ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतथा-शुक्रशोणित मिलन । देता है पंच-तत्वको चिह्न । एक वायु-तत्व अर्जुन । बनता दस रूप ॥ ६ ॥ फिर यह दस प्रकार । देहका सामर्थ्य लेकर । अपने निज स्थान पर । हुए प्रतिष्ठित ॥ ७ ॥ वहां चांचल्य चपल । रहा जो एक केवल । इससे रजका बल । लिया उसने ॥ ८ ॥ बुद्धिके वह बाहर । अहंताके डर पर । ऐसे मध्य-स्थान पर । दृढ हो बैठा ॥ ९ ॥ व्यर्थ है उसका नाम मन । जो मात्र कल्पना मूर्तिमान । उसके संगसे मिला जान । वस्तुको जीव भाव ॥ ११० ॥ प्रकृतिका है जो मूल । कामको जिसका बल । चेतता है जो प्रबल । अहंकार ॥ ११ ॥ इच्छाको वह बढ़ाता । आशाको वह चढ़ाता । रक्षण नित करता । भयका जो ॥ १२ ॥ द्वैतका जो उगम-स्थान । अविद्या करे बलवान । इन्द्रियोंका करे पतन । विषयोंमें ॥ १३ ॥ संकल्पोंसे है सृष्टि रचता । विकल्पोंसे उसको तोड़ता । मनोरथोंका ढेर चढा था- । उतराता वह ॥ १४ ॥ भ्रांतिका जो भंडार । वायु तत्व्-अंतर । तथा बुद्धिका द्वार । करता बंद ॥ १५ ॥ यह कहलाता मन । अन्य कछु नहीं जान । अब विषयाभिदान । बताता हूं ॥ १६ ॥ विषयोंका स्पष्टीकरण- स्पर्श तथा शब्द । रूप रस गंध । हैं ये पंच-विध । ज्ञानेंद्रियोंके ॥ १७ ॥ ४३९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग