ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 512, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंइन द्वारोंसे निरंतर । दौड़ता है ज्ञान बाहर । भ्रांत हो जैसा जानवर । हरा चारा देख ॥ १८ ॥ फिर स्वर वर्ण विसर्ग । अथवा स्वीकार औ' त्याग । तथा संक्रमण उत्सर्ग । विण्मूत्रोंका ॥ १९ ॥ कर्मेंद्रियोंके पांच । विषय हैं ये सच । बांध करके माच । चलती क्रिया ॥ १२० ॥ ऐसे दस बसे हैं । देहमें विषय हैं । इच्छा जो कहाती है । कहते अब ॥ २१ ॥ इच्छाका स्वरूप तथा द्वेष— गत भोग जब है स्मरता । या ऐसा शब्द कानपे आता । तो कानपे हाथ रख जाता । न तो वृत्ति-जगती ॥ २२ ॥ विषयेंद्रिय भेंट होती । तभी वह जाग उठती । कामका हाथ धर वृत्ति । उठती जो ॥ २३ ॥ अजी ! उठनेसे यह वृत्ति । मनकी होती तीव्र-गति । जहां नहीं जाना वहां जाती । ललचाकर इन्द्रियां ॥ २४ ॥ जिस प्रवृत्तिके लोभसे । बुद्धि हो पगलाई जैसे । इन्द्रियां लुब्ध हो उससे । वह है इच्छा ॥ २५ ॥ इन्द्रियोंका जो इच्छित विषय । नहीं पाती वे जब धनंजय तब अनुभवती जो इन्द्रिय । वह है द्वेष ॥ २६ ॥ सुख दुःखका स्वरूप— कहता हूं अब सुख । वह ऐसा है तू देख । जिस एकसे अशेष । भूले सब जीव ॥ २७ ॥ अजी ! तन मन वचन । अपनी सौगंधसे जान । देह-स्तुतिको बल-हीन । करते आता ॥ २८ ॥ ज्ञानेश्वरी ४४०