भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वसंतका शुभागमन । दिखाता खिला हुवा वन । वैसे दिखाते हैं करण । अस्तित्व ज्ञानका ॥ ७८ ॥ वृक्षके जड़में नीर । पातालमें धनुर्धर । दिखाते वह अंकुर । लहरा कर जैसे ॥ ७९ ॥ अथवा भूमिकी है मृदुता । कहे अंकुरोंकी कोमलता । आचार गौरव विविधता । सत्कुलिनोंकी ॥ १८० ॥ आदरातिथ्यका समारोह । प्रकट करता जैसे स्नेह । या दर्शनसे होता उत्साह । पुण्य-पुरुषके ॥ ८१ ॥ कदली-वृक्षमें उत्पन्न कपूर । जाना जाता है सुगंधसे सुन्दर । जैसे प्रकाश फैलाता है बाहर । स्फटिक घटका दीप ॥ ८२ ॥ अजी ! वैसे हृदय स्थित-ज्ञान । प्रकटता बन देह-लक्षण । उसे कहता हूं तुझे अर्जुन । सुन ध्यान देकर ॥ ८३ ॥ अमानित्वमदंभित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ ७ ॥ ज्ञानके लक्षण–१ अमानित्व— नहीं रुचता है उसे । होड करना किसीसे । सजनता भी है उसे । लगता बोझ ॥ ८४ ॥ करनेसे गुण-वर्णन । मान्यताका भी दिया मान । प्रकट होनेसे अर्जुन । योग्यताका ॥ ८५ ॥ घबडाता है वह कैसा । व्याधसे घिरा मृग जैसा । अथवा भंवरमें फसा । तैराक मानो ॥ ८६ ॥ सम्मानको यह सुभट । पास आया मान संकट । आने न देता है निकट । गरिमा अपने ॥ ८७ ॥ नम्रता दंभ-शून्यत्व अहिंसा ऋजुता क्षमा । पवित्रय गुरु-शुश्रूषा स्थिरता आत्म-संयम ॥ ७ ॥ ४४५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग