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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

अध्याय ९: राजविद्याराजगुह्ययोग

यह है ऐसा पथ । इस पथसे पार्थ । शांतिका ही मध्यस्थ । प्राप्त करता है ॥ ४३ ॥ अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुणा एव च । निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३ ॥ भक्तकी स्थिति-गुण-विकास— अजी प्राणि मात्रमें कहीं । द्वेषका जो नाम भी नहीं । आप-पर-भाव भी नहीं । चैतन्यका-सा ॥ ४४ ॥ उत्तमका करना स्वीकार । अधमका करें अस्वीकार । नहीं जानती ऐसा प्रकार । जैसे धरणी ॥ ४५ ॥ राजाके तनको चलाना । रंक-शरीरको हनना । न सोचता कृपालु प्राण । वैसा ही वह ॥ ४६ ॥ करें गायका तृषा-निवारण । विष बन व्याघ्रको दे मरण । न जानता ऐसा एक भी क्षण । नदी-नीर ॥ ४७ ॥ वैसे हैं सभी भूत-मात्र । उसके समान जो मित्र । जैसे धात्रीको है सर्वत्र । सम-भाव ॥ ४८ ॥ मैं तूकी भाषा बोलना । सुख-दुःखको जानना । “मेरा” ऐसा भी कहना । नहीं है उसे ॥ ४९ ॥ क्षमामें वैसी ही क्षमता । धरित्री समान योग्यता । संतोष नित है बढ़ता । उसकी गोदमें ॥ १५० ॥ संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १४ ॥ किसीका न करे द्वेष दया मैत्री बना क्षमा । मैं मेरा सब भूला जो सहके सुख दुःखको ॥ १३ ॥ सदा संतुष्ट जो योगी संयमी दृढ निश्चयी । मन-बुद्धि मुझे देता भक्त है मुझको प्रिय ॥ १४ ॥ ४१९ भक्तियोग

वर्षा-ऋतुके बिना सागर । पूर्ण रहता आत्म-निर्भर । वैसा ही वह निरुपचार । सदा-संतुष्ट ॥ ५१ ॥ देकर अपनी सौगंध । देता है हृदयको बोध । इससे निश्चयमें बाध । न आता कभी ॥ ५२ ॥ हृदय-भुवनमें जिसके । एक ही आसन पे बैठके । शासन करते विराजके । जीव-परमात्मा ॥ ५३ ॥ ऐसी योग समृद्धि । पाकर निरवधि । चढाके मन-बुद्धि । मुझपे ही ॥ ५४ ॥ बाहर भीतर योग । शुद्धतामें भी सुबग । फिर भी ममानुराग । जिसे सप्रेम ॥ ५५ ॥ अर्जुन ऐसे जो भक्त । वही योगी तथा मुक्त । वह वल्लभा मैं कांत । ऐसे जान ॥ ५६ ॥ उससे मुझे जो प्रेम है । जीवनसे भी अधिक है । यह बात भी अपूर्ण है । कहूं कैसे ॥ ५७ ॥ अजी ! भक्तोंकी जो कहानी । मुझपे मोहके मोहिनी । अकथनीय है कथनी । कहलाती श्रद्धा ॥ ५८ ॥ इसीलिए जी हम । कह गये उपमा । वैसे तो वह प्रेम । रहता मौन ॥ ५९ ॥ रहने दो यह किरीटी । प्रिय जनोंकी यह जो गोष्टि । प्रेमसे जो पुलक उठी । अति वेगसे ॥ १६० ॥ उसपर भी हे पार्था । सकल संवाद-कर्ता । उसको यहां यथार्थ । उपमा भला ॥ ६१ ॥ इसीलिए पांडुसुता । प्रिय तू औ' तू ही श्रोता । फिर प्रियकी ही वार्ता । प्रसंग आया है ॥ ६२ ॥ तभी मैं अब बोलता । बोलका सुख भोगता । कहके हरि डुलता । आनंद मगन ॥ ६३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४२०

फिर कहता यह सुन । उस भक्तके ये लक्षण । उसको मैं अंतःकरण । आसनार्थ देता हूं ॥ ६४ ॥ यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५ ॥ भक्त भय-उद्वेग रहित— जैसे सागरके भीतर । भीत न होता जलचर । या जलचरोंसे सागर । उकताता नहीं ॥ ६५ ॥ वैसे ही उन्मत्त जगत । न करता उसे दुखित । तथा न ऊबता जगत । उससे कभी ॥ ६६ ॥ अथवा मान तू पांडव । जैसे तनको अवयव । नहीं ऊबते वैसे जीव । औ' जीवोंसे वह ॥ ६७ ॥ विश्व ही जैसे देह हो गया । इसलिए प्रिया-प्रिय गया । हर्ष शोकादि द्वन्द्व भी गया । द्वैत मिटनेसे ॥ ६८ ॥ ऐसा द्वन्द्वसे जो मुक्त । भय उद्वेग रहित । फिर भी अनन्य भक्त । वह मेरा ॥ ६९ ॥ तभी है वह मेरा प्रिय । दिखाऊँ कैसा मेरा हिय । वह है मुझमें तन्मय । इससे जीता हूं ॥ १७० ॥ जो है निजानन्दमें तृप्त । मानो ब्रह्मको जन्म प्राप्त । पूर्णताका वह है आप्त । वल्लभ जैसा ॥ ७१ ॥ अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः । सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६ ॥ ऊबता जो न लोगोंसे न ऊबे उससे जन । हर्ष-शोक भय क्रोध न जाने जो मुझे प्रिय ॥ १५ ॥ नहीं व्यथा उदासीन दक्ष निर्मल निस्पृह । तजे आरंभ जो सारे भक्त है मुझको प्रिय ॥ १६ ॥ ४२१ भक्तियोग

संतका पावन चरित— न है उसमें अपेक्षा । वैसी ही नहीं उपेक्षा । जीवन बिन आकांक्षा । केवल आत्मोत्कर्ष ॥ ७२ ॥ मोक्ष देनेमें उदार । काशी नामका आदर । किंतु उसमें शरीर । त्यजना होगा ॥ ७३ ॥ पाप हरता हिमवंत । भयभीत कर जीवित । संतका पावन चरित । वैसा नहीं ॥ ७४ ॥ पावन है गंगोदक । पाप तापका शामक । किंतु उसमें है एक । डूबनेका भय ॥ ७५ ॥ गहराई जिसकी अपार । किंतु डूबनेका है डर । रोकड़ मोक्षका है घर । जीवनमें ही ॥ ७६ ॥ संतोंके चरण स्पर्शसे । मुक्त है गंगा भी पापसे । ऐसे संत-संगके कैसे । कहना शुचित्व ॥ ७७ ॥ अजी ! यह रहने दो अब । बना तीर्थोंका आश्रय सब । धोकर मनका मल शुभ- । शुचित्वसे ॥ ७८ ॥ होता तन मनसे निर्मल । सूर्यके समान है उज्ज्वल । तत्त्वार्थिथोंमें है पायल । ब्रह्म-धनका ॥ ७९ ॥ व्यापक तथा उदास । रहता जैसे आकाश । वैसे उसका मानस । सदा-सर्वत्र ॥ १८० ॥ जो है संसार-व्यथासे मुक्त । निरपेक्षाळंकार-भूषित । मानो व्याध-बाणसे विमुक्त । विहंगमसा ॥ ८१ ॥ सुखमें जो है लीन सतत । न होती कभी टीस प्रतीत । न जाने जैसे लज्जाको प्रेत । उसी भांति ॥ ८२ ॥ तथा कार्यारंभका है नहीं । अहंकार तनिक भी कहीं । जैसा निर्इंधन होके वह्नि । बुझ जाता है ॥ ८३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४२२

ऐसा हुआ जब उपशम । मोक्ष-सत्रमें लिखाया नाम । हुआ है वह निष्काम-काम । धनंजय ॥ ८४ ॥ अर्जुन वह यहीं पर । सोऽहं भावसे भरकर । पहुंच चुका उस पार । द्वैत-भावके ॥ ८५ ॥ किंतु भक्ति-सुखके कारण । कर अपना दो विभाजन । सेवा धर्मका अंगीकरण । करता आप ॥ ८६ ॥ अन्यको है मैं कहता । फिर स्तोत्र नहीं होता । भक्तिका मार्ग दिखाता । योगी वह ॥ ८७ ॥ हमें है उसका व्यसन । उसका ही निज-ध्यान । या उसमें ही समाधान । मिलता हमको ॥ ८८ ॥ उसके लिये रूप-धारण । इस विश्वमें अवतरण । न्योछावर है उसपे प्राण । सर्व-भावसे ॥ ८९ ॥ यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति । शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः ॥ १७ ॥ जो आत्म लाभके समान । सुन्दर कछु नहीं आन । तभी भोगमें न दें मन । न हो आनंदित ॥ ९० ॥ आप ही है विश्व बन गया । भेद भाव सहज धो गया । तब द्वेश भी है मिट गया । उस पुरुषका ॥ ९१ ॥ जो है अपना संतत्व । कल्पांतमें है अस्तित्व । तभी भूतका है स्वत्व । कभी न सोचता ॥ ९२ ॥ तथा उसके परे कुछ भी नहीं । अपना जो है अपने पास यहीं । तभी उसकी आकांक्षा है ही नहीं । कुछ भी कभी ॥ ९३ ॥

न उल्लास न संताप न चाह सोच भो नहीं । भला बुरा सभी छोडा भजता जो मुझे प्रिय ॥ १७ ॥ ४२३ भक्तियोग

बीभत्स है या सुंदर । न जाने वह अंतर । जैसे जाने ना भास्कर । दिन औ' रात ॥ ९४ ॥ ऐसे बोधसे केवल । रहता है जो निष्कल । फिर भी भजनशील । मुझमें वह ॥ ९५ ॥ उसके समान और । नहीं हमें प्रियकर । कहता हूं धनुर्धर । सौगंध तेरी ॥ ९६ ॥ समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संगविवर्जितः ॥ १८ ॥ भक्तकी सम-भावना— जिसके मनमें पार्था । नहीं वैषम्यकी वार्ता । रिपु-मित्रकी समता । रहे सदा ॥ ९७ ॥ अपनोंको प्रकाश देना । परायोंको अंधेरा देना । जैसा दीप यह सोचना । जानता नहीं ॥ ९८ ॥ करता जो वृक्ष-छेदन । या करता गाछ-पालन । दोनोंको दे छाया समान । जैसा वृक्ष ॥ ९९ ॥ मालीको देता मीठा रस । पेरकको न खट्टा रस । सबको है मधुर रस । देता ईख-सा ॥ २०० ॥ शत्रु-मित्रमें तैसा । उसका भाव ऐसा । रहता है एकसा । मानापमानमें ॥ १ ॥ तीनों ऋतुओंमें समान । रहता है जैसा गगन । वैसा ही एक समान । शीतोष्ण जिसे ॥ २ ॥ दक्षिण उत्तर मारुत । जैसा है मेरु पांडुसुत । तैसा सुख दुःख हो प्राप्त । मध्यस्थ है जो ॥ ३ ॥ सम जो शत्रु-मित्रोंमें मानापमानमें सम । शीतोष्ण सुख दुःखोंमें क्लिप्त सम-भावसे ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी ४२४

चंद्रिकाकी शीतलता । राजा रंककी समता । वैसे जो सकळ भूत । है सामान ॥ ४ ॥ संपूर्ण जगत एक । जैसे सेवन उदक । वैसे उसकी त्रिलोक । करते चाह ॥ ५ ॥ अंतर बाह्य संग । करके सब अंग । शून्य हो अन्तरंग । वस्तुलीन ॥ ६ ॥ तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येन केनचित् । अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥ विश्व ही मेरा घर ऐसी जिसकी मति-- निंदासे जो न खिन्न । स्तुतिसे न प्रसन्न । रहे जैसा गगन । निर्लेप ॥ ७ ॥ जो निंदा और स्तुति । रखके एक पांति । रमता प्राण-वृत्ति । सदा-सर्वत्र ॥ ८ ॥ सत्यासत्यको जो समान । बोलकर रहता मौन । भोगता है सदा उन्मन । अतृप्त भावसे ॥ ९ ॥ लाभसे जो न हरषाता । न अलाभसे कुम्हलाता । वर्षाके बिन ना सूखता । समुद्र जैसा ॥ २१० ॥ जैसा वायुका इक ठौर । रहता नहीं है आधार । वैसा ही न उसका घर । कहीं रहता ॥ ११ ॥ संपूर्ण आकाश स्थिति । वायुकी नित्य-वसति । वैसे है विश्व विश्रांति- । स्थान उसका ॥ १२ ॥ विश्व ही यह मेरा घर । ऐसी मति जिसकी स्थिर । या हुआ जो सचराचर । अपनेमें आप ॥ १३ ॥ स्तुति-निंदा तजे मौनी संतुष्ट प्राप्त-भोगमें । स्थिर-बुद्धि निराधार भक्त जो है मुझे प्रिय ॥ १९ ॥ ४२५ भक्तियोग (54)

इस पर भी हे पार्थ । मेरे भजनमें आस्था । उसको करू मैं माथा । पर मुकुट ॥ १४ ॥ उत्तमको मस्तक । नमाना क्या कौतुक । मान देता त्रिलोक । पद रेणुको ॥ १५ ॥ श्रद्धा वस्तुका आदर । करना जानो प्रकार । होता है यदि शंकर । श्री गुरु ॥ १६ ॥ रहने दो यह भाषा । करनेमें है प्रशंसा । शंभुकी होती सहसा । आत्म-स्तुति ॥ १७ ॥ रहने दो यह उक्ति । कहता है रमापति । लेकर करता स्तुति । माथेपे उसे ॥ १८ ॥ अपने भक्तके अलिंगनके लिये दो हाथ कम पडे— सिद्धि चौथा पुरुषार्थ । लेकर अपने हाथ । चला है जो भक्ति-पंथ । देते विश्वको ॥ १९ ॥ कैवल्यका ले अधिकार । करे मोक्षका व्यवहार । रहता नम्र जैसा नीर । स्वभावसे ॥ २२० ॥ उसको करूंगा नमस्कार । मुकुट धरूंगा सिरपर । चरण हृदय पीठ पर । पूजूंगा मैं ॥ २१ ॥ उसके गुणका भूषण । होगा मेरी वाणीका गान । उसकी कीर्तिका श्रवण । प्रेमसे करूंगा ॥ २२ ॥ उसके दर्शनका प्रलोभन । बने मुझ अचक्षुके नयन । करूं लीला सुमनसे पूजन । उसका मैं ॥ २३ ॥ अजी ! दो पर दो और । कर लेकर मैं चार । आलिंगनार्थ आतुर । आया उसके ॥ २४ ॥ उसके संगके सुखके लिये । आया हूं विदेही मैं देह लिये । उसके प्रेम बखानके लिये । वाणी है असमर्थ ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी ४२६

उसका मैं हूं मित्र । उसमें क्या विचित्र । सुनता जो चरित्र । उसका वह ॥ २६ ॥ करता है गुणगान । उससे भी मैं प्रसन्न । वह है प्राण समान । मुझको प्रिय ॥ २७ ॥ अजी ! यह सांगत । कहा है जो प्रस्तुत । भक्तियोग समस्त । योग-रूप ॥ २८ ॥ करता उसका आदर । धरता उसे सिरपर । उस स्थितिकी है अपार । श्रेष्ठता सुन ॥ २९ ॥ ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते । श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २० ॥ भक्त क्या ? मुझे अत्यधिक मधुर है— गोष्ठि है यह रम्य । अमृत धारा धर्म्य । करें प्रतीति-गम्य । सुनकर ॥ २३० ॥ श्रद्धाका जिसमें आदर । उरमें इसका विस्तार । होता है चितमें सत्वर । अनुष्ठान सुलभ ॥ ३१ ॥ जैसे किया है निरूपण । वैसे ही मनका धारण । तभी सुक्षेत्रमें रोपणं । हुआ मानो ॥ ३२ ॥ मुझे मानकर परम । इसीलिये करके प्रेम । यही सर्वस्व सर्वोपम । मान लेते जो ॥ ३३ ॥ विश्वमें अजी पार्थ । वही योगी औ' भक्त । उत्कंठा है तदर्थ । मुझको सदा ॥ ३४ ॥ वही तीर्थ वही क्षेत्र । विश्वमें हैं वे पवित्र । भक्ति कथाका हैं मित्र । सदैव ही ॥ ३५ ॥ —————— जो धर्म-सार है नित्य मुझमें लीन होकर । सेते श्रद्धालु जो भक्त अत्यंत प्रिय है मुझे ॥ २० ॥ ४२७ भक्तियोग

करता म उनका ध्यान । मेरा यह देवतार्चन । उस बिना माने ना मन । दूसरा भला ॥ ३६ ॥ उसका है मुझे व्यसन । मेरा वह निधि निधान । अथवा मेरा समाधान । उनके मिलनमें ही ॥ ३७ ॥ ऐसी प्रेमकी वार्ता । जो है अनुवादता । है परम देवता । हमारी वह ॥ ३८ ॥ ज्ञानदेवका सगुण कृष्ण— जो है निज-जनानंद । तथा जगदादिकंद । कहता है श्री मुकुन्द । बोला संजय ॥ ३९ ॥ होता है जो निर्मल । निष्कल लोक कृपाल । शरणागत प्रतिपाल । शरण्य वह ॥ ४० ॥ वह है धर्म-कीर्ति धवल । अगाध-दातृत्वमें सरल । तथा अतुल बल प्रबल । बलि बंधन ॥ ४१ ॥ सुर-सहायशील । लोक-लालन-लील । प्रणत-प्रतिपाल । खेल जिसका ॥ ४२ ॥ भक्त-जन-वत्सल । प्रेमी-जन-प्रांजल । सत्य-केतू सरल । कला निधि ॥ ४३ ॥ वह कृष्ण वैकुंठका । चक्रवर्ति अपनोंका । कहता बोल प्रेमका । सुनता पार्थ ॥ ४४ ॥ संजय कहता श्रीकृष्ण । अब करेंगे निरूपण । कीजिये आप श्रवण । धृतराष्ट्रसे ॥ ४५ ॥ ज्ञानदेव कहता तुम । संत सेवा करना हम । सिखाया है महा-महिम । निवृत्तिनाथने ॥ ४६ ॥ गीता श्लोक ५५ ज्ञानेश्वरी ओवी ७०८.

१३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग आत्म-रूपी गणेश वंदन— आत्म-रूप गणेश स्मरण । जो सकल विद्याधिकरण । नमन करें वे श्रीचरण । श्रीगुरुके ॥ १ ॥ करनेसे जिसका स्मरण । शब्द-सृष्टि होती स्वाधीन । चढ़ता सारस्वत संपूर्ण । जिह्वा पर ॥ २ ॥ तब है वक्तृत्वकी मधुरता । हठाती अमृतकी मधुरता । नव-रस है चूता ही रहता । अक्षरोंसे ॥ ३ ॥ भावोंका अवतरण । स्पष्ट करता है चित्र । हस्तामलकसा पूर्ण । होता तत्व-भेद ॥ ४ ॥ श्रीगुरुके जब पाय । पकडता है हृदय । महा-भाग्यका समय । उन्मेषका वह ॥ ५ ॥ उनको करके मैं वंदन । पितामहका पिता महान । कहता जो श्रीलक्ष्मीरमण । कहूंगा वह ॥ ६ ॥ भगवान उवाच इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १ ॥ श्रीभगवानने कहा इस शरीरको पार्थ कहते क्षेत्र जान तू । जानता यह जो क्षेत्र क्षेत्रज्ञ कहते उसे ॥ १ ॥

आत्मानात्म विचार- सुन तू अब यह पार्था । देह है क्षेत्र कहलाता । इसको जो सही जानता । वह है क्षेत्रज्ञ ॥ ७ ॥ क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ २ ॥ यहां है जो क्षेत्रका पालक । मुझको जान क्षेत्रज्ञ एक । बन सभी क्षेत्रका रक्षक । रहता हूं मैं ॥ ८ ॥ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञको मान । जानना है यहां ज्ञान । समझें हम अर्जुन । इस समय ॥ ९ ॥ तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् । स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ३ ॥ तभी हमने है क्षेत्र कहा । किस भावसे देहको यहां । कहता हूं प्रयोजन सह । सुन तू पार्थ ॥ १० ॥ इसको क्षेत्र क्यों कहना । इसका पैदा कैसा होना । किन विकारोंसे बढ़ना । कहता हूं यही ॥ ११ ॥ यह क्या तीन अर्ध हाथका है । या इससे भी अधिक बड़ा है । यह बंजर है या उर्वरा है । तथा है किसका ॥ १२ ॥ इत्यादि इसके सर्व । जो जो हैं वे सभी भाव । कहूंगा यह अपूर्व । सुन तू सावधान हो ॥ १३ ॥ शरीरके विषयमें भिन्न भिन्न विचार- क्षेत्रज्ञ मुझको जान बसा मैं सब क्षेत्रमें । क्षेत्र क्षेत्रज्ञका ज्ञान उसे मैं ज्ञान मानता ॥ २ ॥ क्षेत्र क्या उसमें कैसे विकार रहते कहो । कैसा क्षेत्रज्ञ कौन कहवा सुन तू यह ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४३०

अजी ! इसी स्थलके कारण । श्रुतिका चलता है भाषण । तर्ककी वाद वैखरी तीक्ष्ण । इसके लिये है ॥ १४ ॥ छाननेमें यह स्थान । थक गये हैं दर्शन । मिटे नहीं जो घर्षण । उनके कभी ॥ १५ ॥ अजी ! शास्त्रोंका भी नाता । इससे ही है टूटता । तथा इसीसे जुड़ता । झगडा जगतका ॥ १६ ॥ बातसे बात न मिलती । एक-वाक्यता नहीं होती । बनके वाचालता युक्ति । हुई समर्थ ॥ १७ ॥ न जाने किसका है यह स्थल । किंतु कैसी अभिलाषाका बल । घर घरमें है यह कपाल- । मोक्ष गाथा ॥ १८ ॥ नास्तिकोंसे करने मुठभेड़ । वेदोंने किया विद्रोह प्रचंड । उसको देख कर हैं पाखंड । बकवाद करते ॥ १९ ॥ कहते तुम निर्मूल । झूठा तुम्हारा वाग्जाल । प्रण हमारा है सबल । बीडा उठाकर ॥ २० ॥ पक्ष है जो पाखंड । नग्न लुंचित-मुंड । नियोजित वितंड । आते भानपे ॥ २१ ॥ मृत्यूके कसे हुए पाशमें । जायेगा यह इस भयमें । चले योगी-जन निर्णयमें । इस क्षेत्रके ॥ २२ ॥ मृत्यूसे हैं जो भयग्रस्त । करते वनमें एकांत । यम-दम-अभ्यास-रत । हो पाते पूर्ण ॥ २३ ॥ इस क्षेत्राभिमान मगन । कैलास तजता है ईशान । बसता है जाकर स्मशान । उलझन भयसे ॥ २४ ॥ इस प्रतिज्ञासे शंकर । सिकुडकर सभी ओर । करता राख घूस-खोर । मन्मथकी भी ॥ २५ ॥ तथा सत्य-लोक-नाथ । वदन चार वादार्थ । किंतु वे नहीं सर्वथा । जानते कुछ ॥ २६ ॥ ३३१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वर द्वारा क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विषयमें भिन्न भिन्न मतोंका विवेचन— आत्मानात्म विवेक जीववादी दृष्टिसे- एक कहता यह स्थल । जीवका ही है सहमूल । फिर प्राण है यह कुल । उसका यहां ॥ २७ ॥ घरमें उस प्राण के । चार भाई जो उसके । तथा मन-सा जिसके । प्रबंधक है ॥ २८ ॥ इन्द्रिय-बैलोंका जो समूह । नहीं देखता काल प्रवाह । करता है श्रम बिना आह । विषय-खेतमें ॥ २९ ॥ खोकर विहित-कर्म अवसर । अन्याय-बीजकी बुवाई कर । कुकर्मार्थ सब परिश्रम कर । फसल काटता ॥ ३० ॥ तभी उसीके समान । पाता है पाप जो मन । भोगता दुःख महान । जन्म-कोटि ॥ ३१ ॥ या विधिवत कर उद्यान । किया सत्कर्म-बीजारोपण । शत शत है जन्मानुदिन । सुख-भोग ॥ ३२ ॥ प्रकृतिवादियोंकी दृष्टिसे— कहते हैं तब कुछ औ । जीवका न कहो यह ठौर । हमसे जानो इसका विचार । पूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥ अजी ! है यहां जीव पथिक । चलती राहमें रहा रुक । प्राण है जो यहां मालिक । जग रहा है ॥ ३४ ॥ यहां जो अनादि प्रकृति है । सांख्य जिसके गीत गाते हैं । खेत यह उसकी वृत्ति है । जान तू यह ॥ ३५ ॥ गाया विविध मंत्रोंमें ऋषियोंने इसे पृथक् । कहा है ब्रह्म-सूत्रोंमें सप्रमाण सुनिश्चित ॥ ४ ॥ ज्ञानेश्वरी ४३२

इसके पास है साधन । घरका ही है बारदान । तब बनती है किसान । अपने आप ॥ ३६ ॥ झमेलेमें नित चतुर । इसके हैं तीन कुमार । करते सब कारोबार । गुण हैं जो ॥ ३७ ॥ रजो-गुण बुवाई करता । सत्व जो उसको संभालता । तमोगुण फसल काटता । अकेला ही ॥ ३८ ॥ महत्तत्वका रच खलिहान । काल-सांडसे कराके मांडन । अव्यक्तका वहां ढेर महान । होता रहता है ॥ ३९ ॥ संकल्प वादियोंकी दृष्टिसे- तब कहते कुछ बुद्धिमान । प्रकृति वादियोंसे बुरा मान । यह है अति आर्वाचीन । आप लोगोंका ॥ ४० ॥ अजी ! चित देकरके हो स्वस्थ । सुनो तुम यह क्षेत्र-वृत्तांत । तत्वमें कहां प्रकृतिकी बात । कहते हैं यह ॥ ४१ ॥ वह शून्य शय्यागृहमें । पूर्णावस्थाकी लीनतामें । शक्त-संकल्पने शय्यामें । निद्रा की थी ॥ ४२ ॥ जगा जो वह अकस्मात । उद्योगमें था भाग्यवंत । मिली है पूंजी अमानत । इच्छ-मात्रसे ॥ ४३ ॥ निराकारके उद्यानमें । त्रिभुवनकी समतामें । आया जो है व्यक्त रूपमें । उससे यह ॥ ४४ ॥ महा-भूतोंकी जो ऊसर । कसके उसे उर्वर । भूतग्रामके बांधे चार । सीमा-मेड़ें ॥ ४५ ॥ अजी ! प्रारंभ किया फिर । पंच तत्वात्मक शरीर । समुचित मिश्रण कर । पंच-भूतका ॥ ४६ ॥ कर्माकर्मके पत्थर । रख बांधे दोनों ओर । किया है अति उर्वर । ऊसर था जो ॥ ४७ ॥ आवागमनार्थ यहां फिर । जन्म मृत्युके बांधे गन्हर । रक्षाका ऐसा प्रबंध कर । संकल्पने तब ॥ ४८ ॥ ४३३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग (55)

अहंकारसे हो एक । वह भी पूर्णायुतक । बुद्धिसे कार्य कृषक । कराया चराचर ॥ ४९ ॥ इस भांति है निराली । बडी संकल्पकी डाली । इसीलिये है वह मूली । यहां प्रपंचकी ॥ ५० ॥ ऐसे हैं यह मत-मुक्तक । व्यक्त हुए हैं जब शाब्दिक । जी ! आप हैं बडे विचारक । कहते हैं और ॥ ५१ ॥ स्वभाव-वादियोंकी दृष्टिसे-- अजी ! गांवमें पर-तत्वके । पर्यंकको देखें संकल्पके । तो क्यों प्रकृति-वादियोंके । तर्क नहीं माने ॥ ५२ ॥ किंतु ऐसा नहीं कहना । इसमें तुम्हें न पडना । कहा जायेगा यह पूर्ण । हमसे अब ॥ ५३ ॥ आकाश कहो है कौन । भरता मेघोंसे पूर्ण । अधरमें तारा-गण । कौन रखता ॥ ५४ ॥ गगनका यह वितान । किसने ताना महान । होता वायुका संचालन । किसकी आज्ञासे ॥ ५५ ॥ रोमोंकी बुवाई करता कौन । समुद्रको सदा भरता कौन । पर्जन्य धाराको गिराता कौन । कहो यहां ॥ ५६ ॥ यह क्षेत्र है ऐसा स्वाभाविक । न है कोई इसका मालक । पाता है जो करता देखरेख । अन्य नहीं कोई ॥ ५७ ॥ कालवादिकी दृष्टिसे-- कहता है तब और एक । तुम कहते हो बडा नेक । कहो कैसे भोगता है एक । केवल काल ॥ ५८ ॥ यह क्रोधी मृत्यु-सिंहका । गह्वर अपना उसका । नहीं क्या व्यर्थ प्रलापका । सही उत्तर ॥ ५९ ॥ सभी हैं इसकी मार । देखते हैं अनिवार । किंतु स्व-मतपे भार- । वे बोलते हैं ॥ ६० ॥ ज्ञा.- नेश्वरी ४३४

महा कल्पके उस ओर । यकायक झपट्टा मार । प्रहार भद्र जाती पर । किया सत्य लोकके ॥ ६१ ॥ नित-नव नव लोकपाल । तथा दिग्गजोंको यह काल । स्वर्ग-काननमें जा विपुल । तोड़ता रहता ॥ ६२ ॥ शरीर-समीरसे इसके । गर्तमें जनम-मरणके । भूमिष्ठ पडे निर्जीव होके । जीव-मृग हैं ॥ ६३ ॥ फैला है इसका पंजा । मानो यह है शिंकजा । बनाके आकर गज- । करता है ग्रास ॥ ६४ ॥ इसीलिये कालकी सत्ता । कहते हैं हम निश्चित । ऐसा वाद है पांडुसुत । इस क्षेत्रका ॥ ६५ ॥ इस क्षेत्रके विषयमें सभी अज्ञानमें हैं— कर चुका है वाद विपुल । नैमिशारण्यमें ऋषि-कुल । पुराण इसके अनुकूल । आधार रूप हैं ॥ ६६ ॥ हैं अनुष्टुप आदि छंद । इस विषयमें विविध । होते हैं आधार स-श्रध्द । आज भी लोगोंके ॥ ६७ ॥ वेदोंके बृहत्साम-सूत्र । जो हैं अतिशय पवित्र । उसको भी है यह क्षेत्र । अज्ञात-रूप ॥ ६८ ॥ अन्य और अगणित । महा-कवि बुद्धिमंत । इसपे अपना मत । देते रहते हैं ॥ ६९ ॥ किंतु यह किसका है । किसके स्वामित्वमें है । समझमें न आता है । किसीक भी ॥ ७० ॥ अजी ! यह है जैसे । अब क्षेत्र है कैसे । कहता मैं तुझसे । सुन सायन्त ॥ ७१ ॥ महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥ पंच भूत अहंकार बुद्धि अव्यक्त मूल जो । एकादश इंद्रियोंको खींचे विषय पंचक ॥ ५ ॥ ४३५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥ इस शरीरके मूल-भूत छत्तीस तत्व— है महा-भूत पंचक । तथा अहंकार एक । बुद्धि अव्यक्त दशक । इंद्रियोंका ॥ ७२ ॥ और भी है एक । विषय-दशक । द्वेष सुख दुःख । संघात इच्छा ॥ ७३ ॥ तथा चेतना धृति । एवं है क्षेत्र वृत्ति । कही तुझसे अति । अल्प-रूपसे ॥ ७४ ॥ कौन है महा भूत । विषय क्या है पार्थ । औ' इंद्रिय महित । कहता हूं सब ॥ ७५ ॥ पृथ्वी जल अगिन । वायु तथा गगन । ये हैं पांच अर्जुन । महा-भूत ॥ ७६ ॥ अहंकारका रूप— जागृतिमें जैसे स्वप्न । आंखोंमें रहता लीन । या अमावासके दिन । चंद्र होता गुप्त ॥ ७७ ॥ बालकोंमें जैसे अर्जुन । छिपा रहता है यौवन । या कलिमें होता प्रसन्न । सुगंध गुप्त ॥ ७८ ॥ अथवा जैसे इन्धनमें । अग्नि होता सुप्तावस्थामें । वैसे होता है प्रकृतिमें । गुप्त-रूपसे ॥ ७९ ॥ अथवा धातु गत ज्वर । कुपध्यामिष देखकर । होता है अंदर बाहर । व्याप्त अर्जुन ॥ ८० ॥ ऐसे पांचोंसे मिल कर । देहका आकार लेकर । नचाता तब अहंकार । दश-दिशामें ॥ ८१ ॥ इच्छा द्वेष सुख-दुःख धृति संघात चेतना । विकार-युक्त है क्षेत्र अल्पमें तुझसे कहा ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ४३६

अहंकारका इक अचरज है । अज्ञानियोंको जो नहीं सताता है । ज्ञानियोंको ही नचाता रहता है । सिर पर चढ़के ॥ ८२ ॥ बुद्धिका लक्षण— बुद्धिके जो लक्षण । जान ले तू अर्जुन । कहता है श्रीकृष्ण । यदुराज ॥ ८३ ॥ कंदर्पका ले सहाय । वृत्ति-सह जो इन्द्रिय । जीत लाते हैं विषय । धनुर्धर ॥ ८४ ॥ सुख दुःखके लूटका माल । जीवको अंतरंग सकल । दिखाता तब देता फैसला । चुनावमें योग्य ॥ ८५ ॥ यह है क्लेष या तोष । है यह गुण या दोष । मैला है या यह चोख । दिखाता सब ॥ ८६ ॥ अधमोत्तम जिसे सूझता । छोटा बड़ा है जो देख पाता । अपनी दृष्टिसे परखता । विषयोंको जो ॥ ८७ ॥ तेज तत्वका आदि । सत्व-गुणकी वृद्धि । आत्म-जीवकी संधि । जागृत रखता ॥ ८८ ॥ अव्यक्त प्रकृतिका रूप जान तू यह अर्जुन । बुद्धि-तत्त्व है संपूर्ण । अब सुन पहचान । अव्यक्तकी ॥ ८९ ॥ जिसको है सांख्य सिद्धांत । करता प्रकृति घोषित । यहांपे है यही प्रस्तुत । अव्यक्त जो ॥ ९० ॥ तथा है सांख्य-योगके मतसे । प्रकृति-विचार कहा तुझसे । जहां प्रकृतिके दोनों रूपसे । तू है परिचित ॥ ९१ ॥ दूजी जो वहां जीव दशा । जिसका नाम है वीरेशा । उसे यहां अव्यक्त ऐसा । कहा गया है ॥ ९२ ॥ रजनीका होते ही अस्त । नभमें होते तारा लुप्त । रुकती होनेपे सूर्यास्त । भूतमात्रकी क्रिया ॥ ९३ ॥ ४३७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

देह-पात पर अर्जुन । देह होती उपाधि-लीन । कृत-कर्ममें अनुदिन । डुबी रहती ॥ ९४ ॥ बीज-रूपमें यह सतत । रहता है वृक्ष समस्त । अथवा पटत्व बन सूत । रहता जैसे ॥ ९५ ॥ वैसे छोड़के स्थूल-धर्म । महा भूतोंके भूत-ग्राम । लय हो रहते हैं सूक्ष्म । जिस स्थानपे ॥ ९६ ॥ उसका नाम अर्जुना । अव्यक्त यह जानना । अब संपूर्ण सुनना । इंद्रिय-भेद ॥ ९७ ॥ इंद्रिय विवेचन --- यहां श्रवण नयन । त्वचा औ' रसना घ्राण । इसको ज्ञानके जान । पांच इंद्रिय ॥ ९८ ॥ मेलेमें इन तत्वोंके । विचार सुख-दुःखके । करती है इंद्रियोंके- । द्वारा बुध्दि ॥ ९९ ॥ फिर वाचा और कर । पाय तथा अधोद्वार । तथा है जनन द्वार । पांच पार्थ ॥ १०० ॥ ये हैं कर्मेंद्रियां जान । कैवल्य-पति श्रीकृष्ण । कहता है तू अर्जुन । सुन ले यह ॥ १ ॥ प्राणोंको जो प्रिया होती । क्रिया-शक्ति कहलाती । तनमें है आती जाती । इन पांचोंसे ॥ २ ॥ ऐसे ये दश-करण । बताये तुझे अर्जुन । कहता हूं अब मन । रहता कैसा ॥ ३ ॥ मनका विवेचन --- इंद्रिय-बुध्दि मध्य पर । रजोगुणका ले आधार । अतीव तरल होकर । रहता पार्थ ॥ ४ ॥ आकाशकी नीलिमा-सा । मृग-जल-तरंग सा । व्यर्थका मिथ्याभास-सा । रहता है वह ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ४३८