासके साथ शास्त्राभ्यास भी किया । धनुर्विद्याके साथ वेद वेदांगोंका भी अध्ययन किया । विद्याभ्यास पूरा हुआ । स्नातक बन कर आते हुए श्रीकृष्णने गुरूसे आग्रहपूर्वक पूछा "पूज्यवर ! आपको गुरुदक्षिणा क्या दूं !" आचार्य सांदीपनीका जीवन कृतार्थ जीवन था । किंतु उसमें एक व्यथा थी । उनका इकलौता पुत्र दत्त ! अकस्मात समुद्रमें डूब गया था । आचार्य सांदीपनी को वही एक दुःख था । आचार्यने अपना दुःख प्रिय शिष्यसे कहा । शिष्य भी लोकोत्तर था । गुरुकी इच्छा पूर्ण करनेकी शक्ति रखता था । गुरुकी इच्छा सुनते ही श्रीकृष्ण बलरामको साथ लेकर गुरु पुत्रके शोधार्थ यमलोक गये । वहां प्रत्यक्ष कालसे युद्ध किया और उसको जीत कर गुरु-पुत्रको ले आये । ऐसा लोकोत्तर पराक्रम करनेके बाद भी मैं लगनसे सभी कर्म करता हूं । यह कहते हुए अर्जुनको कर्मकी प्रेरणा देते हैं । शंभुने प्रसन्न चित्त । उपमन्युको जो भार्त । दिया जैसे दूधभात । क्षीराब्धी ही ॥ ज्ञा० ५-११ ॥ उपमन्यु व्याघ्रपादका ज्येष्ठपुत्र । व्याघ्रपाद वसिष्ठ गोत्रोत्पन्न एक अकिंचन ब्राह्मण । बड़ाभाई उपमन्यु छोटा धौम्य । माता दोनोंको आटा घोलकर दूध कहकर पिलाती थी । दोनों इसी पर प्रसन्न थे । (7) ८९ परिशिष्ट ४
एक दिन खेलनेके लिये दोनों किसी दूसरे आश्रममें गये । वहां अन्य बच्चोंके साथ इनको भी गायका असली और ताजा दूध मिला । अब तक इसने असली दूध चखा भी नहीं था । एक बार दूध चखनेके बाद या दूधका स्वाद लेनेके बाद दूधके नामसे भका आटेका घोल वह क्यों लेने लगा । वह असली दूधके लिये मांके पास हठ करने लगा । तब मांने उद्विग्न होकर कहा “तुमने पूर्वजन्ममें ऐसी ईश्वर-भक्ति कहां की थी कि तुमको इस जन्ममें असली दूध मिले !” यह सुनकर उपमन्युने तुरंत शिवजीकी उपासना प्रारंभ की । बालककी इस आराधनाने घोर तपका रूप ले लिया और शिवजीने प्रसन्न होकर उसको क्षीरसागर ही दे डाला । सुदामाके चिउडके हित । खोली गांठ ॥ ज्ञा० ९-३९४ ॥ ऊपरकी दो ओवियोंमें भगवान अपनी महान संपदाका वर्णन करके मुझे किसी भी बातकी कमी नहीं किंतु— भक्तोंकी ओरसे प्रेमसे दी हुई कोई वस्तु मैं कितने आनंदसे स्वीकार करता हूँ यह कहते हुए श्री सुदामाका स्मरण कर रहे हैं। सुदामा अत्यंत दरिद्री ब्राह्मण । कृष्णका बचपनका मित्र । साथी, गुरु बंधु, आचार्य सांदीपनीके यहां विद्याभ्यास करते समय दोनों साथ थे । साथ साथ गुरुसेवा करते थे । आगे श्रीकृष्ण द्वारकामें वैभवके शिखर पर पहुंच गये और सुदामा दारिद्र्यमें पिसते रहे । कृष्णसे कुछ मांग सकते हैं, मांगना चाहिए यह बात भी कभी उसके मनमें नहीं उठी । किंतु बार बार वह पत्नीसे अपनी बचपनकी बात कहता, कृष्णका प्रेम, प्रेमपूर्ण बर्ताव करता, और अपने आप गद्गद होता । यह सुनकर पत्नी उससे कृष्णसे कुछ याचना करनेको कहती । पत्नीके बार बार कहने पर आखर सुदामा तैयार हुवा । किंतु इतने सालके बाद मित्रके पास जाते समय कुछ भेंट ले जानी चाहिए और कृष्णको भेंट ले जाने जैसा घरमें कुछ है नहीं । कृष्णके पास जाते समय भेंटकी सबसे बडी समस्या हो गयी । अंतमें सुदामाकी पत्नी कहींसे थोडा चिउडा मांग लायी । उसको फटी हुई धोतीमें बांध दिया और सुदामाजी कृष्णके प्रेमका स्मरण करते करते, उनके साथ क्या क्या और कैसे बोलना चाहिए इसका विचार करते करते द्वारका आये । श्रीकृष्णने सुदामाकी बहुत आव भगत की । स्वयं उसके पैर धोये । यह सब देखकर सुदाम दंग रह गया । बेचारा सुदामा, कृष्णको अपने चिउडेकी भेंट क्या बताता ? उसके पास प्रेम था । प्रेमसे वह पुरानी बातोंका ही स्मरण करके कहने लगा और उसी बचपनके आनंदमें हंसने खेलने लगा । तब कृष्णने पूछा “अरे भाई ! वह सब रहने दे ! अब भाभीने मेरे लिये खानेको क्या दिया है ?” सुदामाका संकोच देखकर स्वयं श्रीकृष्णने ही चिउडेकी पोटली की गांठ खोल कर उसको प्रेमसे खाया । सुदामाको भी कृतार्थताका अनुभव हुवा । कृतार्थताके अनुभवके बाद भला मांगना क्या रहा ? अपना दारिद्र्य मिटानेके लिये कृष्णके पास कुछ मांगनेके विचारसे द्वारका गया हुवा सुदामा कृष्णने मेरा लाया हुवा चिउडा खाया इसी आनंदमें झूमता हुवा घर जा गया । देनेका आनंद अनुभवनेके बाद भला मांगनेका दुःख रहता कहां ? किंतु सुदामा अपने घरके पास आ कर देखता है “जहां भिक्ष-दारिद्र्य बसा हुवा था वहां सर्व संपदाका विलास था ! प्रेमसे लाये चिउडेका मंगलमय प्रसाद-प्रासाद प्राप्त हो चुका था ! पकडा मगरने गजेंद्रको । उसने स्मरण किया मुझको । व्यर्थ किया अपनी पशुताको । पाकर मद्रूप ॥ ज्ञा० ९-४४१ ॥ ज्ञानेश्वरी ९०
पाण्ड्य देशका राजा इंद्रद्युम्न । जब वह तप कर रहा था तब अगस्त्य ऋषि वहां आये । ध्यानस्थ इंद्रद्युम्नने अगस्तिको न देखा न प्रणाम किया । वह वैसे ही बैठा रहा । "इतना मदोन्मत्त यह कौन है ?" अगस्तिके मनमें आया । वृद्ध गुरुजनोंके आनेके बाद उनको उत्थान न देकर बैठा रहनेका यह अपराध देख कर अगस्तिने कहा "तू मदोन्मत्त हाथी बन जा !" और शापवाणी सुनकर सावध हुए राजाने सामने अगस्तिको देखतेही श्रद्धा भक्तिपूर्वक प्रणाम करके स्तवन किया । तब अगस्तिने कहा "हाथी बननेके बाद तुझे एक मगर पकडेगा और आदि पुरुष तेरी रक्षा करके मोक्ष देगा !" इंद्रद्युम्न हाथी बन कर मदमें झूमता हुवा वनमें भटकने लगा । और जब पानी पीने गया तब वहीं पर पडे मगरने इस गजराजको पकडा । गजराजने उस मगरसे अपनेको छुडा लेनेका खूब प्रयास किया । किंतु व्यर्थ । आखिर गजराजने सूंडसे वहीं पर उगे एक कमलको तोड ऊपर उठाते हुए आदिपुरुषका स्मरण किया तो विष्णुने मगरको मारकर गजराजका उद्धार किया । मेरा नरसिंहका भूषण । उसकी महिमा ॥ ज्ञा० ९-४४९ ॥ प्रल्हादका परिचय तीसरे परिशिष्टमें आया है। यहां प्रल्हादके लिये मैं नारसिंह बन कर आया यह कहा है । वैसे ही भयके कारण । निशिदिन कर चिंतन । अखंड वैर धर मन । कंस चैद्यादि ॥ ज्ञा० ९-९६५ ॥ भगवत्स्मरणका कारण कोई भी हो, किंतु उसीका स्मरण हो और वह सतत हो; इसीसे मुक्ति मिलती है। यह कहते समय ऊपरका उदाहरण दिया है। कंस कृष्णका महान शत्रु । कृष्णके भयसे वह सदैव कृष्णको कैसे मार डालें इसीका चिंतन करता था । इससे उसको सदैव सर्वत्र कृष्ण ही कृष्ण हो गया था । कृष्ण जन्मसे पहले ही अशरीरी वाणीसे उसको ज्ञात हो गया था कि देवकीके आठवे पुत्र कृष्णसे तुम्हारी मृत्यु होगी । इससे वह वसुदेव-देवकीको बंदीगृहमें रखकर जनमते ही वसुदेव देवकीके बच्चोंको मारने लगा। कृष्ण-जन्मके पहलेसे ही कृष्ण-चिंतन । जन्मके बाद वह बच निकला । अब बाल्यावस्थामें ही उसको मार डालनेका विचार करने लगा । जैसे जैसे कंस अपने प्रयत्नमें असफल होता गया और कृष्ण बढ़ता गया "मुझे मारनेवाला वैरी !" के रूपमें उसका चिंतन गहरा होता गया । परिणाम स्वरूप सर्वत्र उसको कृष्ण-दर्शन होने लगा । इसी स्थितिमें कृष्णने उसको मार डाला । तब भला बिना कृष्णके और कौन उसका आसरा होगा ? कंस भी कृष्णरूप हो गया ! वही चेदि राजा शिशुपाल । दमघोषका पुत्र । कृष्णकी बुआका लड़का । जब इसका जन्म हुवा तब इस शिशुका रूप विचित्र था । तीन आँखें थीं । इसके माता-पिता इसको मार डालनेको तैयार हो गये थे । इतनेमें अशरीरी वाणी हुई "यह बालक आगे चलकर अत्यंत पराक्रमी होगा । जिसकी गोदमें बिठानेसे इसकी तीसरी आंख जायेगी उसीके हाथों यह मरेगा !" "आगे चलकर कृष्ण अपनी बुआका बच्चा देखने आया । कृष्णने स्वाभाविक ही बच्चेको गोदमें लिया और तीसरी आंख गायब हुई । बुआ कृष्णके सामने रोईं । कृष्णने कहा "मैं इसके सौ अपराध भी सहन करूंगा !" माँने सोचा हो गया ! "यह सौ अपराधसे भी अधिक क्या करेगा !" शिशुपालने कृष्णको अपना शत्रु मानकर उससे वैर करना प्रारंभ किया । कंसकी भांति उसके नाशका विचार करने ९१ परिशिष्ट ४
लगा । मौका बेमौका कृष्णका विरोध करने लगा । उनको भला बुरा कहने लगा । वह रुक्मिणीसे विवाह करना चाहता था किंतु कृष्णने रुक्मिणीको जीता ! इससे वह अधिक ही चिढ़ गया । रुक्मिणीके स्वयंवरमें भी वह कृष्णसे लड़ने जाकर आग गया था । किंतु आगे जब पांडवोंके राजसूय यज्ञमें कृष्णको अग्र पूजाका मान मिला तब यह भड़क उठा । वहीं पर यह कृष्णको भला बुरा कहने लगा ! जब जीभकी लगाम टूटी तब भला सौ अपराध भरनेमें कितनी देर लगती है। कृष्णको गालियां दे देकर थका हुआ शिशुपाल यज्ञ शालाके सभा-भवनके बाहर जाने लगा-राज-सभाका अपमान करके-तब दरवाजेमें ही कृष्णके सुदर्शनने इसका शिरच्छेदन किया !! कृष्ण विरोधकी परमावधिमें कृष्णसे मृत्यु ही कृष्णमें विलीनता है । नारद ध्रुव अक्रूर । शुक और सनत्कुमार । भक्तिसे मैं धनुर्धर । हुआ प्राप्त ॥ ज्ञा० ९-४६ ॥ नारद । पहले परिशिष्टमें परिचय आया है । ध्रुव-पिता उत्तानपाद राजा । माता सुनीति । सुनीतिको सूनृता भी कहा गया है । राजा उत्तानपाद सुनीतताको नहीं चाहता था । उसकी प्रिय-पत्नी थी सुरुची । राजा इसीके साथ रहता था । उसके आधीनसा रहता था । एक बार उत्तानपाद राजा अपनी प्रिय-पत्नी सुरुचीके पुत्र उत्तमको गोदमें बिठाकर उससे प्यार करता था तब ध्रुव भी पिताकी गोदमें जा बैठ गया । तब उत्तानपादने उससे लाड़ प्यार नहीं किया और सुरुचीने तो उसको "यदि तुमको राजा की गोदमें बैठना है तो भगवानकी उपासना करके मेरी कोखसे जन्म लो !" कह कर नीचे उतार दिया । विमाताकी कठोर बात सुनकर ध्रुव खिन्न हुआ । तब भी राजा कुछ नहीं बोला । ध्रुव रोता हुआ अपनी मांके पास आया । स्वाभाविक ही माने उसको गोदमें उठा लिया । ध्रुवसे सब बात जान कर सुनीतिको बड़ा दुःख हुआ । किंतु वह समझ नहीं पायी कि ध्रुवके दुःखका अंत कैसे किया जाय । इसके बाद ध्रुव भगवानकी आराधना करनेके लिये पिताके राज्यसे निकल गया । इस समय भी राजा कुछ नहीं बोला । नारदको जब इस बातकी जानकारी मिली तब वह ध्रुवसे मिलने गये । नारदने ध्रुवसे बातें कीं । ध्रुवका क्षात्रतेज और स्वात्माभिमान देख कर नारद प्रभावित हो गये । उन्होंने ध्रुवके सिर पर हाथ रख कर उसको द्वादशाक्षरी मंत्र दिया और यमुना किनारे पर मधुवनमें जा साधना करनेको कहा । ध्रुव मधुवन गया और नारद उत्तानपादके पास । उत्तानपादसे नारदने कहा "तुम्हारा ध्रुव महापद् पाकर तुम्हारे पास आयेगा !" ध्रुवकी भगदाराधना प्रारंभ हुई । बाल हठ ! भविष्यके अज्ञानके कारण निर्माण होनेवाला असीम धैर्य । ध्रुवने अन्न जल भी छोड़ दिया । वह एक पैर पर खड़ा हुआ । ध्रुवके तपके पुण्य-भारसे पृथ्वी कांपने लगी । उसके निग्रहसे इंद्रादि देवता अकुला उठे । देवताओंने भगवानकी प्रार्थना की और भगवान विष्णु ध्रुवके सम्मुख प्रत्यक्ष हुए । विष्णुने उसके गालको वेद-शंखका स्पर्श किया और ध्रुव वेद-वाणीसे स्तवन करने लगा । विष्णुसे इसने अचल-स्थान मांग लिया । ध्रुव घर लौट आया । ध्रुवकी लौटनेकी बात सुनकर राजाको सच नहीं लगा । फिर उसको नारदकी बात याद आयी । तब उसको महान आनंद हुआ । उसी आनंदमें यह शुभ संवाद लानेवालेको राजाने गलेका हार उतार कर दिया और ध्रुवका स्वागत करने दौड़ा । सजाये हुये ज्ञानेश्वरी ९२
राज-हाथी पर बिठा कर राजा ध्रुवको घर लाये। राजाने उसका मस्तक चूम लिया। सुरुचीने “चिरंजीवी” होनेका आशीर्वाद दिया। ध्रुव उत्तमके साथ बढने लगा। ध्रुवका विवाह हुवा। मृगयामें गये उत्तमकी एक यक्षसे लडाई हुई और उत्तम मारा गया। यह सुनकर ध्रुवने यक्षनगरी अलकावती पर आक्रमण कर दिया। ध्रुवने वहां यक्षोंके गुह्यक-कुलका संहार करना प्रारंभ किया। तब उसके पितामहने ध्रुवका समाधान करके यक्ष-कुलको बचा लिया। आगे अनेक वर्ष राज्य करके अपना राज्य पुत्रोंको दे ध्रुव स्वर्ग गया ! (१) अक्रूर-सात्वत वंशका यादव। श्वफल्क राजाका पुत्र। माताका नाम गांदिनी। इस पर जैसे कंसका विश्वास था वैसे बलराम और कृष्णका भी था। इसीलिये कंसने कृष्णको मधुरामें बुलानेके लिये इसको भेज दिया था। आगे धृतराष्ट्र पांडवोंसे कैसे व्यवहार करते हैं इसकी जानकारी लाने के लिये कृष्णने इसीको हस्तिनापुर भेजा था। यह कृष्णका विश्वासी अनुचर था। (२) शुक-व्यासका पुत्र। महान बालयोगी। स्वयं महादेवने इसका उपनयन किया। बृहस्पतिने इसको वेद सिखाये। व्यासने इतिहास, राजनीति आदि सिखाया। इसने परीक्षितिको भागवत कहा। युधिष्ठिरकी मय सभामें भी यह गया था। अंतमें इसने कैलासमें जाकर शरीर त्याग किया। सनत्कुमार-इसने नारदको उपदेश दिया। इसने अनेक लोगोंको उपदेश दिया है। आज भी इसके नाम पर वास्तुशास्त्र, सनत्कुमार संहिता, सनत्कुमार कल्प, सनत्कुमार तंत्र आदि ग्रंथ मिलते हैं। आशीर्वादसे जिनके। बने आयुष्य अग्निके। दिया सिंधुने उनके। प्रेमसे नीर ॥ ज्ञा० ९-४७८॥ श्वेतकी राजाने सतत बारह वर्ष तक यज्ञ किया। उसमें जो सतत घीकी आहुतियां पडी उससे अग्निका पेट खराब हो गया। उसे अजीर्ण होकर जाड्य आया। तब वह उपाय पूछनेके लिये ब्रह्मदेवके पास गया। ब्रह्मदेवने अग्निको “अनेक औषधियुक्त खांडव वनको भक्षण कर !” ऐसा उपाय बताया। तब अग्निने ब्राह्मण वेषमें कृष्णार्जुनके पास जा कर खांडव वनका दान मांग लिया। खांडव वनको भक्षण करनेसे अग्निका जाड्य गया और उसका आयुष्य बढा। दिया सिंधुने उनके। प्रेमसे नीर ॥ वडवाग्नि समुद्रमें रह कर उसका पाणी सोखता जाता है। समुद्र उसको नित नया जल देकर स्वयं सीमामें रहता है। अब तक यह पदमुद्रा। हृदय पे धरी है सुभद्र। अपने ऐश्वर्य समुद्र। रक्षा हेतु ॥ ज्ञा० ९-४८०॥ भृगु अनेक हैं। सबसे प्रथम भृगुने ही अग्निका शोध किया। ऋग्वेदमें है “अग्नि सबसे पहिले भृगुको मिला !” भृगु ब्रह्माका मानस-पुत्रोंमें एक। भृगुकुल ऋषियोंमें उच्चकुल माना जाता है। तप-सामर्थ्यमें संपन्न। एक बार भृगु-ऋषिके मनमें आया देखें ब्रह्मा विष्णु महेशमें कौन बड़ा है। ब्रह्मा और ९३ परिशिष्ट ४