भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 510, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 510

देह-पात पर अर्जुन । देह होती उपाधि-लीन । कृत-कर्ममें अनुदिन । डुबी रहती ॥ ९४ ॥ बीज-रूपमें यह सतत । रहता है वृक्ष समस्त । अथवा पटत्व बन सूत । रहता जैसे ॥ ९५ ॥ वैसे छोड़के स्थूल-धर्म । महा भूतोंके भूत-ग्राम । लय हो रहते हैं सूक्ष्म । जिस स्थानपे ॥ ९६ ॥ उसका नाम अर्जुना । अव्यक्त यह जानना । अब संपूर्ण सुनना । इंद्रिय-भेद ॥ ९७ ॥ इंद्रिय विवेचन --- यहां श्रवण नयन । त्वचा औ' रसना घ्राण । इसको ज्ञानके जान । पांच इंद्रिय ॥ ९८ ॥ मेलेमें इन तत्वोंके । विचार सुख-दुःखके । करती है इंद्रियोंके- । द्वारा बुध्दि ॥ ९९ ॥ फिर वाचा और कर । पाय तथा अधोद्वार । तथा है जनन द्वार । पांच पार्थ ॥ १०० ॥ ये हैं कर्मेंद्रियां जान । कैवल्य-पति श्रीकृष्ण । कहता है तू अर्जुन । सुन ले यह ॥ १ ॥ प्राणोंको जो प्रिया होती । क्रिया-शक्ति कहलाती । तनमें है आती जाती । इन पांचोंसे ॥ २ ॥ ऐसे ये दश-करण । बताये तुझे अर्जुन । कहता हूं अब मन । रहता कैसा ॥ ३ ॥ मनका विवेचन --- इंद्रिय-बुध्दि मध्य पर । रजोगुणका ले आधार । अतीव तरल होकर । रहता पार्थ ॥ ४ ॥ आकाशकी नीलिमा-सा । मृग-जल-तरंग सा । व्यर्थका मिथ्याभास-सा । रहता है वह ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ४३८