ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥ इस शरीरके मूल-भूत छत्तीस तत्व— है महा-भूत पंचक । तथा अहंकार एक । बुद्धि अव्यक्त दशक । इंद्रियोंका ॥ ७२ ॥ और भी है एक । विषय-दशक । द्वेष सुख दुःख । संघात इच्छा ॥ ७३ ॥ तथा चेतना धृति । एवं है क्षेत्र वृत्ति । कही तुझसे अति । अल्प-रूपसे ॥ ७४ ॥ कौन है महा भूत । विषय क्या है पार्थ । औ' इंद्रिय महित । कहता हूं सब ॥ ७५ ॥ पृथ्वी जल अगिन । वायु तथा गगन । ये हैं पांच अर्जुन । महा-भूत ॥ ७६ ॥ अहंकारका रूप— जागृतिमें जैसे स्वप्न । आंखोंमें रहता लीन । या अमावासके दिन । चंद्र होता गुप्त ॥ ७७ ॥ बालकोंमें जैसे अर्जुन । छिपा रहता है यौवन । या कलिमें होता प्रसन्न । सुगंध गुप्त ॥ ७८ ॥ अथवा जैसे इन्धनमें । अग्नि होता सुप्तावस्थामें । वैसे होता है प्रकृतिमें । गुप्त-रूपसे ॥ ७९ ॥ अथवा धातु गत ज्वर । कुपध्यामिष देखकर । होता है अंदर बाहर । व्याप्त अर्जुन ॥ ८० ॥ ऐसे पांचोंसे मिल कर । देहका आकार लेकर । नचाता तब अहंकार । दश-दिशामें ॥ ८१ ॥ इच्छा द्वेष सुख-दुःख धृति संघात चेतना । विकार-युक्त है क्षेत्र अल्पमें तुझसे कहा ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ४३६