भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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न देखना आंखोंसे पूजना । स्वकीर्ति कानोंसे न सुनना । लोगोंको स्मरण नहीं होना । अपना कभी ॥ ८८ ॥ वहां सत्कारकी गोष्ठि । न आदर न है भेटी । मनमें होता है कष्टी । नमस्कारसे ॥ ८९ ॥ वाचस्पतिकी भांति । सर्वज्ञताकी प्राप्ति । होके भी है छिपाती । भीति कीर्तिकी ॥ १९० ॥ चातुर्यको छिपाता । महत्त्वको भुलाता । बावला हो रहता । प्रेमसे जो ॥ ९१ ॥ लौकिकका उसे उद्वेग । शास्त्रार्थका भी है उबग । मनमें है नाम सुभग । रहता स्वस्थ ॥ ९२ ॥ लोगोंसे हो अनादर । आप्तोंसे न अंगीकार । ऐसी लालसा अपार । रहती उसकी ॥ ९३ ॥ नम्रताका व्यवहार । अल्पत्व हो अलंकार । करना ऐसे आचार । उसका स्वभाव ॥ ९४ ॥ रहता है या नहीं । ऐसा रहना कहीं । मनमें आशा यही । जीवनमें सदा ॥ ९५ ॥ चलता है या नहीं वहां । हवासे उडता है कहां । ऐसा भ्रम हो जहां तहां । सहज रहे ऐसा ॥ ९६ ॥ मेरा अस्तित्व हो लोप । मिट जाये नाम-रूप । जिससे भय हो लोप । प्राणि-मात्रका ॥ ९७ ॥ उसकी ऐसी मनौति । एकांतमें होती प्रीति । एकांतसे नित्य-रति । उसको सर्वत्र ॥ ९८ ॥ हवासे उसका पटता । गगनसे बोलना भाता । वृक्षोंसे मैत्री है करता । जीव-भावसे ॥ ९९ ॥ अथवा है इस भांतिके । लक्षण दीखते जिसके । सह-शय्यामें ही उसके । रहता ज्ञान ॥ २०० ॥ ज्ञानेश्वरी ४४६