ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकालियासे लड़ कर उसको अधमरा कर दिया । कृष्ण उसको मारनेवाले ही थे किंतु उसीकी प्रार्थनासे उसको वहांसे उसके मूल स्थान भगा दिया और गायों तथा गोपाळोंको बचा लिया । ( २ ) महादेवके मनमें एकबार आया कि कृष्णकी सामर्थ्यकी परीक्षा देखनी चाहिए । उन्होंने सैकडो गाय और गोपाळोंको कहीं छिपा दिया और यहां कृष्णने ऐसे ही सैकडो गाय और गोपाळोंकी नयी सृष्टि की । एक वर्ष बीता । किसीको कुछ पता नहीं चला । तब महादेवने ही हार मानकर गाय और गोपाळ लौटा दिये । नहीं तो विचार कर देख अर्जुन । सन्यासी हो चुराई तूने बहन । किंतु विकल्प न हुआ मेरा मन । क्यों कि हम एक हैं ॥ ज्ञा० १०-२९४ ॥ कृष्ण कृष्णार्जुन-प्रेमकी एकता समझा रहे हैं । कृष्ण-बलरामकी बहन सुभद्रा, जब वह विवाह-योग्य हो गयी तब बलरामने अपना शिष्य दुर्योधनसे उसका विवाह करना सोचा । किंतु कृष्णके मनमें था अर्जुनसे उसका विवाह कर देना । अर्जुन तीर्थ-यात्रा करने गया था । वह तीर्थ-यात्रासे द्वारका आया । तब कृष्णने उसको संन्यासीके रूपमें बलरामका प्रेम प्राप्त करनेको कहा। यह संन्यासी “ अत्यंत विरक्त और तपोनिष्ठ होनेसे ” बलरामने इसे अपने घर पर ठा रखा । सुभद्राको उसकी सेवा करनेको कहा । ऐसी स्थितिमें एक बार सबने रैवतक पर्वत पर जानेका निश्चय कर सुभद्राको अर्जुनके रथ पर चढ़ाया । अर्जुनने कृष्णकी सूचना पाते ही रथ इंद्रप्रस्थकी ओर दौड़ाया । उसका पीछा करनेवाले सब हार गये । आगे सबको जब मालूम हो गया संन्यासी अर्जुन है तो सबको संतोष हुआ । उन प्रिय जनोंको भी छकाया । दस गर्भवास भी सहन किया । तूने विश्व-रूप नहीं दिखाया । किसीको भी ॥ ज्ञा० ११-३५ ॥ अंबरीष सूर्यवंशी राजा । वैवस्वत मनूका पोता । अत्यंत पराक्रमी और महान विष्णु-भक्त । एकादशी इसका व्रत था । एकादशीका उपवास करना और द्वादशीको प्रातःकालमें उपवास छोड़ना । उपवास छोड़ते समय एक द्वादशीको अतिथिके रूपमें दुर्वास ऋषि आये । “ आप नदी पर जाकर नित्य-कर्म करके भोजन करने आइए !” अंबरीषने प्राथमिक सत्कारके बाद प्रार्थना की दुर्वासा ऋषि नदी पर गये । किंतु समय पर नहीं आये । यहां द्वादशी अतिक्रांत हो रही थी । अर्थात् द्वादशी समाप्त हो त्रयोदशीका प्रारंभ होने जा रहा था । व्रतभंग न हो इसलिये अंबरीषने नैवेद्य करके देवपूजा समाप्त की और तीर्थ प्राशन करके व्रत-सांगता की । इस पर दुर्वास ऋषि क्रुद्ध हुए । उन्होंने अंबरीषके वधके लिये कृत्याका निर्माण किया और शाप दिया “ तू अनेक योनियोंमें जन्म लेगा !” कृत्या अब राजाका नाश करेगी इतनेमें भगवानके सुदर्शन चक्रने कृत्याका नाश किया और वह दुर्वासाके पीछे लगा । सुदर्शनसे बचनेके लिये दुर्वासा भागे । आगे आगे दुर्वासा पीछे पीछे सुदर्शन । कोई भी सुदर्शनसे दुर्वासाकी रक्षा नहीं कर सका । अंतमें दुर्वासा ऋषि भगवान विष्णुकी शरण गये । विष्णुने ऋषिसे कहा “ आप राजाके पास जाकर उससे क्षमा मांग लीजिये । अब तक वह आपके लिये उपवासी है ।” दुर्वासा ऋषि अंबरीषके यहां आया तो राजा ऋषिकी प्रतीक्षा में वैसे ही खडा था जैसे दुर्वासाके वहांसे भागते समय खडा था ! राजाने दुर्वासाका स्वागत किया । दुर्वासाने राजाकी क्षमा मांगी । राजाने सुदर्शनसे प्रार्थना की “ आप दुर्वासा ऋषिका पीछा छोडे !” सुदर्शनने दुर्वासाको छोडा । ज्ञानेश्वरी ९३