ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
कृपाकी राह बनाकर । प्रेमसे दिशा भरकर । पद्-तलमें बिछाकर । अपना जीव ॥ ४९ ॥ किस भांति बचाकर चलना । वर्णनमें शब्द नहीं मिलता । तथा जो है अनुपमेय होता । अर्जुन वह ॥ २५० ॥ स-ममता मुहसे उठाती । बिलाडी पिल्लेको ले जाती । पिल्लेको दांत नहीं लगाती । वैसे पार्थ ॥ ५१ ॥ अथवा स्नेहार्द जो माता । राह देखती स-ममता । शिशुकी तब जो मृदुता । होती दृष्टिमैं ॥ ५२ ॥ या कमल-दल हिलाते । उससे जो पवन लेते । तब जैसे हैं सुख पाते । नयन पसार ॥ ५३ ॥ उस मार्दवसे जो पग । पृथ्वीपे रखता अलग । लगनेसे यदि वे स्वर्ग- । सुखसा मिलता ॥ ५४ ॥ ऐसे चलते हुए भी कोमल । कृमि-कीटक देखके दुर्बल । लौटता वहांसे वह निर्मळ । सावकाश ॥ ५५ ॥ मेरे पगका शब्द भी यदि होगा । विश्व-व्यापकका निद्रा-भंग होगा । उसका मुख-रूप कुम्हलायेगा । ऐसे वह सोचता ॥ ५६ ॥ इस कारणसे सदैव । चलता है सावध-भाव । न कुचलता कोई जीव । कभी कहीं ॥ ५७ ॥ देख कर तृणमें भी जीव । न लांघना है उसका भाव । तब देख प्रत्यक्ष जीव । कुचले कैसे ॥ ५८ ॥ चींटा मेरू न लांघ सकता । झींगुर सिंधु नहीं तैरता । वैसा ही वह नहीं लांघता । कभी किसीको ॥ ५९ ॥ ज्ञानी-अहिंसकका बोलना— ऐसी है उसकी रीत । कृपा फलसे है फलित । उसकी वाणीमें जागृत । दया दर्शनीय ॥ २६० ॥ ४५१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
स्व-शन उसका सु-कुमार । मानो मुख है प्रेमका घर । माधुर्यमें आये हैं अंकुर । ऐसे वे दांत ॥ ६१ ॥ आगे आगे चूता स्नेह-निर्झर । पीछे पीछे चलते हैं अक्षर । तब होता शब्दोंका अवतार । पहले आती कृपा ॥ ६२ ॥ उसका बोलना ही नहीं । बोलना चाहता जो कहीं । तो बोलना किसीको नहीं । चुभेगा कभी ॥ ६३ ॥ बोलनेमें होता क्या अधिक । चुभता क्या कोई बोल एक । होता क्या कोई सुन साशंका । रहता सावधान ॥ ६४ ॥ प्रतिपादित बात टूटेगी । किसीमें भीति उदित होगी । अन्य-बात उपेक्षित होगी । यही मनमें ॥ ६५ ॥ किसीका मन नहीं दुखाना । किसीकी भृकुटी न ऊठना । मनमें ही सोझता रहना । स्वस्थतासे ॥ ६६ ॥ कोई उनसे विनय करता । तब जो वह बोलने लगता । सुननेवाला है अनुभवता । यह है माय-बाप ॥ ६७ ॥ मानो नाद-ब्रह्मने लिया आकार । अथवा है गंगा-जलके तुषार । पतिव्रताका निर्मल मनोहर । वार्धक्य आया ॥ ६८ ॥ वैसा सत्य और कोमल । हित-मित किंतु सरल । मानो बोल होते कल्लोल । अमृतके हैं ॥ ६९ ॥ उपरोध विवाद बल । प्राणि-तापदायक बोल । उपहास शब्दका शूल । तथा मर्म-स्पर्शी ॥ २७० ॥ हठ आवेश कपट छल । आशा शंका प्रतारणा-बोल । ये अवगुण तज सरल । बोलता वह ॥ ७१ ॥ ज्ञानी-अहिंसकका देखना— वैसे ही उसकी पार्थ । होती है दृष्टि सतत । भृकुटिसे होती मुक्त । सर्वत्र ही ॥ ७२ ॥ ज्ञानेश्वरी ४५२
प्राणिमात्र है ब्रह्मका स्थान । उसे होगी दृष्टिकी चुभन । इसीलिये है वह अर्जुन । न देखता कभी ॥ ७३ ॥ कहीं कभी किसी समय । हृदयसे हो कृपामय । खुले नयन सुखमय । तभी देखा ॥ ७४ ॥ चंद्र-बिंबसे स्रवती धार । न होती यदि वह गोचर । किंतु उससे होते चकोर । परिपुष्ट ॥ ७५ ॥ प्राणिमात्रका ऐसा होता । जब किसीको है देखता । ऐसी अवलोकन-प्रथा । न जाने कूर्मी-भी ॥ ७६ ॥ उसकी दृष्टि ऐसी है । सब भूतोंके प्रति है । उसके हाथ कैसे हैं । कहता अब ॥ ७७ ॥ ज्ञानी-अहिंसककी कार्य-प्रणाली-- होकर सदैव कृतार्थ । रहे सिद्धके मनोरथ । वैसे उसके होते हाथ । निष्व्यापार ॥ ७८ ॥ जैसे अंधेने छोड़ा देखना । निरिंधन अग्निका बुझना । अथवा गूंगेका मौन लेना । वैसे उसका ॥ ७९ ॥ इस भांति कुछ कहीं । उसको करना नहीं । आते हैं सब ही वहीं । बैठने हेतु ॥ २८० ॥ लगेगा झटका पवनको । या नख लगेंगे आकाशको । इस भावसे वह हाथको । हिलाता ही नहीं ॥ ८१ ॥ शरीरसे प्राणियोंको हटाना । या आंखोंसे धुर धुरे उड़ाना । या पशु पक्षियोंको देखना । इसी भावसे ॥ ८२ ॥ ऐसी है जिसकी बात । न लेता दंड या बेंत । कैसा लेगा वह पार्थ । हाथमें शस्त्र ॥ ८३ ॥ लीलासे कमलसे खेलना । सुमन-मालाको भी झेलना । उसको भी गोफिया मानना । स्वभाव उसका ॥ ८४ ॥ ४५३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
अपने शरीरके रोम हिलेंगे । इसलिये हाथ न सहलायेंगे । नखोंके लपट लिपट जायेंगे । उंगुलियों पर ॥ ८५ ॥ करनेको है जहां अभाव । बन गया है ऐसा स्वभाव । हाथोंका है तब निज-भाव । जुड़ जाते वे ॥ ८६ ॥ या उठते हैं अभय देने । आर्त दीनकी सेवा करने । गिरनेवालोंको संभालने । कभी कभी ॥ ८७ ॥ यह भी वह बलसे करता । आर्तका भय दुख हरता । उस हस्त-स्पर्शकी शीतलता । न जाने चंद्रमा भी ॥ ८८ ॥ उसका वह स्पर्श पाकर । लगे मलयानिलय कठोर । सहलाता हो प्रेम विभोर । पशुको भी ॥ ८९ ॥ हाथ जो रीता सदा खुला । चंदनांग जैसे निर्मल । न फलनेपे भी निष्फल । कह सकते नहीं ॥ २९० ॥ रहने दो यह वाग्जाल । जाने उसके करतब । जैसे है सज्जनोंका शील । स्वभाव वैसे ॥ ९१ ॥ ज्ञानीके अहिंसक मनका स्वरूप— अब कहूंगा मनका लक्षण । यह कहना भी है विलक्षण । अब तक किया जो निरूपण । किसका विलास ॥ ९२ ॥ शाखा नहीं हैं क्या तरूवर । जल बिन होता क्या सागर । या तेज बिन क्या तेजाकार । संभव है क्या ॥ ९३ ॥ अवयव और शरीर । नहीं क्या एक ही आधार । अथवा रस और नीर । भिन्न है क्या ॥ ९४ ॥ इसीलिये यहां सर्व । कहे हैं जो बाह्य भाव । मन ही वे सावयव । ऐसे जानना ॥ ९५ ॥ जिस बीजका किया रोपन । फैला वही शाखा रूप बन । वैसे इंद्रियोंसे प्रसरण । होता मनका ही ॥ ९६ ॥ ज्ञानेश्वरी ४५४
अजी ! मनमें ही जो नहीं । अहिंसाका नाम भी कहीं । बाहर प्रगटे भी वही । कहो कैसे ॥ ९७ ॥ होती है जिसकी चाह पार्थ । वृत्ति वह मनमें उदित । होती वह फिर प्रकाशित । वाचादि इंद्रियोंसे ॥ ९८ ॥ मनमें जो है ही नहीं । वाचादिसे क्या कभी कहीं । बीज बिन अंकुर कहीं । उगता है क्या ॥ ९९ ॥ उगम ही जहां सूख जाता । प्रवाह कहो कैसे बहता । जीव आने पर भी क्या होता । कहीं उद्योग ॥ ३०० ॥ मनका जब ममत्व टूटता । इंद्रियोंका व्यापार ही मिटता । सूत्रधार बिना नहीं चलता । गुड़ियाका खेल ॥ १ ॥ मन है वैसे पांडव । उसका मूल इंद्रिय भाव । व्यापार करता यही सर्व । इंद्रियों द्वारा ॥ २ ॥ किंतु जो समयके अनुसार । वासना रूप बनके अंदर । कार्य था वह रूपसे बाहर । आता इंद्रियोंसे ॥ ३ ॥ इसीलिये मनमें यथार्थ । होती है अहिंसा विकसित । पक्व सुगंध हो उल्लसित । फैलता वैसे ॥ ४ ॥ इन्द्रियां ही मनकी 'संपदा । बेचती हैं सर्वत्र सर्वदा । और है जो अहिंसाका धंदा । करती रहती हैं ॥ ५ ॥ जब आता समुद्रमें उभार । भरते हैं आखात चहूं ओर । स्व-संपत्तिसे चित्त बार बार । भरता इन्द्रियोंको ॥ ६ ॥ अजी ! जैसे सदा पंडित । बालकका पकड हाथ । अक्षर करता है व्यक्त । अपने आप ॥ ७ ॥ वैसे अपना दयालूपन । हाथ पैरमें लाता है मन । करता फिर वहां उत्पन्न । अहिंसाके ॥ ८ ॥ इससे किया मैंने अर्जुन । इन्द्रियोंका अहिंसा-वर्णन । इससे है मनका दर्शन । होता स्पष्ट ॥ ९ ॥ ४५५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इस भांति तन मन वचन । करता है दंड-त्याग अर्जुन । इसका ही होगा वहां दर्शन । सदा सर्वत्र ॥ ३१० ॥ ऐसा पुरुष है चर । ज्ञानका ही है मंदिर । यह है वह धनुर्धर । स्वयं ज्ञान-मूर्ति ॥ ११ ॥ करते जो अहिंसाका श्रवण । या ग्रंथोंमें होता है निरूपण । करना हो तो उसका दर्शन । इसीमें होगा ॥ १२ ॥ अहिंसा विवेचनमें वाग्विस्तारकी क्षमायाचना कहना था देवका एक वचन । किया मैंने सुविस्तृत विवेचन । इसलिये करता क्षमा-याचन । आपसे मैं ॥ १३ ॥ हराभरा चारा देख जानवर । भूल जाता है लौट आना जो घर । पवन-गतिमें उड़ता अंबर । इससे दूर जाता पंछी ॥ १४ ॥ वैसे है प्रेमकी स्फूर्ति । खिलाती है रस-वृत्ति । बहते जाती है मति । स्वैर भावसे ॥ १५ ॥ वैसे भी नहीं अवधार । स-कारण किया विस्तार । वैसे शब्दके हैं अक्षर । केवल तीन ॥ १६ ॥ अजी ! शब्द है अहिंसा साधारण । उसपे पडा मतोंका आवरण । करनेसे उन मतोंका खंडन । स्पष्ट होता भाव ॥ १७ ॥ वैसे प्राप्त जो मत-मतांतर । उसका निरसन नहीं कर । अपनी भी बात कही दो-चार । न चलेगा वहां ॥ १८ ॥ अजी ! रत्न-पारखियोंके गांवमें । गांठसे गंडकी खोले बेचनेमें । अधुरा भान स्तवन करनेमें । न करें क्या स्तुति शारदाकी ॥ १९ ॥ सुगंध मंद है कर्पूरमें । कहते हैं जिस समाजमें । आटेको कपूर कहनेमें । धैर्य हो कसे ॥ ३२० ॥ इसीलिए सभामें ऐसे । मात्र बातूनी बननेसे । मिले आपका प्रेम कैसे । तभी बोला प्रभु ॥ २१ ॥ ज्ञानेश्वरी ४५६
सामान्य और विशेष एक । मिलाया हुवा जो आप देख । उसको कानसे मुख तक । न ले जायेंगे ॥ २२ ॥ ग्रसता संदेहका खल-मल । जब शुध्द-प्रमेय जो निर्मल । पैरोंकी स्फूर्ति आती उसी पल । पीछे भागनेकी ॥ २३ ॥ अजी ! जल-कुंभीसे । ढके हुए नीरसे । कभी न करे जैसे । क्रीडा हंस ॥ २४ ॥ चांदनी जो बादल पारसे । उसको नहीं देखता जैसे । आंख उठाकर कौतुकसे । चकोर पक्षी कभी ॥ २५ ॥ वैसे आप नहीं लेंगे पास । इस ग्रंथको इच्छासे खास । करेंगे सक्रोध उपहास । सा-शंक निरूपणपे ॥ २६ ॥ न कर संदेह निवारण । किया हो तो मैंने निरूपण । उससे कभी आपका मन । मिलेगा क्या मुझको ? ॥ २७ ॥ तथा मेरा जो यह् संपूर्ण । कहनेका है सब कारण । आपका प्रसाद प्रति-क्षण । सदा सन्मुख हो ॥ २८ ॥ गीतार्थ आपको प्रिय मान । गीताको किया आश्रय-स्थान । तथा मान मैं प्राण-समान । बोलता हूं आपसे ॥ २९ ॥ आप अपना जो सर्वस्व देंगे । अपना स्वत्व यह् छुडालेंगे । ग्रंथ नहीं यह् बंधक मानेंगे । सर्व-भावसे ॥ ३३० ॥ अपने सर्वस्वका लोभ धरेंगे । या बंधकका अनादर करेंगे । गीता तथा मेरी भी आप मानेंगे । एक ही गति ॥ ३१ ॥ चाहता हूं मैं केवल । कृपा आपकी निर्मल । इसीलिये मैं ये बोल । बोलता हूं ॥ ३२ ॥ बैठे हैं आप रसिक जन । आपके योग्य देना व्याख्यान । तभी मतांतरका कथन । किया सब ॥ ३३ ॥ इससे कथा-विस्तार भया । श्लोकार्थसे कुछ दूर गया । सो मैंने क्षमायाचन किया । आपत्य-भावसे ॥ ३४ ॥ ४५७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग (58)
अजी ! कौरमें जब कंकड आता । उसको दूर करना ही पडता । उसे निकालनेमें समय जाता । दूषण है क्या यह ? ॥ ३५ ॥ बालक जब चोरसे बचकर । आता है अपने घर कर देर । माता नहीं बोलती डांट कर । प्रसन्न हो कहती आया ! ॥ ३६ ॥ किंतु यह बात ऐसी नहीं है । आपने सहा जो भला किया है। भगवानने जो आगे कहा है । वह सुनिये अब ॥ ३७ ॥ कहता उन्मेख सुलोचन । सावध हो तू अर्जुन । कहूंगा अब तुझे ज्ञान । परिपूर्ण जो ॥ ३८ ॥ ४ ज्ञानका लक्षण, शांति- बिन आक्रोश जहां । क्षमा होती है कहां । ज्ञान होता है वहां । जान निश्चित ॥ ३९ ॥ गहरे सरोवरमें जैसे । कमलिनी बढती है वैसे । या सुदैवीके घरमें जैसे । बढती संपत्ति ॥ ३४० ॥ उसी भांतिसे हे पार्थ । बढती क्षमा यथार्थ । उसके लक्षण सार्थ । कहते अब ॥ ४१ ॥ जैसे प्रिय-भूषण । करते हैं धारण । वैसे है जो सहन । करता सर्व ॥ ४२ ॥ त्रिविध तापोंका संपूर्ण । हुवा उनपे आक्रमण । तो भी उसका चित्त जान । नहीं होता चंचल ॥ ४३ ॥ अपेक्षित पाके मन । होता है जैसे प्रसन्न । अनपेक्षितका जान । वही आदर ॥ ४४ ॥ मानापमानको जो सहता । सुख दुःखको है समा लेता । निंदा-स्तुतिको भी मानता । एक समान ॥ ४५ ॥ उष्मासे जो न तपता । शीतसे जो न कांपता । न किसीसे है डरता । किसी समय ॥ ४६ ॥ ज्ञानेश्वरी ४५८
अपने शिखरोंका जो भार । नहीं जानता है गिरिवर । भूमिका बोझ वराहावतार । नहीं जानता जैसे ॥ ४७ ॥ अनेक भूतोंके भारसे । पृथ्वी नहीं दबती जैसे । वह भी अनेक द्वंद्वोंसे । दबता नहीं ॥ ४८ ॥ नदी नद अनेक आते । जल-प्रवाह तीव्र लाते । समुद्र उसे समा लेते । अपनेमें जैसे ॥ ४९ ॥ वैसे उसके पास कभी कहीं । न सहना ऐसे कुछ भी नहीं । सहता जो कुछ है सभी कहीं । स्मरण भी न रखता ॥ ३५० ॥ उसको जो कुछ भी मिलता । उसको अपना कर लेता । सहनेका वहां नहीं पता । रहता कहीं ॥ ५१ ॥ यह जो अनाक्रोश क्षमा । जिसके पास प्रियोत्तम । जान तू वह है महिमा । ज्ञानका ही ॥ ५२ ॥ ऐसा पुरुष अर्जुन । ज्ञानका मानो जीवन । अब करें विवेचन । आर्जवका ॥ ५३ ॥ ५ ज्ञानका लक्षण, ऋजुता -- जान तू आर्जव है ऐसे । प्राणका सौजन्य हो जैसे । सबपे यह समान-से । रहता जान ॥ ५४ ॥ जैसे मुख देखकर प्रकाश । नहीं देता जिस भांति चंडांश । विश्वको एकसा ही अवकाश । जैसे देता गगन ॥ ५५ ॥ ऐसे होता इसका मन । सबसे एक ही समान । तथा वैसा होता वर्तन । एकसा ही ॥ ५६ ॥ जगतसे उसका परिचय । निकट का नाता है अतिशय । भाषा नहीं वहां आप-परया । सुननेमें आती ॥ ५७ ॥ मेल मिलाप सबसे । पानीका रहता जैसे । चित्तमें विकल्प ऐसे । रहता नहीं ॥ ५८ ॥ ४५९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
चलता है जैसे पवन । वैसा है उसका मन । संदेह लोभ कभी न । करता वह ॥ ५९ ॥ माताके सम्मुख बालक । आता है जैसे निःशंक । वैसे ही लोगोंके सम्मुख । उसके विचार ॥ ३६० ॥ कमलिनी जैसे ही सु-विकसित । न करती सुगंध संकुचित । वैसे ही नहीं रहता गुपित । अंतःकरण उसका ॥ ६१ ॥ निर्मलता जो रत्नोंकी । रत्नसे भी किरणोंकी । आगे होती है मनकी । तथा है कृति ॥ ६२ ॥ सदा वह संकल्प रहित । रहता आत्मानुभव तृप्त । नहीं लीपता उसका चित्त । तथा तजता नहीं ॥ ६३ ॥ झेंप कभी दृष्टिमें । संदिग्धता वाणीमें । हीन-बुद्धि मनमें । नहीं आती ॥ ६४ ॥ इंद्रियां सभी प्रांजल । निष्प्रपंच औ' निर्मल । पंच-प्राण सर्व-काल । रहते मुक्त ॥ ६५ ॥ जैसे अमृतकी धार । वैसे उसका अंतर । या इन चिन्होंका घर । होता है वह ॥ ६६ ॥ ऐसा पुरुष धनुर्धर । ऋजुताका है अवतार । या ज्ञानने किया घर । उसमें सदैव ॥ ६६ ॥ ६ ज्ञानका लक्षण, आचार्योपासना-गुरुभक्ति— अब मैं इसके अनंतर । कहता गुरु-भक्ति-प्रकार । उनको सुन चित्त देकर । धनंजय तू ॥ ६८ ॥ मानो सभी प्रकारके सुदैव । जन्म देती है यह गुरु-सेवा । तथा पाता शोकाकुल जीव । ब्रह्म-पद परम ॥ ६९ ॥ कहता हूं आचार्योपासना । प्रकट रूपमें मैं अर्जुन । चित्त देकर इसे सुनना । निष्ठा-पूर्वक ॥ ३७० ॥ ज्ञानेश्वरी ४६०
समर्पण भाव- जैसे सकल जल समृद्धि । लेके घुसती गंगा उदधि । या ब्रह्म-पदमें वेद-बुद्धि । करती प्रवेश ॥ ७१ ॥ था लपेटकर संपूर्ण जीवित । सर्वस्व गुण अवगुण सहित । करती है अपने सह अर्पित । पतिव्रता पतिको ॥ ७२ ॥ वैसे ही सर्वस्व अपना । गुरु-कुलको समर्पना । गुरु-भक्ति गृह बनाना । अपनेको ही ॥ ७३ ॥ गुरु-गृह वियोग- जो है गुरु-गृहका देश । उससे भरता मानस । विरहिणीका मानस । प्रियसे जैसे ॥ ७४ ॥ गुरु-गृहसे जो आता पवन । देख उसका करके सम्मान । सनम्र कहता कर नमन । घर पधारिये ॥ ७५ ॥ गुरु-गृहका पागलपन । भाता उस ओरका वचन । अमानत जो रखता प्राण । गुरु-गृहमें ही ॥ ७६ ॥ गुरु-आज्ञाने मानो पकड़ा । देहको गावमें है जकड़ा । पगहासे गोठेमें बछडा । उसी भांति ॥ ७७ ॥ कब यह बंधन हटेगा । गुरुका दर्शन कब होगा । उसको निमिष भी बनेगा । युगसे बडा ॥ ७८ ॥ मानो गुरु-ग्रामसे कोई आया । अथवा गुरुने ही भेज दिया । हतायुको आयुष्य मिल गया । ऐसा होता है ॥ ७९ ॥ या सूकता हुवा अंकुर । पा लेता है जलकी धार । या अल्पोदकसे सागर । आयी मछली ॥ ३८० ॥ या रंकने पाया निधान । या अंधेने पाये नयन । भिक्षुकने पाया महान । इंद्र-पद जैसे ॥ ८१ ॥ नाम सुन ऐसे गुरु-कुलका । महा-सुख बढ़ता उसका । मानो आलिंगन गगनका । लिया जैसे ॥ ८२ ॥ ४६१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
गुरुकुलमें ऐसी जिसकी । ममता देखता तू उसकी । सेवा करता ज्ञान सदाकी । जान तू पार्थ ॥८३॥ गुरुकी मानस पूजा— तथा जो हृदय-मध्यमें । डूबकर गुरु-प्रेममें । लीन होना उपासनामें । गुरुकी नित ॥ ८४ ॥ हृदय-शुद्धिका जो मंदिर । आराध्य जो वहां गुरुबर । सर्व-भावसे हे परिवार । बनता आप ॥ ८५ ॥ अथवा हे ज्ञानका मंदिर । उसमें आनंद पीठपर । ध्यानामृत-स्नान निरंतर । करता गुरु लिंगका ॥ ८६ ॥ उदय होते ही बोधार्क । बुद्धिके अक्षत सात्विक । भरके चढ़ाता त्रंबक- । पर लक्षावधि ॥ ८७ ॥ शुद्ध- त्रिकालमें निरंतर । जीव-दशा धूप जलाकर । जलाके ज्ञानारती कर्पूर । उतारता है ॥ ८८ ॥ सामरस्यका रस-पूर्ण । नैवेद्य कर समर्पण । आप बन पूजा-ब्राह्मण । गुरुको लिंग ॥ ८९ ॥ गुरुकी मधुरा-भक्ति— अथवा जीवकी शैया पर । गुरु-पतिका आश्रय कर । प्रेम-भोग लेता निरंतर । बुद्धिसे जो ॥ ३९० ॥ कभी किसी समयमें ऐसे । अनुराग भरे हृदयसे । गुरु-स्मरण होता है जिसे । कहे क्षीर-सागर ॥ ९१ ॥ जहां ध्येय-ध्यान अति सुख । शेष-शैया पर जो निर्दोष । पहुढा है जो उसको देख । माना है श्री गुरु ॥ ९२ ॥ गुरुकी सेव्य-सेवक तथा वात्सल्य-भक्ति— चरण-सेवामें वहां लीन । लक्ष्मीको अपना रूप मान । गरुड हो करता नमन । आप ही जो ॥ ९३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४६२
नाभीमें स्वयं जन्म लेता । गुरु-प्रेममें जो रमता । ध्यान-सुख अनुभवता । चितमें सदा ॥ ९४ ॥ कभी अपने भाव-बलसे । माता मान श्रीगुरुको जैसे । स्तन-पानके भावोन्मादसे । लेटता गोदमें ॥ ९५ ॥ या देख चैतन्य-तरुकी छाया । बनाके गुरु-कामधेनु गाय । बछडा बन आप पीछे गया । कल्पनामें गुरुके ॥ ९६ ॥ या मान गुरु-कृपा स्नेह-नीर । स्वयं बन उसमें जलचर । करता भक्ति-क्रीडा-विहार । कभी कल्पनासे ॥ ९७ ॥ होती गुरु-कृपा अमृत-वृष्टि । आप होता है सेवा-वृत्तिकी सृष्टि । इस प्रकारके संकल्पमें तुष्टि । पाता रहता वह ॥ ९८ ॥ बनता कुक्षि पक्ष बिन चेंदुवा । अपने मनमें वह है पांडव । उसके अथाह प्रेम-वैभव । इस भांतिके ॥ ९९ ॥ गुरुको पक्षिणी कर । चारा लेता चंचु पर । गुरुका जहाज कर । तरता आप ॥ ४०० ॥ गुरु-चिंतन, प्रसाद-सेवन -- जैसा भरा हुवा पूर्ण सागर । प्रसवता लहरपे लहर । वैसे ही ध्यानसे ध्यान-विचार । उमडते आते ॥ १ ॥ सदैव वह इस भांति । अंतरमें श्री गुरु-मूर्ति । भोगता अब बाह्यावर्ती । कैसे सुन तू ॥ २ ॥ करता मनमें निश्चय एक । करूंगा मैं गुरु-सेवा नेक । जिससे कहे गुरु स-कौतुक । कुछ मांग ले तू ॥ ३ ॥ देख ऐसी सबी उपासना । कहेंगे श्री गुरु हो प्रसन्न । तब करूंगा नम्र प्रार्थना । इस भांति मैं ॥ ४ ॥ कहूंगा श्री गुरुवर । मुझे देना ऐसा वर । बनूं सारा परिवार । मैं ही आपका ॥ ५ ॥ ४६३ क्षेत्र क्षेत्रज्ञयोग
तथा उपयोगी वस्तु आपके । उपकरण सभी यहांके । मेरे ही रूप बने उसके । आपकी कृपासे ॥ ६ ॥ ऐसा म मांगूंगा वर । हां कहेंगे गुरु वर । फिर वह परिवार । बनूंगा मैं ॥ ७ ॥ गुरु-जीवनमें संपूर्ण समरसता— उपकरण जात सकल । बन जाऊंगा मैं ही केवल । शुश्रूशा होगी तब सकल । वैभव-युक्त बन ॥ ८ ॥ गुरुवर माय अनेकोंकी । किंतु कर लूंगा मैं एककी । रज बनके पद-तलकी । उनकी कृपासे ॥ ९ ॥ पगलाऊंगा गुरु-अनुराग । लेंगे वे एक पत्नी-योग । मुझमें गुरु-अनुराग । लेगा क्षेत्र-संन्यास ॥ ४१० ॥ कितना ही बहे समीर । चार दिशाओंके अंदर । वैसे गुरु-कृपा-पंजर । बनूंगा मैं ॥ ११ ॥ अपने गुणोंका कर भूषण । गुरु-सेवा-स्वामिनीके चरण । सजाऊंगा बन मैं आच्छादन । भक्ति-पूर्वक ॥ १२ ॥ गुरु-स्नेहकी होगी वृष्टि । तले मैं पृथ्वी बन तुष्टि । पावुं ऐसी इच्छाकी सृष्टि । करता रहता ॥ १३ ॥ तथा श्रीगुरुका भवन । आप ही मैं सर्वस्व बन । करूंगा दास्य अनु दिन । वहांका सारा ॥ १४ ॥ आने जानेमें दातार । करेंगे देहरी पार । बनूंगा उसका द्वार । तथा द्वार-पाल ॥ १५ ॥ मैं गुरु-पादुका बनूंगा । उनको मैं ही चढ़ाऊंगा । छत्र-चामर भी बनूंगा । बारिबारिसे ॥ १६ ॥ बनूंगा मैं पथ-दर्शक । चंवर-धर हस्तक । औ' हाथमें ले दीपक । चलूंगा मैं ॥ १७ ॥ ज्ञानेश्वरी ४६४
उनकी झारी बनूंगा । कुल्लेका पानी भी दूंगा । कुल्ल-पडगा भी बनूंगा । बनूंगा सर्वस ॥ १८ ॥ बांधूंगा हडप मैं । झेलूंगा थूक भी मैं । करूंगा दासता मैं । स्नानादीकी ॥ १९ ॥ बनूंगा गुरुका आसन । अलंकारिक परिधान । उपचारार्थ मैं चंदन । बन जाऊंगा ॥ ४२० ॥ बनूंगा रसोईदार । वैसे ही मैं उपहार । आरती मैं बनकर । उतारूं श्री गुरुको ॥ २१ ॥ श्री गुरु करेंगे आरोगन । मै ही बनूंगा पंगत-जन । मैं दूंगा भोजनोत्तर पान । आगे बढकर ॥ २२ ॥ उठाऊंगा मैं जूठन । सेज पर बिछावन । तथा चरण-सेवन । करूंगा मैं ही ॥ २३ ॥ आप बनूंगा मैं सिंहासन । करेंगे श्री गुरु आरोहण । तब होगा पूर्णत्व ही जान । सेवा-धर्मका ॥ २४ ॥ तथा श्री गुरूका मन । करेगा किसीका ध्यान । विषय जो विलक्षण । बन जाऊं मैं ॥ २५ ॥ श्रवणांगणमें श्री गुरूके । बनूंगा शब्द लक्षके । स्पर्श होगा जहां अंगांगके । बनूंग मैं वह ॥ २६ ॥ तथा श्रीगुरुके नयन । स्नेह-पूर्ण अवलोकन । करेंगे जो रूप-दर्शन । बनूंगा मैं आप ॥ २७ ॥ उनकी रसनाको जो रुचेगा । सभी वे रस मैं बन जाऊंगा । सुगंध-रूपसे मैं ही करूंगा । घ्राण-सेवा ॥ २८ ॥ ऐसे ब्रह्म-मनोगत । श्रीगुरु-सेवा समस्त । बनकर वस्तु जात । करूंगा मैं ॥ २९ ॥ जब तक रहेगा यह शरीर । तब तक होगी सेवा भी सुंदर । देहांत पर होगा जो चमत्कार । सुनो बुध्दिका ॥ ४३० ॥ ४६५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग (59)
रज कण बनाके मैं तन । एकत्र करुंग उसी स्थान । पड़ेंगे श्री गुरुके चरण । जिस स्थानपे ॥ ३१ ॥ मेरे श्री गुरु स-कौतुक । करेंगे स्पर्श जो उदक । वहां ले जाऊंगा मैं ठीक । प्रवाहमें आप ॥ ३२ ॥ श्री गुरुकी जहां होती आरती । या गुरु-गृहमें जली ज्योति । बनाऊंगा उन दीपोंकी दीप्ति । अपने तेजसे ॥ ३३ ॥ झलते हैं जहां उनपे चंवर । लय करुंग वहां मैं प्राण-सार । पाऊंगा ऐसा मैं सेवाका आधार । श्रीगुरु चरणका ॥ ३४॥ करेंगे जहां जहां भी गुरु वास । वहां लय करूं शून्यमें आकाश । शरीर-गत पंच-तत्व विशेष । ले जाऊं श्री चरणोंमें ॥ ३५॥ जीकर या मरकर सतत । करूं ऐसे श्री गुरु-सेवा-व्रत । नहीं छोडूंगा औरोंको निश्चित । कल्पांतमें भी ॥ ३६ ॥ ऐसा जो धैर्य-संपन्न । सेवा-निरत है मन । होता है सीमा-विहीन । वह अपार ॥ ३७ ॥ रात्र-दिवस न जानता । अल्प बहुत न कहता । गुरु-आज्ञासे है खिलता । अधिकाधिक वह ॥ ३८ ॥ कार्य जो उसके निमित्त । होता गगनसे विस्तृत । करता अकेला समस्त । एक ही समयमें ॥ ३९ ॥ हृदयसे आगे दौड़ता । शरीर काजमें लगता । मनसे ही दौड़ा करता । काम करनेमें ॥ ४४० ॥ कभी कभी किसी काल । सुन श्री गुरुके बोल । करें अपना सकल । न्योच्छावर ॥ ४१ ॥ गुरु-सेवामें जो कृश । गुरु-प्रेममें संतोष । गुरु आज्ञामें निवास । करता आप ॥ ४२ ॥ गुरु-कुलमें जो स्व-कुलीन । गुरु-बंधु सौजन्य-सुजन । गुरु-सेवा व्यसनमें लीन । निरंतर जो ॥ ४३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४६६
गुरु-संप्रदाय है धर्म । वही उसका वर्णाश्रम । गुरु-सेवा ही नित्य-कर्म । उसके लिये ॥ ४४ ॥ गुरु-क्षेत्र गुरु-देवता । गुरु ही माता तथा पिता । इसके बिना न जानता । मार्ग अन्य ॥ ४५ ॥ श्री गुरुका ही है द्वार । उसका सर्वस्व-सार । गुरु-दास सहोदर । मानता प्रेमसे ॥ ४६ ॥ सदैव जिसका वक्त्र । गाता गुरु-नाम-मंत्र । गुरु-वाक्य बिन शास्त्र । न छूता जो ॥ ४७ ॥ श्री गुरुका पादोदक । जैसे भी हो जो उदक । सब तीर्थसे अधिक । मानता वह ॥ ४८ ॥ श्री गुरुका वह जूठन । सहसा पाकर प्रसन्न । होकर समाधि भी लीन । मानता वह ॥ ४९ ॥ गुरु-चरणके जो रज-कण । उडाता ज्यों सहज श्रीचरण । तदर्थ कैवल्य-सुख-दान । करता वह लीलासे ॥ ४५० ॥ अजी ! करना कितना विस्तार । गुरु-भक्तिका नहीं ओर-छोर । लहराया गुरु-भक्ति-सागर । कहा गया इतना ॥ ५१ ॥ जिसे प्रेम है इस भक्तिका । औत्सुक्य भी इस विषयका । रस न आता बिना सेवाका । चित्तमें अन्य ॥ ५२ ॥ तत्व-ज्ञानका वह आधार । ज्ञान लेता उससे आकार । ऐसा वह प्रत्यक्ष ईश्वर । ज्ञान उसका भक्त ॥ ५३ ॥ जान देता वहां साक्षात्कार । प्रत्यक्ष हो ज्ञान मुक्त-द्वार । विश्वमें वह अपरंपार । होता इस भांति ॥ ५४ ॥ गुरु-सेवामें मेरा आदर । अंतःकरणमें भर-पूर । इसलिये किया है विस्तार । इस विषयका ॥ ५५ ॥ वैसे मैं लूला हूं हाथोंसे । अंधा हूं भजन-ध्यानसे । लंगडा हूं गुरु-शुश्रूषासे । ऐसा मंद बुद्धि ॥ ५६ ॥ ४६७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
गुरु गुण-गानेमें मै हूं मूक । आलसी ऐसा उदर पोषक । मनमें गुरु-अनुराग नेक । रहा सदैव ॥ ५७ ॥ यही है एक कारण । यह शरीर पोषण । करना पड़ा रक्षण । कहता ज्ञानदेव ॥ ५८ ॥ करके यह विस्तार सहन । दिया सेवा अवसरका दान । अब करूंगा सार्थ कथन । केवल-मात्र ॥ ५९ ॥ अजी ! सुनो सुनो श्रीकृष्ण । वह भूत-भार-सहिष्णु । कहता है वह श्रीविष्णु । सुनता पार्थ ॥ ४६० ॥ ६ ज्ञानका लक्षण, पावित्र्य— अजी ! शुचित्व जो है ऐसा। जिसके पास दीखे ऐसा। तन मन बना हो जैसा । कर्पूरसे ही ॥ ६१॥ अथवा रत्नका है अंकुर । जैसे स्वच्छ अंदर बाहर । वैसे ही प्रकाशता भास्कर । अंतरबाह्य ॥ ६२ ॥ कर्मसे शरीर निर्मल । ज्ञानसे हृदय उज्ज्वल । अंतर्बाह्य ऐसा सोज्वल । परिशुद्ध ॥ ६३ ॥ मृत्तिका और जल । होता बाहर मेल । निर्मल होते बोल । वेदके जैसे ॥ ६४ ॥ चाहे जब बुद्धिका बल । करता दर्पण उज्ज्वल । सोंदणी करता उज्वल । कपडेका दाग ॥ ६५ ॥ इस भांति उसका शरीर । कर्मसे हुआ शुद्ध बाहर । तथा ज्ञान-दीप है अंतर । तभी परिशुद्ध ॥ ६६ ॥ वैसे सुन तू पांडु-सुता । अंदर जो शुद्ध न होता । बाहर जो कर्म करता । वह है उपहास ॥ ६७ ॥ जैसा लाश पर लादा आभूषण । या गर्दभको डाला प्रयाग-स्नान । कडुवी तुंबी पर मधु-लेपन । किया वैसे ॥ ६८ ॥ या उजाड-घरमें बंधनवार । अन्न लगाया भूखोंके पेट पर । अथवा बिंदी लगायी माथे पर । विधवाने जैसे ॥ ६९ ॥ ज्ञानेश्वरी ४६८
कलश चढाया कत्थीका पोला । ऊपर चमकता सोना-सा पीला । वैसे क्या कामका है चित्रका फल । अंदर है गोबर ॥ ४७० ॥ वैसे है कर्म बाहरका । हीन-वस्तु नहीं मोलका । गंगामें धोनेसे मलका । घडा न होता शुद्ध ॥ ७१ ॥ अजी ! अंतर होता ज्ञानसे उज्ज्वल । तभी बाहर होता है कर्म निर्मल । किंतु कहां होता ज्ञान-कर्मका मेल । ऐसे संभव ॥ ७२ ॥ इसीलिये बाह्य-भाग । धोया कर्मसे सर्वांग । ज्ञानसे मिटाया जंग । अंतरंगका ॥ ७३ ॥ इससे अंतर बाह्य गया । एक निर्मलत्व ही भया । अथवा मात्र रह गया । शुचित्व ही ॥ ७४ ॥ सद्-भाव जो जीवगत । बाहर होता है प्रकटित । स्फटिक सदनमें स्थित । दीपक जैसे ॥ ७५ ॥ जिससे विकल्प उपजते । व्यर्थके विकार भी उठते । कु-प्रवृत्ति-बीजमें फूटते । अंकुर अनेक ॥ ७६ ॥ बात ऐसी सुन या देखता । चितपे तरंग न उठता । जैसे आकाश नहीं मलता । बादलोंसे ॥ ७७ ॥ वैसे इंद्रियां भोग-लिप्त । विषय-रत हो सतत । किंतु विकार नहीं स्फूर्ते । होते वहां ॥ ७८ ॥ किसी पथ पर किसी दिन । हो भली बुरी स्त्रीका दर्शन । नहीं होते विकार उत्पन्न । उसी भांति ॥ ७९ ॥ या पति-पुत्रसे आलिंगन । करे एक ही तरुणांगना । पुत्र-भावमें वहां स्फुरण । होता नहीं कामका ॥ ४८० ॥ जिसका हृदय है वैसे निर्मल । संकल्प-विकल्प ज्ञानमें कुशल । कृत्य-अकृत्य जानता जो सकल । सभी प्रकारके ॥ ८१ ॥ पानीमें जैसे हीरा नहीं भीगता । उबालनेसे कंकड नहीं गलता । वैसे जिसका चित्त नहीं लीपर्ता । विकल्पसे कभी ॥ ८२ ॥ ४६९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इसका नाम शुचिता । सार्थ है जान तू पार्थ । जहां देखो वहां बसता । निःशंक-ज्ञान ॥ ८३ ॥ ८ ज्ञानका लक्षण, स्थैर्य— तथा स्थैर्य जहां बसता । चित्तका घर बना लेता । वह पुरुष जान पार्थ । जीवन ज्ञानका ॥ ८४ ॥ लदा देह कार्य-रत । चलता अपना पथ । किंतु होता स्थिर-चित्त । अंतरंगमें ॥ ८५ ॥ बछडे परसे गायकी जैसे । न आती ममता वनमें वैसे । सती जानेमें पतिके भोगसे । प्रिय नहीं होते ॥ ८६ ॥ अथवा लोभी जाता है दूर । चित्त रहता गांठ ही पर । वैसे चलनेसे भी शरीर । चित्तसे वे अचल ॥ ८७ ॥ चलते रहते हैं बादल । रहता है आकाश निश्चल । भ्रमण-चक्रमें अचल । ध्रुव है जैसे ॥ ८८ ॥ पथिकोंका होता आवागमन । साथ पथ न चलता अर्जुन । वृक्ष भी नहीं छोडते स्वस्थान । वैसे जान तू ॥ ८९ ॥ वैसे ही चलन-वलनात्मक । शरीर है यह पंच भौतिक । पंच-भूतोर्मियोंमें वह एक । रहता है स्थिर ॥ ४९० ॥ जैसे बवंडरका कल्लोल । पृथ्वीको न करते चंचल । वैसे उपद्रवोंके उबाल । उसको डिगाते नहीं ॥ ९१ ॥ दैन्य-दुःखमें जो नहीं तपता । भय-शोकमें जो नहीं कांपता । शरीरके नाशमें नहीं ढलता । भयसे कभी ॥ ९२ ॥ आशा-आसक्तिके भारसे । वार्धक्य-व्याधिके विशेष भयसे । आगे औ' पीछे लगे रहनेसे । रहता जो निश्चल ॥ ९३ ॥ निंदा या तेजोवधसे अपमानित । काम-लोभादिकसे भी जो आच्छादित । किंतु अंतरंगमें रहता है शांत । रोम भी हिलता नहीं ॥ ९४ ॥ ज्ञानेश्वरी ४७०