भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 516, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 516

कुछ जो भजन मगन । दौडते हैं खुले बदन । कुछ सुरंगमें अर्जुन । घुसते सुषुम्नाके ॥ ६५ ॥ ऐसे हैं इस ज्ञानार्थ । मुनीश्वर जो इच्छित । फिरते हैं पात पात । वेद-तरुके ॥ ६६ ॥ देगी यह गुरु-सेवा । इस बुध्दिसे पांडव । करते जन्मका ठेवा । न्योच्छावर ॥ ६७ ॥ अजी ! प्रवेश उस ज्ञानका । नाश करता है अविद्याका । ऐक्य साधता जीव-आत्मका । पांडुकुमार ॥ ६८ ॥ इंद्रियोंका द्वार रोकता । प्रवृत्तिका पैर तोड़ता । दारिद्य्रको नष्ट करता । मन-बुध्दिका ॥ ६९ ॥ हरता द्वैतका अकाल । करता साम्यका सुकाल । प्राप्त होती ऐसी उज्ज्वल । स्थिति ज्ञानसे ॥ १७० ॥ मदको करता नाम शेष । न रखता भ्रांति-अवशेष । तथा आप-परका है भास । नष्ट करता ॥ ७१ ॥ करता संसार उन्मूल । धोता संकल्प-महामल । घेरता ज्ञेयको सकल । जो है अनावर ॥ ७२ ॥ जिसका है उज्ज्वलपन । खोलता बुध्दिके नयन । बने जीवका क्रीडांगन । आनंद धाम ॥ ७३ ॥ ऐसे है यह ज्ञान । पवित्र्यक्य निधान । जहां भृष्ट हो मन । होता निर्मल ॥ ७४ ॥ आत्माको जो जीव-बुद्धि । लगी जैसी क्षय-व्याधि । वह उसकी सन्निधि । करती दूर ॥ ७५ ॥ उस अनिरूपका निरूपण । सुनकर होगा बुद्धिको ज्ञान । किंतु देख न सकेंगे नयन । उसको कभी ॥ ७६ ॥ अजी ! शरीरमें वह जब । शक्ति प्रकट करता तब । इंद्रियोंके व्यापारसे सब । देखेंगे नयन ॥ ७७ ॥ ज्ञानेश्वरी ४४४

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 516, कुल 1172 में से · BharatKosha