ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपानेसे जिसे अर्जुन । शिथिल होता है प्राण । दूना होता है सत्व-गुण । पहलेसे भी ॥ २९ ॥ इन्द्रिय-वृत्तियोंको संपूर्ण । हृदयमें ला एकांत स्थान । करता है शांत निद्राधीन । पुचकारकर ॥ १३० ॥ कहूं क्या इससे अधिक । जीव होता आत्मासे एक । उस स्थितिका नाम सुख । पांडुकुमार ॥ ३१ ॥ तथा ऐसी अवस्था । न पाके जीना पार्थ । तुम जानो सर्वथा । नाम दुःखका ॥ ३२ ॥ मनोरथ जो संगसे नहीं । वैसे वह स्वयं-सिद्ध है ही । इन दोनोंके कारणसे ही । सुख है औ' दुःख ॥ ३३ ॥ चेतनाका विवेचन— अब है असंग औ' साक्षी-भूत । जिसकी सत्ता देहमें सतत । नाम उसका यहां पांडुसुत । चेतना है ॥ ३४ ॥ नखसे जो शिख पर्यंत । तन पे सर्वत्र जागृत । नहीं होता परिवर्तित । अवस्थात्रयमें ॥ ३५ ॥ मन-बुद्धि आदि प्रफुल्लित । औ' प्रवृत्ति-वनमें वसंत । खिला रहता जिससे पार्थ । सदैव ही ॥ ३६ ॥ जडाजड़से समान । करता है जो वर्तन । कहता हूं मैं चेतन । यह नहीं मिथ्या ॥ ३७ ॥ राजा परिवार नहीं जानता । आज्ञासे पर-चक्र दूर होता । पूर्ण-चंद्र देख उमड़ आता । महा-सागर ॥ ३८ ॥ या चुंबकका सन्निधान । करता लोहेको चेतन । सूर्य-संगसे होते जन । कार्य-प्रवृत्त ॥ ३९ ॥ मुख लगाये बिन । पिल्लोंका है पोषण । करती है अर्जुन । कूर्मी जैसे ॥ १४० ॥ (56) ४४१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग