ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजनमेजयने भगवदाराधना की । भगवानने वेदव्यासको जनमेजयको भारत सुनाकर शापमुक्त करनेको कहा । वैशंपायन ऋषिने वेदव्यासकी आज्ञासे जनमेजयको भारत सुनाया । भारत श्रवणसे जनमेजय रोग मुक्त होगया । ज्ञानेश्वर महाराजने महाभारतका माहात्म्य कहते समय इस प्रसंगका उल्लेख किया है । अथवा जैसे टिटहर । सुखाना चाहता सागर । वैसे अल्पज्ञ यह भार । उठाता है ॥ ज्ञा० १-६८ ॥ भारत भरमें एक जनश्रुति प्रचलित है । एक बार एक टिटहरने समुद्र किनारे अपने अंडे रखे थे । समुद्रके पानीके बढ़ावमें वे बह गये । तब टिटहर समुद्रसे अपने अंडे मांगने लगा । समुद्र वह अंडे नहीं देता । टिटहरने यह देखकर समुद्रको सुखाकर अपने अंडे लेनेका निश्चय किया और अपनी चोंचसे समुद्र सुखाने लगा !! ज्ञानेश्वर महाराज नम्रतासे अपने गीतार्थ कहनेके प्रयासको उस टिटहरके प्रयाससे तुलना कर रहे हैं । ध्वजस्तंभ पर वानर । जो है मूर्तिमंत शंकर । सारथी स्वयं शांर्गधर । अर्जुनका ॥ ज्ञा० १-१४१ ॥ ध्वजस्तंभ पर वानर, अर्जुनको कपिध्वज कहा गया है। महाभारतके युद्धमें स्वयं हनुमानजी अर्जुनके रथका ध्वज संभालकर बैठे थे । इस घटनाके विषयमें ऐसी एक जनश्रुति है कि अर्जुनने एक बार प्राचीन ऐतिहासिक घटनाओंके विषयमें श्रीकृष्णसे चर्चा करते समय कहा “ रामको लंकामें जाते समय सेतु बांधनेकी भला क्या आवश्यकता थी ? उन्होंने अपने बाणोंसे ही सेतु क्यों न बनाया ? इस परसे लगता है राम धनुर्विद्यामें उतना निपुण नहीं था !” श्रीकृष्ण अर्जुनके मनकी बात समझ गये । साथ साथ श्रीकृष्णने यह भी सोचा कि अर्जुनके अहंकारको तोडनेका मौका भी सहज मिल रहा है । श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा “ रामकी सेना बडी शक्तिशाली थी । उनके सैनिक शक्तिशाली थे । बाणका सेतु उनके चलनेसे टूट जाता !” “ मैं किसी भी हालतमें न टूटनेवाला सेतु बना सकता हूं । संभव है कि राममें यह शक्ति नहीं थी किंतु मुझमें अवश्य है !” अर्जुनने कहा । ‘ रामसेनाका एक सैनिक हनुमानजी अब भी जीवित है ।’ श्रीकृष्णने कहा । “ तुम यमुना पर बाणका सेतु बनाओ और हनुमानजीको उस सेतु परसे उस ओर ले जाकर दिखाओ !” अर्जुनने मान लिया । श्रीकृष्णने हनुमानजीको बुला लिया । हनुमानजी आये । अर्जुनने सेतु बनवाया । हनुमानजी सेतु परसे उस पार जानेको तैयार नहीं । अर्जुनने कहा “ सेतु बडा सुदृढ है ! डरनेकी कोई बात नहीं है ।” कृष्णने भी ढाढस दिलाया और हनुमानजीने एक पैर रखते ही सेतु टूटकर नीचे आगया ! इससे अर्जुन लज्जित हुआ । उन्होंने धनुर्बाण डाल दिये । मेरी धनुर्विद्या व्यर्थ है । मेरा जीना व्यर्थ है ! वह अग्निप्रवेश करनेका विचार करने लगा । वानरका एक पैर रखते ही मेरे बाणोंका सेतु टूट गया । मैं किस कामका हूँ ! तब श्रीकृष्णने अर्जुनको दुबारा सेतु बांधनेको कहा । “ एक बार कुछ हुआ । देखो दुबारा प्रयत्न करो ।” अर्जुनने दुबारा सेतु बांधा । श्रीकृष्णने सेतुको सुदर्शनका सहारा दिया । ज्ञानेश्वरी ८६