भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1045

मैंने शत्रुओंकी दुर्गत की होती !" और बृहन्नडा-अर्जुन-सारथ्य करने तैयार हो गयी । तब निरुपाय हो कर उत्तरकुमार लड़ाईके लिये चल पड़ा । किंतु प्रत्यक्षमें शत्रुओंकी बड़ी भारी सेना देख कर कांपता हुवा पीछे दौड़ने लगा । अर्जुन तब इसको रथमें बांध कर स्वयं लड़ने लगा । सबको अर्जुनने मोहनास्त्रसे बेसुध कर दिया और उत्तर कुमारसे उन बड़े बड़े सेनानियोंके वस्त्राभरणादि विजय वैभव चिन्होंको लुटवाकर उसके सिरपर मुफ्तका विजय और कर्तृत्वका सेहरा बांध दिया । इस प्रज्ञासे शंकर । सिकुडकर सभी ओर करता राख घूस-खोर । मन्मथकी भी ॥ ज्ञा० १३-२५ ॥ भगवान् शंकर अपना कैलासका राज्य छोड़कर शशानमें जा तप करने लगा । तब उस तपका भी भंग करनेवाला मन्मथ-काम ! शंकरने अपने तृतीय नेत्रसे उसका नाश किया । ब्रह्मदेवके हृदयसे कामकी उत्पत्ति है । रति उसकी पत्नी । सबके तपो भंगमें यह आगे । कहते जिसे योगी-जन । सांख्य-योग अर्जुन । जिसको कहनेमें मान । हुवा मैं कपिल ॥ ज्ञा० १३-५५७ ॥ कर्दम ऋषि एक प्रजापति । मनु-कन्या देवहूति इसकी पत्नी । इनका पुत्र कपिल, विष्णुका अवतार माना जाता है । कपिलका जन्म सिद्धपुरमें हुवा । कपिलका जीवन-वृत्त तीसरे परिशिष्टमें आया है । कपिल सांख्यशास्त्रका आदि आचार्य माना जाता है । कपिल माताको ब्रह्मज्ञान देकर पातालमें जा बसा । या एक ही दृष्टि काग दोनों ओर । फिराता चातुर्यसे स अवसर । जिससे होता है भ्रम धनुर्धर । कागकी हैं दो आंखें ॥ ज्ञा० १५-१३५ ॥ अपने वनवासके दिनोंमें राम लक्ष्मण सीता किसी एक आश्रममें रहते थे । सीता वहीं सूखनेवाले अपने खाद्य-पदार्थोंकी रखवाली करते बैठी थी । तब वहां एक कौवा आ कर सीताको बड़ा तंग करने लगा । उनके हकालने पर भी नहीं जाता था । रामने तब क्रोधसे इषीकास्त्रके मंत्रसे वहीं पर पड़ा एक तिनका कौवे पर फेंका और वह तिनका उस कौवेके पीछे वैसे ही पड़ गया जैसे दुर्वासा ऋषीके पीछे सुदर्शन पड़ा था । फिर बेचारा हताश कौवा, रामकी शरणमें आकर अपने प्राणोंकी भीख मांगने लगा । रामको दया आ गयी । रामने कहा "यह अस्त्र व्यर्थ नहीं जाता । इसलिये यह तुम्हारी एक आंख फोडेगा ।" रामकी आज्ञासे उस तिनकेने कौवेकी एक आंख फोड कर कौवेको प्राणदान दिया । तबसे कौवा एकाक्ष कहलाता है और उसकी दृष्टि दोनों आंखोंमें काम करती है ! वह अज्ञान जब ज्ञानमें डूबता । तथा वह ज्ञान जो कीर्तिमुख होता ॥ ज्ञा० १५-५२७ ॥ दक्षिणमें प्रायः प्रत्येक मंदिरके गर्भ-गृहके दरवाजेमें, ठीक देहरीके ऊपर, बीचोबीच सिंहकी-सी एक कराल मुखाकृति रहती है । उसको कीर्ति-मुख कहते हैं । कीर्तिमुखके विषयमें स्कंद पुराणके शिवकांडके सत्रहवे अध्यायमें निम्न कथा है । शंकरकी तीसरी आंखकी अग्निसे जालंधर नामका एक राक्षस उत्पन्न हुवा । यह बड़ा शास्त्रवेत्ता था । "बिना शंकर भगवानके और किसीसे उसकी मृत्यू नहीं होगी तथा जहांसे आया ९९ परिशिष्ट ४