भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 522

नाम लिया अहिंसाका । दर्शन हुआ मतोंका । अंकुर फूटा स्फूर्तिका । मतिमें यहां ॥ ३७ ॥ तब इसको कैसे छोड़ना । इसलिये पडा है कहना । तुझको भी इसे है जानना । यही भाव ॥ ३८ ॥ जब कभी अहिंसापे कहा जाता । इसी भांति है प्रतिपादन होता । इसीलिये सब कहना पड़ता । न तो अपथ क्यों जावें ? ॥ ३९ ॥ तथा स्व-मतका निर्धार । करनेमें है धनुर्धर । दूसरे मत-मतांतर । जानना अच्छा ॥ २४० ॥ तथा सुन तू यह पार्थ । निरूपणकी यह-रीत । अब कहता मुख्य बात । इसके बाद ॥ ४१ ॥ वास्तविक अहिंसा, श्रीज्ञानदेवका स्वमत -- अब कहूंगा मैं स्वमत । अहिंसाका रूप-लक्षित । उसको जानकर चित्त । प्रकटेगा ज्ञान ॥ ४२ ॥ जिसमें है अहिंसाका अधिष्ठान । प्रकट करेगा उसका वर्तन । जैसे कसौटी करे मूल्य-मापन । स्वर्णका वैसे ॥ ४३ ॥ होता ज्ञान औ' मनका मिलन । होता अहिंसाका बिंब-दर्शन । उसका रूप सुन तू अर्जुन । कहता हू मैं ॥ ४४ ॥ ज्ञानी अहिंसकका चलना - जैसे तरंग न लांघता । पैरसे लहर न तोड़ता । पानकी ध्वनि भी न तोड़ता । अपने पैरसे ॥ ४५ ॥ वेगसे किंतु बचाकर । भक्ष्यपे दृष्टि स्थिर-कर । चलता पैर उठाकर । बक-पक्षी जैसे ॥ ४६ ॥ अथवा कमल पर भ्रमर । रखता है कोमलतासे पैर । कहीं टूटेगा उसका केसर । इसके भयसे ॥ ४७ ॥ जैसे परमाणुमें छिपे हैं । छोटे जीव वह जानता है । दयासे ढकके चलता है । अपने पाव ॥ ४८ ॥ ज्ञानेश्वरी ४५०