ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकृपाकी राह बनाकर । प्रेमसे दिशा भरकर । पद्-तलमें बिछाकर । अपना जीव ॥ ४९ ॥ किस भांति बचाकर चलना । वर्णनमें शब्द नहीं मिलता । तथा जो है अनुपमेय होता । अर्जुन वह ॥ २५० ॥ स-ममता मुहसे उठाती । बिलाडी पिल्लेको ले जाती । पिल्लेको दांत नहीं लगाती । वैसे पार्थ ॥ ५१ ॥ अथवा स्नेहार्द जो माता । राह देखती स-ममता । शिशुकी तब जो मृदुता । होती दृष्टिमैं ॥ ५२ ॥ या कमल-दल हिलाते । उससे जो पवन लेते । तब जैसे हैं सुख पाते । नयन पसार ॥ ५३ ॥ उस मार्दवसे जो पग । पृथ्वीपे रखता अलग । लगनेसे यदि वे स्वर्ग- । सुखसा मिलता ॥ ५४ ॥ ऐसे चलते हुए भी कोमल । कृमि-कीटक देखके दुर्बल । लौटता वहांसे वह निर्मळ । सावकाश ॥ ५५ ॥ मेरे पगका शब्द भी यदि होगा । विश्व-व्यापकका निद्रा-भंग होगा । उसका मुख-रूप कुम्हलायेगा । ऐसे वह सोचता ॥ ५६ ॥ इस कारणसे सदैव । चलता है सावध-भाव । न कुचलता कोई जीव । कभी कहीं ॥ ५७ ॥ देख कर तृणमें भी जीव । न लांघना है उसका भाव । तब देख प्रत्यक्ष जीव । कुचले कैसे ॥ ५८ ॥ चींटा मेरू न लांघ सकता । झींगुर सिंधु नहीं तैरता । वैसा ही वह नहीं लांघता । कभी किसीको ॥ ५९ ॥ ज्ञानी-अहिंसकका बोलना— ऐसी है उसकी रीत । कृपा फलसे है फलित । उसकी वाणीमें जागृत । दया दर्शनीय ॥ २६० ॥ ४५१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग