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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1041

किसीसे आकाशमें सूर्यको पकड़वाया । किसीसे सागरका आचमन करवाया ॥ ज्ञा० १०-३७ ॥ (१) मारुतिका जन्म हुआ । जन्मते ही भूख लगी । आकाशमें लाल लाल सूर्यबिंब देखा । अच्छा फल मानकर मारुति उड़कर आसमानमें पहुंचे । अब मारुति सूर्यको पकड़कर निकल जायेंगे इतनेमें इंद्रने उस पर अपना वज्र फेंका । तब मारुति बेसुध होकर नीचे पड़े । किंतु इंद्रादि देवोने सब मारुतिके पिता वायुदेवके क्रोधसे मारुतिकी स्तुति की और उसको सुखमें लाये । तब इंद्रने " इसके बाद तुम पर वज्रका कोई प्रभाव नहीं होगा !” ऐसा वर दिया और मारुति वज्रदेही बने । किंतु वज्र प्रहारसे मारुतिकी ढुड्डी टूटी इसलिये उसको हनुमान कहते हैं । (२) इंद्रने वृत्रासुरको जब मारा तब वृत्रासुरके सभी अनुयायी भयसे कातर होकर समुद्रमें छिपे रहने लगे और रातके समय आकर ऋषियोंके यज्ञ ध्वंस करने लगे । उनको सताने लगे । इससे भीतिग्रस्त ऋषि अगस्तिफे पास आये और अगस्ति इस भयानक परिस्थितिका विचार करके सारा समुद्रही पी गये । साथ साथ सारे राक्षस भी अगस्तिके उदरस्थ हो गये तब अगस्तिने पिया हुवा समुद्र छोड़ दिया । प्राणों सह चूस लिये मैंने स्तन । पूतनाके ॥ ज्ञा० १०-२८८ ॥ कृष्ण नंद और यशोदाके पुत्रके रूपमें बढ़ रहा था और मथुरामें कंस उसको मार डालनेके षडयंत्र रचनेमें व्यस्त था । कंसने कृष्णको मारनेके लिये पूतनाकी योजना की । पूतना कंसकी बहन । कृष्णकी मौसी । पूतना सज धजकर अपने स्तनमें घोर विष लगाकर गोकुल गयी । इसने गोकुलके कई दूधमुहे बच्चोंको मार डाला । यह जैसे और घर गयी वैसे ही नंदके घर गयी । इसने प्रेमसे कृष्णको गोदमें लिया । कृष्णने भी सामान्य बच्चोंकी भांति इसके स्तन पकडे । इसने उसके मुखमें स्तन दिया और कृष्णने पूरी शक्तिके साथ स्तन चूसना प्रारंभ किया । पूतना तड़पने लगी किंतु कृष्ण स्तन छोड़ता ही नहीं, मुह हटानेकी बात ही नहीं करता । कृष्णने उसके प्राण भी सोक लिये । वह तड़प तड़प कर मर गयी । गिरिधर बन कूता आर्य । इंद्रकी महिमा ॥ ज्ञा० १०-२८९ ॥ छोटीसी आयुसे कृष्णने कई दैत्योंको मारा । इतना ही नहीं इंद्रका गर्व भंग भी किया । गोप सब मिलकर प्रत्येक वर्ष नया अन्न धान्य आते ही इंद्रके लिये अन्नकोटका इंद्रोत्सव करते थे । कृष्णने यह पद्धति बंद करायी और गोकुलका संरक्षक गोवर्धनगिरिका उत्सव किया । इससे क्रुद्ध इंद्रने गोकुल पर सतत जलवृष्टि की और जल-प्रलयकी विपत्ति आयी । तब कृष्णने अपने हाथसे गोवर्धन गिरिका छातासा आसरा बना कर सारे गोकुलकी रक्षा की । मिटाया कलिंदीका हृदय शूल । बचालिया ज्वालाग्रस्त गोकुल । बनाया मैंने ब्रह्माको पागल । बछडे बनाके ॥ ज्ञा० १०-२९० ॥ (१) कालिंदीके एक बड़े कुंडमें कहु कुछका कालिया नाग आ बसा था । वह इतना विषधर था कि उसके विषसे कालिंदीका पानी ही नहीं इर्दगिर्दकी हवा भी जहरीली बन गयी थी । इससे गाय और गोपालोंकी बड़ी क्षति हो रही थी । इसलिये कभी कोई उस ओर जाता ही नहीं था । भूखसे एक बार कई गोपाल अपनी गायें लेकर उस ओर गये और उस विषके प्रभावसे गायोंके साथ वहीं मर गये । इसका कारण जान कर तब कृष्ण कालिंदिके उस कुंडमें कूदे और ९५ परिशिष्ट ४