ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुरु गुण-गानेमें मै हूं मूक । आलसी ऐसा उदर पोषक । मनमें गुरु-अनुराग नेक । रहा सदैव ॥ ५७ ॥ यही है एक कारण । यह शरीर पोषण । करना पड़ा रक्षण । कहता ज्ञानदेव ॥ ५८ ॥ करके यह विस्तार सहन । दिया सेवा अवसरका दान । अब करूंगा सार्थ कथन । केवल-मात्र ॥ ५९ ॥ अजी ! सुनो सुनो श्रीकृष्ण । वह भूत-भार-सहिष्णु । कहता है वह श्रीविष्णु । सुनता पार्थ ॥ ४६० ॥ ६ ज्ञानका लक्षण, पावित्र्य— अजी ! शुचित्व जो है ऐसा। जिसके पास दीखे ऐसा। तन मन बना हो जैसा । कर्पूरसे ही ॥ ६१॥ अथवा रत्नका है अंकुर । जैसे स्वच्छ अंदर बाहर । वैसे ही प्रकाशता भास्कर । अंतरबाह्य ॥ ६२ ॥ कर्मसे शरीर निर्मल । ज्ञानसे हृदय उज्ज्वल । अंतर्बाह्य ऐसा सोज्वल । परिशुद्ध ॥ ६३ ॥ मृत्तिका और जल । होता बाहर मेल । निर्मल होते बोल । वेदके जैसे ॥ ६४ ॥ चाहे जब बुद्धिका बल । करता दर्पण उज्ज्वल । सोंदणी करता उज्वल । कपडेका दाग ॥ ६५ ॥ इस भांति उसका शरीर । कर्मसे हुआ शुद्ध बाहर । तथा ज्ञान-दीप है अंतर । तभी परिशुद्ध ॥ ६६ ॥ वैसे सुन तू पांडु-सुता । अंदर जो शुद्ध न होता । बाहर जो कर्म करता । वह है उपहास ॥ ६७ ॥ जैसा लाश पर लादा आभूषण । या गर्दभको डाला प्रयाग-स्नान । कडुवी तुंबी पर मधु-लेपन । किया वैसे ॥ ६८ ॥ या उजाड-घरमें बंधनवार । अन्न लगाया भूखोंके पेट पर । अथवा बिंदी लगायी माथे पर । विधवाने जैसे ॥ ६९ ॥ ज्ञानेश्वरी ४६८