ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट चौथा नष्ट हुए दोष जनमेजयके । ज्ञा० १-३७ ऋषिके शापके कारण जनमेजयके पिता परीक्षितको सर्पदंश हुवा और वह चल बसा । इसका बदला लेनेके लिये जनमेजयने सर्पसत्र नामका यज्ञ किया और सर्प-जातिका संहार करना प्रारंभ किया । किंतु इस संहारमें मुख्य जो तक्षक वही रह गया । उसकी आहुति नहीं पड़ती थी । क्यों कि उसको इंद्रका सहारा मिला था । इंद्रने ब्राह्मण वेषमें आकर जनमेजयसे याचना करके तक्षकको जीवन-दान दिलाया ! इस घटनासे-इंद्रके ब्राह्मण-वेषमें आकर जनमेजयको धोखा देनेसे-जनमेजयके मनमें ब्राह्मणोंके विषयमें तिरस्कार उत्पन्न हुवा । उसने ब्राह्मणोंको अपने राज्यसे निकलवा दिया । यह सुनकर वेदव्यासजीको बड़ा दुःख हुवा । जनमेजयके कुलके विषयमें वेदव्यासजीको अभिमान था, आत्मीयता थी । सदैव वे उस कुलके उत्कर्षकी कामना करते थे । उसके गौरवकी आशा करते थे । वे चाहते थे कि उस कुलका जयजयकार मैं सुनूं । इसलिये वेदव्यासजीने महाभारत-ग्रंथके साथ अपने दो शिष्योंको जनमेजयके पास भेज दिया क्यों कि जिस ग्रंथमें उसके कुलगौरवकी गाथा है वह सुने । उसको सही गलत बातका बोध हो, किंतु जनमेजयने उच्छ्रंखल होकर वेदव्याससे आये हुए शिष्योंको अपमानित किया । अपने पूर्वजोंको भी भला बुरा कहा । अपने पूर्वजोंको मूर्ख बतानेवाले जनमेजयकी उच्छ्रंखलतासे वे शिष्य क्रुद्ध हुए । उन्होंने शाप दिया "इस अशोभनीय कर्मके परिणाम स्वरूप तुम्हे कुष्ठ रोग हो !" इसके बाद वेदव्यास उससे मिले । उन्होने जनमेजयसे कहा "तुम निश्चित दिशामें मत जाओ । वहां जो स्त्री मिलेगी उससे विवाह मत करो । उसके कहनेके अनुसार बर्ताव मत करो" आदि । किंतु जनमेजयने यह सभी किया । राजाने रानीकी सम्मतिसे पिपीलिका पर्वत पर "नरयाग" किया । उस यज्ञमें इंद्रकी आहुति पड़नेका प्रसंग आया और इंद्र विष्णुकी शरण गया । विष्णुने यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणोंको मोहित किया । उन ब्राह्मणोंको निद्राने घेर लिये । वे आहुति देते देते वहीं सो गये । यज्ञकुंड बुझ गया । राजा रानीको जब यह ज्ञात हुवा वे यज्ञशालामें आये । सभी ऋत्विज सो गये हैं । रानीके सलाहसे राजाने उनको जगानेके लिये उन पर ठंडे जलके छींटे डाले । किंतु वे जल कण ही भयंकर शस्त्र बने और वे सब ब्राह्मण वहीं टुकड़े टुकड़े होकर मर गये । इससे जनमेजय कुष्ठ-रोगी हो गया । जनमेजय यह देखकर घबड़ा गया । वह वेदव्यासकी शरण गया । वेदव्याससे रोग-मुक्तिका उपाय पूछा । वेदव्यासने तब उससे कहा "तूने अपने पूर्वजोंकी निंदा की । इसलिये यह सब हुवा । अब तू भगवानका स्मरण कर । उसकी कृपासे तू रोग-मुक्त हो जायेगा !" ८५ परिशिष्ट ४