भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 1040, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1040

महेशको इसकी उद्दंडताका क्रोध आया किंतु विष्णुकी छाती पर लात मारने पर भी विष्णुको क्रोध नहीं आया । इतना ही नहीं विष्णु यह कहते हुए "मेरा हृदय वज्रके समान कठोर । आपके चरण कमलके समान कोमल । कहीं आपके पैरमें चोटे तो नहीं आयी ?" भृगु-ऋषिके पैर दबाने लगे । विष्णुके वनमाला, कौस्तुभ आदि आभूषणोंमें "भृगु-लांछन" भी एक भूषण है । विष्णु सदैव अपनी छाती पर भृगुके लातका चिन्ह सम्हालता रहता है ऐसी मान्यता है । शीतलताकी अपेक्षा कर । महादेवने मस्तक पर । धारण किया जो निरंतर । अर्धचंद्र ॥ ज्ञा० ९-४८६ ॥ समुद्र मंथनमेंसे चौदह रत्न निकले । उसीमें हालाहल विष भी निकला । वह विश्वको जलाने लगा । विश्व-संहारक इस विषको, जो विश्वको जलाते हुए फैल रहा है उसको रोके कौन ? तब सदाशिव आगे आये । उनका नामही सदाशिव ! विश्वकल्याणके इस महत्कार्यको वे कैसे ना कह सकते हैं ? वे इस विषको पी गये । इससे शरीरमें जलन होने लगी । वे नीलकंठ हो गये । तब शीतलताके उपायमें उन्होंने सिरपर अर्धचंद्रको धारण किया ! क्षयरोगी होता चंद्र जिस लोकका ज्ञा० ९-५०१ ॥ गुरु-पत्नी ताराका हरण किया इसलिये चंद्रको बृहस्पतिने क्षयी होनेका शाप दिया ऐसी पौराणिक कथा है । किसीके दंडसे विश्व स्थिर कराया । किसीसे नव विश्व ही है रचाया । सिंधुमें पाषाण तैराके उतराया । सैन्य तुमने ॥ ज्ञा० १०-३६ ॥ (१) वसिष्ठ और विश्वामित्रकी प्रतिस्पर्धाकी कहानियोंसे पुराण भरे पडे हैं । एक बार ब्रह्मदेवके सभामें यह प्रश्न उठा कि विश्वामित्रको ब्रह्मऋषि कहें या नहीं । इसके लिये साक्षी देनेके लिये समुद्र, सूर्य और मेरु पर्वतको ब्रह्म-सभामें जाना पडा । विश्वामित्र इन तीनोंको बुला लानेके लिये निकला । समुद्रने कहा यदि मैं ब्रह्मदेवकी सभामें आया तो वडवानल पृथ्वीको खा डालेगा । उसको पानी कौन देगा । तू वडवानलको पानी दे मैं ब्रह्म-सभामें चलूं ! सूर्यने कहा "विश्वको प्रकाश देनेकी व्यवस्था कर मैं चला !" मेरुने कहा "अरे ! मैं उठा तो पृथ्वी हवामें उड़ जायेगी उसकी क्या व्यवस्था करोगे ?" विश्वामित्रके पास भला इसकी क्या व्यवस्था थी ? अब वसिष्ठकी बारी आयी । वसिष्ठने अपने अंगवस्त्रसे सूर्यका काम किया; दंडसे मेरुका काम लिया; और कमंडलुके उदक प्रवाहसे समुद्रका । तीनो ब्रह्म-सभामें आये । (२) त्रिशंकु राजाको सशरीर स्वर्ग जाना था । विश्वामित्रने अपने यज्ञबलसे उसको स-शरीर स्वर्ग चढाया । किंतु इंद्र उसको ऊपर लेता ही नहीं । त्रिशंकु बीचमें ही लटक गया । तब विश्वामित्रने अपने तपोबलसे वहीं नयी सृष्टि रचना की । तब इंद्रने विश्वामित्रको समझा बुझाकर उसको इस कामसे विरत किया । (३) रामको लंकापर आक्रमण करनेके लिये समुद्र पर सेतु बांधना आवश्यक था । नल रामका स्थापत्य शास्त्री । तब नलने समुद्रमें जो पत्थर डाले वे डूबने लगे । सेतु तैयार कैसे होगा ? किंतु राम नाम लेकर जो पत्थर जलमें डाले वे तैरते रहे । इससे सेतु तैयार हुआ और वानर सेना लंकामें उतरी । ज्ञानेश्वरी ९४