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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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राज-हाथी पर बिठा कर राजा ध्रुवको घर लाये। राजाने उसका मस्तक चूम लिया। सुरुचीने “चिरंजीवी” होनेका आशीर्वाद दिया। ध्रुव उत्तमके साथ बढने लगा। ध्रुवका विवाह हुवा। मृगयामें गये उत्तमकी एक यक्षसे लडाई हुई और उत्तम मारा गया। यह सुनकर ध्रुवने यक्षनगरी अलकावती पर आक्रमण कर दिया। ध्रुवने वहां यक्षोंके गुह्यक-कुलका संहार करना प्रारंभ किया। तब उसके पितामहने ध्रुवका समाधान करके यक्ष-कुलको बचा लिया। आगे अनेक वर्ष राज्य करके अपना राज्य पुत्रोंको दे ध्रुव स्वर्ग गया ! (१) अक्रूर-सात्वत वंशका यादव। श्वफल्क राजाका पुत्र। माताका नाम गांदिनी। इस पर जैसे कंसका विश्वास था वैसे बलराम और कृष्णका भी था। इसीलिये कंसने कृष्णको मधुरामें बुलानेके लिये इसको भेज दिया था। आगे धृतराष्ट्र पांडवोंसे कैसे व्यवहार करते हैं इसकी जानकारी लाने के लिये कृष्णने इसीको हस्तिनापुर भेजा था। यह कृष्णका विश्वासी अनुचर था। (२) शुक-व्यासका पुत्र। महान बालयोगी। स्वयं महादेवने इसका उपनयन किया। बृहस्पतिने इसको वेद सिखाये। व्यासने इतिहास, राजनीति आदि सिखाया। इसने परीक्षितिको भागवत कहा। युधिष्ठिरकी मय सभामें भी यह गया था। अंतमें इसने कैलासमें जाकर शरीर त्याग किया। सनत्कुमार-इसने नारदको उपदेश दिया। इसने अनेक लोगोंको उपदेश दिया है। आज भी इसके नाम पर वास्तुशास्त्र, सनत्कुमार संहिता, सनत्कुमार कल्प, सनत्कुमार तंत्र आदि ग्रंथ मिलते हैं। आशीर्वादसे जिनके। बने आयुष्य अग्निके। दिया सिंधुने उनके। प्रेमसे नीर ॥ ज्ञा० ९-४७८॥ श्वेतकी राजाने सतत बारह वर्ष तक यज्ञ किया। उसमें जो सतत घीकी आहुतियां पडी उससे अग्निका पेट खराब हो गया। उसे अजीर्ण होकर जाड्य आया। तब वह उपाय पूछनेके लिये ब्रह्मदेवके पास गया। ब्रह्मदेवने अग्निको “अनेक औषधियुक्त खांडव वनको भक्षण कर !” ऐसा उपाय बताया। तब अग्निने ब्राह्मण वेषमें कृष्णार्जुनके पास जा कर खांडव वनका दान मांग लिया। खांडव वनको भक्षण करनेसे अग्निका जाड्य गया और उसका आयुष्य बढा। दिया सिंधुने उनके। प्रेमसे नीर ॥ वडवाग्नि समुद्रमें रह कर उसका पाणी सोखता जाता है। समुद्र उसको नित नया जल देकर स्वयं सीमामें रहता है। अब तक यह पदमुद्रा। हृदय पे धरी है सुभद्र। अपने ऐश्वर्य समुद्र। रक्षा हेतु ॥ ज्ञा० ९-४८०॥ भृगु अनेक हैं। सबसे प्रथम भृगुने ही अग्निका शोध किया। ऋग्वेदमें है “अग्नि सबसे पहिले भृगुको मिला !” भृगु ब्रह्माका मानस-पुत्रोंमें एक। भृगुकुल ऋषियोंमें उच्चकुल माना जाता है। तप-सामर्थ्यमें संपन्न। एक बार भृगु-ऋषिके मनमें आया देखें ब्रह्मा विष्णु महेशमें कौन बड़ा है। ब्रह्मा और ९३ परिशिष्ट ४