ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअंबरीष राजाको दुर्वासा ऋषिका पंक्तिकाम मिला। किंतु अनेक योनिमें जन्म लेनेका दुर्वासा ऋषिका शाप ? जिसके प्रतसे राजा व्रतस्थय था उस विष्णुने ले लिया और मत्स्य, कूर्म वराहादि हुए ! भक्तके लिये दस गर्भवास सहे!” “पहले होना था जब हमारा शहन” ॥ ज्ञा० ११-६०॥ जब कौरव और पांडव बडे हो गये तब घरमें नित नया झगडा होता था। एक दूसरेसे जलते कुढते रहते । धृतराष्ट्रने युधिष्ठिरको जो युवराज-पद दिया या वह दुर्योधनको खटका । तब दूरदर्शी धृतराष्ट्रने पांडवोंको कौरवोंसे दूर रखनेका निश्चय किया और उन्हें हस्तिनापुरसे दूर, वारणावत नगरमें जाकर रहनेकी आज्ञा दी। पांडव वारणावतमें रहने गये। वारणावत नगरमें पांडवोंके लिये जो भवन बनवाया था वह दुर्योधनने अत्यंत कपटसे लाक्षादि ज्वालाग्राही वस्तुओंसे बनवाया था । विदुरके ध्यानमें यह बात आयी। विदुरने बर्बर भाषामें युधिष्ठिरको यह सब बात बता कर वहांसे सुखरूप बाहर पडनेका गुप्त मार्ग भी बता दिया। घर बांधते समय ही विदुरने गुप्त रूपसे इसको बनवा दिया था। जब पांडव लाक्षागृहमें रहते ये तब वहां नित बडा दान धर्म चलता था। जो आता उसको भोजन मिलता। एक वृद्ध स्त्री एक दिन अपने पांच लडकोंको लेकर वहां आयी। रातको वह वहीं रही। विदुरसे उसी दिन सूचना आई “घरमें स्वयं आग लगा कर तुरंत घर छोड कर गुप्त-मार्गसे चले जाओ !” विदुरसे सूचना आते ही घरमें आग लगा कर पांडव गुप्तमार्गसे बाहर चले गये । आई हुई वृद्ध स्त्री अपने लडकोंके साथ जलकर वहीं मर गयी। उन छ लोगोंके जले हुए शव देख कर कौरवोंको लगा कि कुंती सह पांडव जल मरे। अर्जुन कहता है तब तूने ही बचा लिया । हिरण्याक्षुर दुराग्रहमें भरकर । मेरी बुद्धि-भूको बगलमें दबाकर । मोहार्णव सिंधुके गवाक्षसे अंदर । जा बैठा था ॥ ज्ञा० ११-६१ ॥ हिरण्याक्ष नामका राक्षस कभी पृथ्विको बगलमें दबा कर पातालमें जा छिप गया था। तब भगवान विष्णुने वराह-रूप धारण करके उसका वध किया और पृथ्वीकी स्थापना की। इस कथाकी उपमा लेकर अर्जुन अपने बुद्धि-भ्रमका वर्णन कर कहता है । पुत्रको पुकारता अजामिल । किया चिद्रूप ॥ ज्ञा० ११-१०४ ॥ कान्यकुब्ज देशमें अजामिल नामका एक ब्राह्मण रहता था। वह माता पिता पत्नी आदिका त्याग करके एक वेश्याके साथ रहता था। उससे वेश्याके कुछ बच्चे भी हुए थे । इनमें सबसे छोटे बच्चेका नाम नारायण रखा गया । मृत्युके समय पर यह नारायणको पुकारने लगा, जिससे विष्णुदूतोंने यमदूतोंको उस पर मृत्युपाश डालनेसे रोका। अजामिलने विष्णुदूत और यमदूतोंका यह संवाद सुना और विरक्त होकर उसने भगवन्नाम-स्मरणमें ही अपना आयुष्य बिताया। मरणोत्तर उसको परम गति मिली । अब तक शत्रुक्रा ही कलेवर । भूषण बना करमें ॥ ज्ञा० ११-१०५ ॥ कृष्णने सांदीपनी गुरुका मृतपुत्र ला दिया। उस समयकी एक घटना । पंचजन दैत्य शंखरूप धारण करके समुद्रमें छिप गया था। इससे लडकर कृष्णने इसका नाश किया और इसकी अस्थि- योंका शंख बनाकर हाथमें रखा । इसीलिये कृष्णके शंखको पांचजन्य कहते हैं। ९७ परिशिष्ट ४