भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जल-धरोंके मंडल । कहलाते हैं बादल । अनेक लोक सकल । कहलाता जगत ॥ ५३ ॥ या तेल बात अगिन । आते जब एक स्थान । दीप कहते हैं जान । धनंजय ॥ ५४ ॥ ये जो छत्तीस ही तत्व । मिलते हैं हो एकत्र । वह समूह-परत्व । कहलाता क्षेत्र ॥ ५५ ॥ बोआईके व्यवहारसे । पाप-पुण्य पक जानेसे । हमने कहा कौतुकसे । क्षेत्र है यह ॥ ५६ ॥ अनेकोंका है मत । देह है यह पार्थ । इसके हैं अनंत । यहां नाम ॥ ५७ ॥ इस ओर परतत्वके । औ' उस ओर स्थावरके । होता जाता है जो उसके । नाम क्षेत्र है ॥ ५८ ॥ किंतु सुर-नर-उरग । आदि होते योनि-विभाग । सब गुण-कर्मके संग । भिन्न हैं पार्थ ॥ ५९ ॥ यह गुण-विवेचन । आगे आता है अर्जुन । प्रस्तुत है यहां ज्ञान- । रूप दिखाऊं ॥ १६० ॥ ज्ञानकी महानता, ध्यानकी विविधता— तुझे क्षेत्र सविस्तर । मैंने कहा स-विकार । सुन अब तू उदार । ज्ञानका रूप ॥ ६१ ॥ जिस ज्ञानार्थ योगी-जन । स्वर्गका कर उल्लंघन । निगलते सदा गगन । धनंजय ॥ ६२ ॥ सिधिकी आस न करते । ऋद्धिका ध्यान न धरते । योगके कष्ट हैं सहते । तुच्छ मानके ॥ ६३ ॥ तप-दुर्गोंको पार करते । यज्ञादि अनुष्ठान करते । तथा उलटाकर छोड़ते । कर्म-वल्ली ॥ ६४ ॥ ४४३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग