ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥ इस शरीरके मूल-भूत छत्तीस तत्व— है महा-भूत पंचक । तथा अहंकार एक । बुद्धि अव्यक्त दशक । इंद्रियोंका ॥ ७२ ॥ और भी है एक । विषय-दशक । द्वेष सुख दुःख । संघात इच्छा ॥ ७३ ॥ तथा चेतना धृति । एवं है क्षेत्र वृत्ति । कही तुझसे अति । अल्प-रूपसे ॥ ७४ ॥ कौन है महा भूत । विषय क्या है पार्थ । औ' इंद्रिय महित । कहता हूं सब ॥ ७५ ॥ पृथ्वी जल अगिन । वायु तथा गगन । ये हैं पांच अर्जुन । महा-भूत ॥ ७६ ॥ अहंकारका रूप— जागृतिमें जैसे स्वप्न । आंखोंमें रहता लीन । या अमावासके दिन । चंद्र होता गुप्त ॥ ७७ ॥ बालकोंमें जैसे अर्जुन । छिपा रहता है यौवन । या कलिमें होता प्रसन्न । सुगंध गुप्त ॥ ७८ ॥ अथवा जैसे इन्धनमें । अग्नि होता सुप्तावस्थामें । वैसे होता है प्रकृतिमें । गुप्त-रूपसे ॥ ७९ ॥ अथवा धातु गत ज्वर । कुपध्यामिष देखकर । होता है अंदर बाहर । व्याप्त अर्जुन ॥ ८० ॥ ऐसे पांचोंसे मिल कर । देहका आकार लेकर । नचाता तब अहंकार । दश-दिशामें ॥ ८१ ॥ इच्छा द्वेष सुख-दुःख धृति संघात चेतना । विकार-युक्त है क्षेत्र अल्पमें तुझसे कहा ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ४३६
अहंकारका इक अचरज है । अज्ञानियोंको जो नहीं सताता है । ज्ञानियोंको ही नचाता रहता है । सिर पर चढ़के ॥ ८२ ॥ बुद्धिका लक्षण— बुद्धिके जो लक्षण । जान ले तू अर्जुन । कहता है श्रीकृष्ण । यदुराज ॥ ८३ ॥ कंदर्पका ले सहाय । वृत्ति-सह जो इन्द्रिय । जीत लाते हैं विषय । धनुर्धर ॥ ८४ ॥ सुख दुःखके लूटका माल । जीवको अंतरंग सकल । दिखाता तब देता फैसला । चुनावमें योग्य ॥ ८५ ॥ यह है क्लेष या तोष । है यह गुण या दोष । मैला है या यह चोख । दिखाता सब ॥ ८६ ॥ अधमोत्तम जिसे सूझता । छोटा बड़ा है जो देख पाता । अपनी दृष्टिसे परखता । विषयोंको जो ॥ ८७ ॥ तेज तत्वका आदि । सत्व-गुणकी वृद्धि । आत्म-जीवकी संधि । जागृत रखता ॥ ८८ ॥ अव्यक्त प्रकृतिका रूप जान तू यह अर्जुन । बुद्धि-तत्त्व है संपूर्ण । अब सुन पहचान । अव्यक्तकी ॥ ८९ ॥ जिसको है सांख्य सिद्धांत । करता प्रकृति घोषित । यहांपे है यही प्रस्तुत । अव्यक्त जो ॥ ९० ॥ तथा है सांख्य-योगके मतसे । प्रकृति-विचार कहा तुझसे । जहां प्रकृतिके दोनों रूपसे । तू है परिचित ॥ ९१ ॥ दूजी जो वहां जीव दशा । जिसका नाम है वीरेशा । उसे यहां अव्यक्त ऐसा । कहा गया है ॥ ९२ ॥ रजनीका होते ही अस्त । नभमें होते तारा लुप्त । रुकती होनेपे सूर्यास्त । भूतमात्रकी क्रिया ॥ ९३ ॥ ४३७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
देह-पात पर अर्जुन । देह होती उपाधि-लीन । कृत-कर्ममें अनुदिन । डुबी रहती ॥ ९४ ॥ बीज-रूपमें यह सतत । रहता है वृक्ष समस्त । अथवा पटत्व बन सूत । रहता जैसे ॥ ९५ ॥ वैसे छोड़के स्थूल-धर्म । महा भूतोंके भूत-ग्राम । लय हो रहते हैं सूक्ष्म । जिस स्थानपे ॥ ९६ ॥ उसका नाम अर्जुना । अव्यक्त यह जानना । अब संपूर्ण सुनना । इंद्रिय-भेद ॥ ९७ ॥ इंद्रिय विवेचन --- यहां श्रवण नयन । त्वचा औ' रसना घ्राण । इसको ज्ञानके जान । पांच इंद्रिय ॥ ९८ ॥ मेलेमें इन तत्वोंके । विचार सुख-दुःखके । करती है इंद्रियोंके- । द्वारा बुध्दि ॥ ९९ ॥ फिर वाचा और कर । पाय तथा अधोद्वार । तथा है जनन द्वार । पांच पार्थ ॥ १०० ॥ ये हैं कर्मेंद्रियां जान । कैवल्य-पति श्रीकृष्ण । कहता है तू अर्जुन । सुन ले यह ॥ १ ॥ प्राणोंको जो प्रिया होती । क्रिया-शक्ति कहलाती । तनमें है आती जाती । इन पांचोंसे ॥ २ ॥ ऐसे ये दश-करण । बताये तुझे अर्जुन । कहता हूं अब मन । रहता कैसा ॥ ३ ॥ मनका विवेचन --- इंद्रिय-बुध्दि मध्य पर । रजोगुणका ले आधार । अतीव तरल होकर । रहता पार्थ ॥ ४ ॥ आकाशकी नीलिमा-सा । मृग-जल-तरंग सा । व्यर्थका मिथ्याभास-सा । रहता है वह ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ४३८
तथा-शुक्रशोणित मिलन । देता है पंच-तत्वको चिह्न । एक वायु-तत्व अर्जुन । बनता दस रूप ॥ ६ ॥ फिर यह दस प्रकार । देहका सामर्थ्य लेकर । अपने निज स्थान पर । हुए प्रतिष्ठित ॥ ७ ॥ वहां चांचल्य चपल । रहा जो एक केवल । इससे रजका बल । लिया उसने ॥ ८ ॥ बुद्धिके वह बाहर । अहंताके डर पर । ऐसे मध्य-स्थान पर । दृढ हो बैठा ॥ ९ ॥ व्यर्थ है उसका नाम मन । जो मात्र कल्पना मूर्तिमान । उसके संगसे मिला जान । वस्तुको जीव भाव ॥ ११० ॥ प्रकृतिका है जो मूल । कामको जिसका बल । चेतता है जो प्रबल । अहंकार ॥ ११ ॥ इच्छाको वह बढ़ाता । आशाको वह चढ़ाता । रक्षण नित करता । भयका जो ॥ १२ ॥ द्वैतका जो उगम-स्थान । अविद्या करे बलवान । इन्द्रियोंका करे पतन । विषयोंमें ॥ १३ ॥ संकल्पोंसे है सृष्टि रचता । विकल्पोंसे उसको तोड़ता । मनोरथोंका ढेर चढा था- । उतराता वह ॥ १४ ॥ भ्रांतिका जो भंडार । वायु तत्व्-अंतर । तथा बुद्धिका द्वार । करता बंद ॥ १५ ॥ यह कहलाता मन । अन्य कछु नहीं जान । अब विषयाभिदान । बताता हूं ॥ १६ ॥ विषयोंका स्पष्टीकरण- स्पर्श तथा शब्द । रूप रस गंध । हैं ये पंच-विध । ज्ञानेंद्रियोंके ॥ १७ ॥ ४३९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इन द्वारोंसे निरंतर । दौड़ता है ज्ञान बाहर । भ्रांत हो जैसा जानवर । हरा चारा देख ॥ १८ ॥ फिर स्वर वर्ण विसर्ग । अथवा स्वीकार औ' त्याग । तथा संक्रमण उत्सर्ग । विण्मूत्रोंका ॥ १९ ॥ कर्मेंद्रियोंके पांच । विषय हैं ये सच । बांध करके माच । चलती क्रिया ॥ १२० ॥ ऐसे दस बसे हैं । देहमें विषय हैं । इच्छा जो कहाती है । कहते अब ॥ २१ ॥ इच्छाका स्वरूप तथा द्वेष— गत भोग जब है स्मरता । या ऐसा शब्द कानपे आता । तो कानपे हाथ रख जाता । न तो वृत्ति-जगती ॥ २२ ॥ विषयेंद्रिय भेंट होती । तभी वह जाग उठती । कामका हाथ धर वृत्ति । उठती जो ॥ २३ ॥ अजी ! उठनेसे यह वृत्ति । मनकी होती तीव्र-गति । जहां नहीं जाना वहां जाती । ललचाकर इन्द्रियां ॥ २४ ॥ जिस प्रवृत्तिके लोभसे । बुद्धि हो पगलाई जैसे । इन्द्रियां लुब्ध हो उससे । वह है इच्छा ॥ २५ ॥ इन्द्रियोंका जो इच्छित विषय । नहीं पाती वे जब धनंजय तब अनुभवती जो इन्द्रिय । वह है द्वेष ॥ २६ ॥ सुख दुःखका स्वरूप— कहता हूं अब सुख । वह ऐसा है तू देख । जिस एकसे अशेष । भूले सब जीव ॥ २७ ॥ अजी ! तन मन वचन । अपनी सौगंधसे जान । देह-स्तुतिको बल-हीन । करते आता ॥ २८ ॥ ज्ञानेश्वरी ४४०
पानेसे जिसे अर्जुन । शिथिल होता है प्राण । दूना होता है सत्व-गुण । पहलेसे भी ॥ २९ ॥ इन्द्रिय-वृत्तियोंको संपूर्ण । हृदयमें ला एकांत स्थान । करता है शांत निद्राधीन । पुचकारकर ॥ १३० ॥ कहूं क्या इससे अधिक । जीव होता आत्मासे एक । उस स्थितिका नाम सुख । पांडुकुमार ॥ ३१ ॥ तथा ऐसी अवस्था । न पाके जीना पार्थ । तुम जानो सर्वथा । नाम दुःखका ॥ ३२ ॥ मनोरथ जो संगसे नहीं । वैसे वह स्वयं-सिद्ध है ही । इन दोनोंके कारणसे ही । सुख है औ' दुःख ॥ ३३ ॥ चेतनाका विवेचन— अब है असंग औ' साक्षी-भूत । जिसकी सत्ता देहमें सतत । नाम उसका यहां पांडुसुत । चेतना है ॥ ३४ ॥ नखसे जो शिख पर्यंत । तन पे सर्वत्र जागृत । नहीं होता परिवर्तित । अवस्थात्रयमें ॥ ३५ ॥ मन-बुद्धि आदि प्रफुल्लित । औ' प्रवृत्ति-वनमें वसंत । खिला रहता जिससे पार्थ । सदैव ही ॥ ३६ ॥ जडाजड़से समान । करता है जो वर्तन । कहता हूं मैं चेतन । यह नहीं मिथ्या ॥ ३७ ॥ राजा परिवार नहीं जानता । आज्ञासे पर-चक्र दूर होता । पूर्ण-चंद्र देख उमड़ आता । महा-सागर ॥ ३८ ॥ या चुंबकका सन्निधान । करता लोहेको चेतन । सूर्य-संगसे होते जन । कार्य-प्रवृत्त ॥ ३९ ॥ मुख लगाये बिन । पिल्लोंका है पोषण । करती है अर्जुन । कूर्मी जैसे ॥ १४० ॥ (56) ४४१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
उसी भांतिसे अर्जुन । आत्म-संगसे है तन । प्राप्त करता जीवन । जड़ है जो ॥ ४१ ॥ इसको है चेतन । कहते हैं अर्जुन । धृतिका विवेचन । सुन तू अब ॥ ४२ ॥ धृतिका विवेचन— पंच तत्वमें परस्पर । जाति-स्वभावसे है वैर । डुबोता है पृथ्विको नीर । प्रकट रूपसे ॥ ४३ ॥ पानीको तेज सोखता । वायु तेजसे लड़ता । वायुका नाश करता । गगन सहज ॥ ४४ ॥ कभी किसीमें न मिलकर । किसीसे मिलन न होकर । पैठकर भी भिन्न भीतर । रहता आकाश ॥ ४५ ॥ पंच-भूत ऐसे परस्पर । करते रहते सदा वैर । किंतु एक बनके शरीर । रूप होता प्रकट ॥ ४६ ॥ शत्रुता छोड भीषण । रहते कर संघटन । परस्पर कर पोषण । अपने गुणसे ॥ ४७ ॥ जिनमें स्वभावसे शत्रुता । रहती है वे कर मित्रता । जिस गुणसे है यह होता । धृति उसका नाम ॥ ४८ ॥ संघात और क्षेत्र-विवेचन— तथा जीव सह साथ । छत्तीस है यहां साथ । वह है यहां संघात । तत्व जान ॥ ४९ ॥ ऐसे छत्तीस ही भेद । किये तुझसे विशद । इसको जान प्रसिध्द । क्षेत्र है यह ॥ १५० ॥ जैसे रथांगोंका समुदाय । रथ कहलाता धनंजय । या शरीरावयव इंद्रिय । कहलाता शरीर ॥ ५१ ॥ करि तुरंगादिका समाज । कहलाता है सैन्य सहज । वाक्य कहलाते हैं जो पुंज । शब्दोंके ॥ ५२ ॥ ज्ञानेश्वरी ४४२
जल-धरोंके मंडल । कहलाते हैं बादल । अनेक लोक सकल । कहलाता जगत ॥ ५३ ॥ या तेल बात अगिन । आते जब एक स्थान । दीप कहते हैं जान । धनंजय ॥ ५४ ॥ ये जो छत्तीस ही तत्व । मिलते हैं हो एकत्र । वह समूह-परत्व । कहलाता क्षेत्र ॥ ५५ ॥ बोआईके व्यवहारसे । पाप-पुण्य पक जानेसे । हमने कहा कौतुकसे । क्षेत्र है यह ॥ ५६ ॥ अनेकोंका है मत । देह है यह पार्थ । इसके हैं अनंत । यहां नाम ॥ ५७ ॥ इस ओर परतत्वके । औ' उस ओर स्थावरके । होता जाता है जो उसके । नाम क्षेत्र है ॥ ५८ ॥ किंतु सुर-नर-उरग । आदि होते योनि-विभाग । सब गुण-कर्मके संग । भिन्न हैं पार्थ ॥ ५९ ॥ यह गुण-विवेचन । आगे आता है अर्जुन । प्रस्तुत है यहां ज्ञान- । रूप दिखाऊं ॥ १६० ॥ ज्ञानकी महानता, ध्यानकी विविधता— तुझे क्षेत्र सविस्तर । मैंने कहा स-विकार । सुन अब तू उदार । ज्ञानका रूप ॥ ६१ ॥ जिस ज्ञानार्थ योगी-जन । स्वर्गका कर उल्लंघन । निगलते सदा गगन । धनंजय ॥ ६२ ॥ सिधिकी आस न करते । ऋद्धिका ध्यान न धरते । योगके कष्ट हैं सहते । तुच्छ मानके ॥ ६३ ॥ तप-दुर्गोंको पार करते । यज्ञादि अनुष्ठान करते । तथा उलटाकर छोड़ते । कर्म-वल्ली ॥ ६४ ॥ ४४३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
कुछ जो भजन मगन । दौडते हैं खुले बदन । कुछ सुरंगमें अर्जुन । घुसते सुषुम्नाके ॥ ६५ ॥ ऐसे हैं इस ज्ञानार्थ । मुनीश्वर जो इच्छित । फिरते हैं पात पात । वेद-तरुके ॥ ६६ ॥ देगी यह गुरु-सेवा । इस बुध्दिसे पांडव । करते जन्मका ठेवा । न्योच्छावर ॥ ६७ ॥ अजी ! प्रवेश उस ज्ञानका । नाश करता है अविद्याका । ऐक्य साधता जीव-आत्मका । पांडुकुमार ॥ ६८ ॥ इंद्रियोंका द्वार रोकता । प्रवृत्तिका पैर तोड़ता । दारिद्य्रको नष्ट करता । मन-बुध्दिका ॥ ६९ ॥ हरता द्वैतका अकाल । करता साम्यका सुकाल । प्राप्त होती ऐसी उज्ज्वल । स्थिति ज्ञानसे ॥ १७० ॥ मदको करता नाम शेष । न रखता भ्रांति-अवशेष । तथा आप-परका है भास । नष्ट करता ॥ ७१ ॥ करता संसार उन्मूल । धोता संकल्प-महामल । घेरता ज्ञेयको सकल । जो है अनावर ॥ ७२ ॥ जिसका है उज्ज्वलपन । खोलता बुध्दिके नयन । बने जीवका क्रीडांगन । आनंद धाम ॥ ७३ ॥ ऐसे है यह ज्ञान । पवित्र्यक्य निधान । जहां भृष्ट हो मन । होता निर्मल ॥ ७४ ॥ आत्माको जो जीव-बुद्धि । लगी जैसी क्षय-व्याधि । वह उसकी सन्निधि । करती दूर ॥ ७५ ॥ उस अनिरूपका निरूपण । सुनकर होगा बुद्धिको ज्ञान । किंतु देख न सकेंगे नयन । उसको कभी ॥ ७६ ॥ अजी ! शरीरमें वह जब । शक्ति प्रकट करता तब । इंद्रियोंके व्यापारसे सब । देखेंगे नयन ॥ ७७ ॥ ज्ञानेश्वरी ४४४
वसंतका शुभागमन । दिखाता खिला हुवा वन । वैसे दिखाते हैं करण । अस्तित्व ज्ञानका ॥ ७८ ॥ वृक्षके जड़में नीर । पातालमें धनुर्धर । दिखाते वह अंकुर । लहरा कर जैसे ॥ ७९ ॥ अथवा भूमिकी है मृदुता । कहे अंकुरोंकी कोमलता । आचार गौरव विविधता । सत्कुलिनोंकी ॥ १८० ॥ आदरातिथ्यका समारोह । प्रकट करता जैसे स्नेह । या दर्शनसे होता उत्साह । पुण्य-पुरुषके ॥ ८१ ॥ कदली-वृक्षमें उत्पन्न कपूर । जाना जाता है सुगंधसे सुन्दर । जैसे प्रकाश फैलाता है बाहर । स्फटिक घटका दीप ॥ ८२ ॥ अजी ! वैसे हृदय स्थित-ज्ञान । प्रकटता बन देह-लक्षण । उसे कहता हूं तुझे अर्जुन । सुन ध्यान देकर ॥ ८३ ॥ अमानित्वमदंभित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥ ज्ञानके लक्षण–१ अमानित्व— नहीं रुचता है उसे । होड करना किसीसे । सजनता भी है उसे । लगता बोझ ॥ ८४ ॥ करनेसे गुण-वर्णन । मान्यताका भी दिया मान । प्रकट होनेसे अर्जुन । योग्यताका ॥ ८५ ॥ घबडाता है वह कैसा । व्याधसे घिरा मृग जैसा । अथवा भंवरमें फसा । तैराक मानो ॥ ८६ ॥ सम्मानको यह सुभट । पास आया मान संकट । आने न देता है निकट । गरिमा अपने ॥ ८७ ॥ नम्रता दंभ-शून्यत्व अहिंसा ऋजुता क्षमा । पवित्रय गुरु-शुश्रूषा स्थिरता आत्म-संयम ॥ ७ ॥ ४४५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
न देखना आंखोंसे पूजना । स्वकीर्ति कानोंसे न सुनना । लोगोंको स्मरण नहीं होना । अपना कभी ॥ ८८ ॥ वहां सत्कारकी गोष्ठि । न आदर न है भेटी । मनमें होता है कष्टी । नमस्कारसे ॥ ८९ ॥ वाचस्पतिकी भांति । सर्वज्ञताकी प्राप्ति । होके भी है छिपाती । भीति कीर्तिकी ॥ १९० ॥ चातुर्यको छिपाता । महत्त्वको भुलाता । बावला हो रहता । प्रेमसे जो ॥ ९१ ॥ लौकिकका उसे उद्वेग । शास्त्रार्थका भी है उबग । मनमें है नाम सुभग । रहता स्वस्थ ॥ ९२ ॥ लोगोंसे हो अनादर । आप्तोंसे न अंगीकार । ऐसी लालसा अपार । रहती उसकी ॥ ९३ ॥ नम्रताका व्यवहार । अल्पत्व हो अलंकार । करना ऐसे आचार । उसका स्वभाव ॥ ९४ ॥ रहता है या नहीं । ऐसा रहना कहीं । मनमें आशा यही । जीवनमें सदा ॥ ९५ ॥ चलता है या नहीं वहां । हवासे उडता है कहां । ऐसा भ्रम हो जहां तहां । सहज रहे ऐसा ॥ ९६ ॥ मेरा अस्तित्व हो लोप । मिट जाये नाम-रूप । जिससे भय हो लोप । प्राणि-मात्रका ॥ ९७ ॥ उसकी ऐसी मनौति । एकांतमें होती प्रीति । एकांतसे नित्य-रति । उसको सर्वत्र ॥ ९८ ॥ हवासे उसका पटता । गगनसे बोलना भाता । वृक्षोंसे मैत्री है करता । जीव-भावसे ॥ ९९ ॥ अथवा है इस भांतिके । लक्षण दीखते जिसके । सह-शय्यामें ही उसके । रहता ज्ञान ॥ २०० ॥ ज्ञानेश्वरी ४४६
साधकमें अमानित्व गुण । जानना है ऐसा सु-लक्षण । कहूंगा अदंभका लक्षण । तुझसे अब ॥ १ ॥ २ अदंभका विवेचन— अदंभत्व यह ऐसा । लोभीका धन हो जैसा । न कहता ठाव जैसा । प्राणांतमें भी ॥ २ ॥ उस पर मानो सुभट । आया यदि प्राण-संकट । किंतु न करता प्रकट । सत्कर्म अपना ॥ ३ ॥ सहज आयी दुग्धाद्रता । सोखती गायकी दुष्टता । या छिपाती वेश्या प्रौढता । वैसे ही धनंजय ॥ ४ ॥ या श्रीमंत श्री-मानता । अरण्यमें है छिपाता । या तनकी सुंदरता । कुलांगना ॥ ५ ॥ बोया हुवा बीज छिपाता । उसपे है माटी डालता । ऐसे ही सत्कर्म छिपाता । पुण्यके वह ॥ ६ ॥ देहकी पूजा नहीं करता । लोक-रंजन नहीं करता । स्वधर्मको न बांध सकता । वाग्ध्वजमें कभी ॥ ७ ॥ परोपकार नहीं कहता । न करें साधनाकी वाच्यता । पाया हुवा पुण्य न बेचता । वैभवार्थ कभी ॥ ८ ॥ देख उसके अंग-भोग । लगता कृपण अभाग । धर्म-कर्ममें महा-भाग । न कम या अधिक ॥ ९ ॥ घरमें सदा तंग । रहता कृष अंग । दानमें आगे पग । सुर-तरु-सा ॥ २१० ॥ या स्वधर्ममें महान । स-समय देता दान । आत्म-चर्चामें निपुण । वैसे मूढ ॥ ११ ॥ कदलीका अंग छिलकेडार । लगे हलका थोथा धनुर्धर । होता है रसाल पकनेपर । वैसा ही जान ॥ १२ ॥ ४४७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
या हलका अंग जैसे मेघका । उडायेगा मानो झोंका वायुका । किंतु बरसते आश्चर्यका । घनघोर मेह ॥ १३ ॥ होता वह पूर्णत्वमें जैसे । देख तृष्णा भी पूर्ण हो वैसे । किंतु रहता है कंगालीसे । परिपूर्ण ॥ १४ ॥ ऐसे जो चिन्ह-युत । दीखता है सतत । ज्ञान है करगत । नित्य उसके ॥ १५ ॥ है जो अदंभ पन । इसीका नाम जान । अब तू मर्म सुन । अहिंसाका ॥ १६ ॥ ३ अहिंसा-विवेचन, याज्ञिक-अहिंसा- अहिंसाके अनेक प्रकार । कहते हैं नाना मतांतर । करते हैं अपना प्रचार । निरूपणसे ॥ १७ ॥ वह सब ऐसा देख । जैसा तोड़ कर शाख । किया है जडमें देख । उससे बाढ ॥ १८ ॥ या हाथोंको तोड-बेचकर । करना क्षुधाका परिहार । या मंदिरको तुड़वा कर । बांधलें पौली ॥ १९ ॥ वैसे हिंसा कर अहिंसा । उत्पन्न करना है ऐसा । निर्णय है पूर्ण-मीमांसा- । का धनंजय ॥ २२० ॥ अवृष्टिके उपद्रवसे जब । विश्व होता है जर्जरित तब । करना याग नाना विध सब । पर्जन्यार्थ ॥ २१ ॥ जब होता यज्ञका मूल । पशु-हिंसासे ही सरल । कहो तब अहिंसा-कूळ । देखें कैसे ? ॥ २२ ॥ बोनेसे केवल हिंसा । फलेगी कैसी अहिंसा । अचरजका साहस । याज्ञिकोंका ॥ २३ ॥ आयुर्वेद और अहिंसा- तथा आयुर्वेद संपूर्ण । इसी ढंगका है अर्जुन । करना जीवके कारण । जीव घात ॥ २४ ॥ ज्ञानेश्वरी ४४८
विविध रोगसे पीडित । देख उसमें जर्जरित । हिंसा कर निवारणार्थ । कहा चिकित्सा ॥ २५ ॥ देखो उस चिकित्साको । खोदा किसीके जड़को । उखाड़ा किसी वृक्षको । समूल-पत्र ॥ २६ ॥ किसीका गाभा निकाल । किसीकी खाल छील । किसीका तोड़ा कोंपल । पकाने पुट देने ॥ २७ ॥ अजात-शत्रु वे तरुवर । सर्वांग उनका चीरकर । ऐसा जीव लेके धनुर्धर । किया नीरस ॥ २८ ॥ तथा जंगमको भी हाथ । लगाकर निकाला पित्थ । फिर किये रोग-पीडित । भले चंगे ॥ २९ ॥ व्यावहारिक अहिंसा- अजी ! तोड वसति घर । बांधे जाते मंदिर-द्वार । व्यवहारमें लूट कर । बांधा अन्न-छत्र ॥ २३० ॥ पगडी बांधी सिरपर । अपनी धोती खोलकर । या तोडके अपना घर । डाला मंडवा ॥ ३१ ॥ अपनी रजाई जलाकर । ताप लिया जैसे रात-भर । जैसे स्नान करता कुंजर । मृत्तिकासे ॥ ३२ ॥ गोठा बांधा बैल बेच कर । या तोता दे लिया पंजर । ऐसी करणी देख कर । हंसी आती है ॥ ३३ ॥ कोई धर्म धर्म कहते । पानीको छानकर पीते । उसी तापसे हैं मरते । जीव असंख्य ॥ ३४ ॥ न पकाके खाते धान । हिंसाके भयसे जान । जिससे तडपे प्राण । यही है हिंसा ॥ ३५ ॥ एवं हिंसाको अहिंसा । कर्म-कांडमें है ऐसा । सिद्धांत है सुमन-सा । जान ले तू ॥ ३६ ॥ ४४९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग (57)
नाम लिया अहिंसाका । दर्शन हुआ मतोंका । अंकुर फूटा स्फूर्तिका । मतिमें यहां ॥ ३७ ॥ तब इसको कैसे छोड़ना । इसलिये पडा है कहना । तुझको भी इसे है जानना । यही भाव ॥ ३८ ॥ जब कभी अहिंसापे कहा जाता । इसी भांति है प्रतिपादन होता । इसीलिये सब कहना पड़ता । न तो अपथ क्यों जावें ? ॥ ३९ ॥ तथा स्व-मतका निर्धार । करनेमें है धनुर्धर । दूसरे मत-मतांतर । जानना अच्छा ॥ २४० ॥ तथा सुन तू यह पार्थ । निरूपणकी यह-रीत । अब कहता मुख्य बात । इसके बाद ॥ ४१ ॥ वास्तविक अहिंसा, श्रीज्ञानदेवका स्वमत -- अब कहूंगा मैं स्वमत । अहिंसाका रूप-लक्षित । उसको जानकर चित्त । प्रकटेगा ज्ञान ॥ ४२ ॥ जिसमें है अहिंसाका अधिष्ठान । प्रकट करेगा उसका वर्तन । जैसे कसौटी करे मूल्य-मापन । स्वर्णका वैसे ॥ ४३ ॥ होता ज्ञान औ' मनका मिलन । होता अहिंसाका बिंब-दर्शन । उसका रूप सुन तू अर्जुन । कहता हू मैं ॥ ४४ ॥ ज्ञानी अहिंसकका चलना - जैसे तरंग न लांघता । पैरसे लहर न तोड़ता । पानकी ध्वनि भी न तोड़ता । अपने पैरसे ॥ ४५ ॥ वेगसे किंतु बचाकर । भक्ष्यपे दृष्टि स्थिर-कर । चलता पैर उठाकर । बक-पक्षी जैसे ॥ ४६ ॥ अथवा कमल पर भ्रमर । रखता है कोमलतासे पैर । कहीं टूटेगा उसका केसर । इसके भयसे ॥ ४७ ॥ जैसे परमाणुमें छिपे हैं । छोटे जीव वह जानता है । दयासे ढकके चलता है । अपने पाव ॥ ४८ ॥ ज्ञानेश्वरी ४५०
कृपाकी राह बनाकर । प्रेमसे दिशा भरकर । पद्-तलमें बिछाकर । अपना जीव ॥ ४९ ॥ किस भांति बचाकर चलना । वर्णनमें शब्द नहीं मिलता । तथा जो है अनुपमेय होता । अर्जुन वह ॥ २५० ॥ स-ममता मुहसे उठाती । बिलाडी पिल्लेको ले जाती । पिल्लेको दांत नहीं लगाती । वैसे पार्थ ॥ ५१ ॥ अथवा स्नेहार्द जो माता । राह देखती स-ममता । शिशुकी तब जो मृदुता । होती दृष्टिमैं ॥ ५२ ॥ या कमल-दल हिलाते । उससे जो पवन लेते । तब जैसे हैं सुख पाते । नयन पसार ॥ ५३ ॥ उस मार्दवसे जो पग । पृथ्वीपे रखता अलग । लगनेसे यदि वे स्वर्ग- । सुखसा मिलता ॥ ५४ ॥ ऐसे चलते हुए भी कोमल । कृमि-कीटक देखके दुर्बल । लौटता वहांसे वह निर्मळ । सावकाश ॥ ५५ ॥ मेरे पगका शब्द भी यदि होगा । विश्व-व्यापकका निद्रा-भंग होगा । उसका मुख-रूप कुम्हलायेगा । ऐसे वह सोचता ॥ ५६ ॥ इस कारणसे सदैव । चलता है सावध-भाव । न कुचलता कोई जीव । कभी कहीं ॥ ५७ ॥ देख कर तृणमें भी जीव । न लांघना है उसका भाव । तब देख प्रत्यक्ष जीव । कुचले कैसे ॥ ५८ ॥ चींटा मेरू न लांघ सकता । झींगुर सिंधु नहीं तैरता । वैसा ही वह नहीं लांघता । कभी किसीको ॥ ५९ ॥ ज्ञानी-अहिंसकका बोलना— ऐसी है उसकी रीत । कृपा फलसे है फलित । उसकी वाणीमें जागृत । दया दर्शनीय ॥ २६० ॥ ४५१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
स्व-शन उसका सु-कुमार । मानो मुख है प्रेमका घर । माधुर्यमें आये हैं अंकुर । ऐसे वे दांत ॥ ६१ ॥ आगे आगे चूता स्नेह-निर्झर । पीछे पीछे चलते हैं अक्षर । तब होता शब्दोंका अवतार । पहले आती कृपा ॥ ६२ ॥ उसका बोलना ही नहीं । बोलना चाहता जो कहीं । तो बोलना किसीको नहीं । चुभेगा कभी ॥ ६३ ॥ बोलनेमें होता क्या अधिक । चुभता क्या कोई बोल एक । होता क्या कोई सुन साशंका । रहता सावधान ॥ ६४ ॥ प्रतिपादित बात टूटेगी । किसीमें भीति उदित होगी । अन्य-बात उपेक्षित होगी । यही मनमें ॥ ६५ ॥ किसीका मन नहीं दुखाना । किसीकी भृकुटी न ऊठना । मनमें ही सोझता रहना । स्वस्थतासे ॥ ६६ ॥ कोई उनसे विनय करता । तब जो वह बोलने लगता । सुननेवाला है अनुभवता । यह है माय-बाप ॥ ६७ ॥ मानो नाद-ब्रह्मने लिया आकार । अथवा है गंगा-जलके तुषार । पतिव्रताका निर्मल मनोहर । वार्धक्य आया ॥ ६८ ॥ वैसा सत्य और कोमल । हित-मित किंतु सरल । मानो बोल होते कल्लोल । अमृतके हैं ॥ ६९ ॥ उपरोध विवाद बल । प्राणि-तापदायक बोल । उपहास शब्दका शूल । तथा मर्म-स्पर्शी ॥ २७० ॥ हठ आवेश कपट छल । आशा शंका प्रतारणा-बोल । ये अवगुण तज सरल । बोलता वह ॥ ७१ ॥ ज्ञानी-अहिंसकका देखना— वैसे ही उसकी पार्थ । होती है दृष्टि सतत । भृकुटिसे होती मुक्त । सर्वत्र ही ॥ ७२ ॥ ज्ञानेश्वरी ४५२
प्राणिमात्र है ब्रह्मका स्थान । उसे होगी दृष्टिकी चुभन । इसीलिये है वह अर्जुन । न देखता कभी ॥ ७३ ॥ कहीं कभी किसी समय । हृदयसे हो कृपामय । खुले नयन सुखमय । तभी देखा ॥ ७४ ॥ चंद्र-बिंबसे स्रवती धार । न होती यदि वह गोचर । किंतु उससे होते चकोर । परिपुष्ट ॥ ७५ ॥ प्राणिमात्रका ऐसा होता । जब किसीको है देखता । ऐसी अवलोकन-प्रथा । न जाने कूर्मी-भी ॥ ७६ ॥ उसकी दृष्टि ऐसी है । सब भूतोंके प्रति है । उसके हाथ कैसे हैं । कहता अब ॥ ७७ ॥ ज्ञानी-अहिंसककी कार्य-प्रणाली-- होकर सदैव कृतार्थ । रहे सिद्धके मनोरथ । वैसे उसके होते हाथ । निष्व्यापार ॥ ७८ ॥ जैसे अंधेने छोड़ा देखना । निरिंधन अग्निका बुझना । अथवा गूंगेका मौन लेना । वैसे उसका ॥ ७९ ॥ इस भांति कुछ कहीं । उसको करना नहीं । आते हैं सब ही वहीं । बैठने हेतु ॥ २८० ॥ लगेगा झटका पवनको । या नख लगेंगे आकाशको । इस भावसे वह हाथको । हिलाता ही नहीं ॥ ८१ ॥ शरीरसे प्राणियोंको हटाना । या आंखोंसे धुर धुरे उड़ाना । या पशु पक्षियोंको देखना । इसी भावसे ॥ ८२ ॥ ऐसी है जिसकी बात । न लेता दंड या बेंत । कैसा लेगा वह पार्थ । हाथमें शस्त्र ॥ ८३ ॥ लीलासे कमलसे खेलना । सुमन-मालाको भी झेलना । उसको भी गोफिया मानना । स्वभाव उसका ॥ ८४ ॥ ४५३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
अपने शरीरके रोम हिलेंगे । इसलिये हाथ न सहलायेंगे । नखोंके लपट लिपट जायेंगे । उंगुलियों पर ॥ ८५ ॥ करनेको है जहां अभाव । बन गया है ऐसा स्वभाव । हाथोंका है तब निज-भाव । जुड़ जाते वे ॥ ८६ ॥ या उठते हैं अभय देने । आर्त दीनकी सेवा करने । गिरनेवालोंको संभालने । कभी कभी ॥ ८७ ॥ यह भी वह बलसे करता । आर्तका भय दुख हरता । उस हस्त-स्पर्शकी शीतलता । न जाने चंद्रमा भी ॥ ८८ ॥ उसका वह स्पर्श पाकर । लगे मलयानिलय कठोर । सहलाता हो प्रेम विभोर । पशुको भी ॥ ८९ ॥ हाथ जो रीता सदा खुला । चंदनांग जैसे निर्मल । न फलनेपे भी निष्फल । कह सकते नहीं ॥ २९० ॥ रहने दो यह वाग्जाल । जाने उसके करतब । जैसे है सज्जनोंका शील । स्वभाव वैसे ॥ ९१ ॥ ज्ञानीके अहिंसक मनका स्वरूप— अब कहूंगा मनका लक्षण । यह कहना भी है विलक्षण । अब तक किया जो निरूपण । किसका विलास ॥ ९२ ॥ शाखा नहीं हैं क्या तरूवर । जल बिन होता क्या सागर । या तेज बिन क्या तेजाकार । संभव है क्या ॥ ९३ ॥ अवयव और शरीर । नहीं क्या एक ही आधार । अथवा रस और नीर । भिन्न है क्या ॥ ९४ ॥ इसीलिये यहां सर्व । कहे हैं जो बाह्य भाव । मन ही वे सावयव । ऐसे जानना ॥ ९५ ॥ जिस बीजका किया रोपन । फैला वही शाखा रूप बन । वैसे इंद्रियोंसे प्रसरण । होता मनका ही ॥ ९६ ॥ ज्ञानेश्वरी ४५४
अजी ! मनमें ही जो नहीं । अहिंसाका नाम भी कहीं । बाहर प्रगटे भी वही । कहो कैसे ॥ ९७ ॥ होती है जिसकी चाह पार्थ । वृत्ति वह मनमें उदित । होती वह फिर प्रकाशित । वाचादि इंद्रियोंसे ॥ ९८ ॥ मनमें जो है ही नहीं । वाचादिसे क्या कभी कहीं । बीज बिन अंकुर कहीं । उगता है क्या ॥ ९९ ॥ उगम ही जहां सूख जाता । प्रवाह कहो कैसे बहता । जीव आने पर भी क्या होता । कहीं उद्योग ॥ ३०० ॥ मनका जब ममत्व टूटता । इंद्रियोंका व्यापार ही मिटता । सूत्रधार बिना नहीं चलता । गुड़ियाका खेल ॥ १ ॥ मन है वैसे पांडव । उसका मूल इंद्रिय भाव । व्यापार करता यही सर्व । इंद्रियों द्वारा ॥ २ ॥ किंतु जो समयके अनुसार । वासना रूप बनके अंदर । कार्य था वह रूपसे बाहर । आता इंद्रियोंसे ॥ ३ ॥ इसीलिये मनमें यथार्थ । होती है अहिंसा विकसित । पक्व सुगंध हो उल्लसित । फैलता वैसे ॥ ४ ॥ इन्द्रियां ही मनकी 'संपदा । बेचती हैं सर्वत्र सर्वदा । और है जो अहिंसाका धंदा । करती रहती हैं ॥ ५ ॥ जब आता समुद्रमें उभार । भरते हैं आखात चहूं ओर । स्व-संपत्तिसे चित्त बार बार । भरता इन्द्रियोंको ॥ ६ ॥ अजी ! जैसे सदा पंडित । बालकका पकड हाथ । अक्षर करता है व्यक्त । अपने आप ॥ ७ ॥ वैसे अपना दयालूपन । हाथ पैरमें लाता है मन । करता फिर वहां उत्पन्न । अहिंसाके ॥ ८ ॥ इससे किया मैंने अर्जुन । इन्द्रियोंका अहिंसा-वर्णन । इससे है मनका दर्शन । होता स्पष्ट ॥ ९ ॥ ४५५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग