ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वारपाल बना तू दान मांगकर । बलिके घरका ॥ ज्ञा० ११-१०६ ॥ प्रह्लादका पोता बलि । अत्यंत बलवान् । वैसे ही उदार और धर्मात्मा । देवोंसे उसका बार बार युद्ध होता और संजीवनीके कारण वह और उसके सैनिक जी उठते । उसने इंद्र-पदकी इच्छा करके सौ यज्ञ करनेका निश्चय किया और नवानवे यज्ञ पूरे किये । घबराये हुए देवोंने तब भगवान विष्णुकी प्रार्थना की और भगवान वामन बने । वामनने यज्ञमें आकर त्रिपाद भूमि दान में मांगी । बार बार गुरु शुक्राचार्यके विरोध करने पर भी बलिने वह दे दी। दानका पानी पड़ते ही वामन विराट हुए । उसने दो पादोंमें पृथ्वी और आकाश व्याप्त किया । “अब तीसरा पैर कहां रखूं ?” विराट वामनने प्रश्न किया । “मेरे मस्तक पर !” नत मस्तक बलि झुक गया !! तीसरे पादसे वामनने बलिको पातालमें दबा दिया । किंतु प्रसन्न होकर वर दिया “वैवस्वत मन्वंतर तक तू उपेंद्र और उसके बाद इंद्र बनेगा ।” “तब तक मैं तेरा द्वारपाल बनूंगा । सुदर्शन तेरी रक्षा करेगा !” कृतयुगसे पहले कार्तिक शुद्ध प्रतिपदाको यह दान दिया गया था । इसलिये उस दिनको बलिप्रतिपदा कहते हैं । इस भांति द्वारपाल बना तू दानमांगकर बलिके घरका । या मधुवनमें ध्रुवको जैसे । गंडस्थलको शंख लगानेसे । वेदमति कुंठित हो ऐसे । स्तवन किया उसने ॥ ज्ञा० ११-१८४ ॥ ध्रुवकी तपस्यासे प्रसन्न परमात्मा ध्रुवको दर्शन देने मधुवनमें दौड़ आया। ध्रुवने परमात्माका दर्शन किया । उसका स्तवन करना चाहा किंतु अज्ञान ! शब्द नहीं सूझता । तब भगवानने ध्रुवके कपोलोंको अपना शंख लगाया और ध्रुव वेदकी तुलनामें परमात्माका स्तवन करने लगा । आब्रह्म उदकसे जैसे व्याप्त था । अकेला मार्कंडेय ही तैरता था । विश्व-रूप विस्मयमें वैसे पार्थ । लगा लौटने ॥ ज्ञा० ११-१८७ ॥ मार्कंडेय ब्रह्मऋषि । अत्यंत तपस्वी, महान ज्ञानी, वैसा ही विरक्त । इसने परमात्माकी माया देखनेकी इच्छा की । भगवानने कहा “अच्छा !” जहां बैठा था वहांसे भयानक बवंडर छूटा । सारा विश्व जलमय हो गया । मार्कंडेय अकेला तैर रहा था तब उस जल-प्रलयमें एक वटपत्र पर छोटासा बालक तैर रहा है । उस बालकके श्वाससे मार्कंडेय ऋषि उस बालकके पेटमें पहुँच गये । वहां भी बाहरकी सृष्टिकी भांति और एक सुंदर सृष्टि थी वहां मार्कंडेय ऋषिका आश्रम था । वहां भी एक मार्कंडेय ऋषि बैठा था । बालकके श्वासके साथ बाहर आये । तब उसने देखा मैं आश्रममें बैठा हूं । न बवंडर न जल-प्रलय !! तब उसने सोचा जो जाना, देखा, वह सब माया है । क्षणिक है । तूने जब गो ग्रहणके समय । मोहनास्त्र छोड़ा तब धनंजय । भीरु उत्तरने भी होके निर्भय । विवस्त्र किया सबको ॥ ज्ञा० ११-४६९ ॥ कीचकवध होनेसे दुर्योधनको संदेह हुआ कि हो न हो पांडव विराट नगरमें ही हैं । तब उसने सोचा कि अज्ञातवासमें पांडवोंको पहचान कर उनको फिर वनवासमें भेजना चाहिए और दुर्योधनने विराटके यहांका गोधन हरण करनेकी योजना बनायी । कर्णादिको साथ लेकर दुर्योधन विराटराजाकी गायें ले चला । इस समय विराटराजा त्रिगतोंके राजा सुशर्मासे लड़ने गया था । समय देख कर ही दुर्योधनने घात किया था। जिस समय यह हमला हुआ उसी समय उत्तर-कुमार अपनी बहन उत्तराकी नृत्यशालामें था । उसने कहा “यदि मेरे साथ कोई अच्छा सारथी होता तो ज्ञानेश्वरी ९८