ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुरु-संप्रदाय है धर्म । वही उसका वर्णाश्रम । गुरु-सेवा ही नित्य-कर्म । उसके लिये ॥ ४४ ॥ गुरु-क्षेत्र गुरु-देवता । गुरु ही माता तथा पिता । इसके बिना न जानता । मार्ग अन्य ॥ ४५ ॥ श्री गुरुका ही है द्वार । उसका सर्वस्व-सार । गुरु-दास सहोदर । मानता प्रेमसे ॥ ४६ ॥ सदैव जिसका वक्त्र । गाता गुरु-नाम-मंत्र । गुरु-वाक्य बिन शास्त्र । न छूता जो ॥ ४७ ॥ श्री गुरुका पादोदक । जैसे भी हो जो उदक । सब तीर्थसे अधिक । मानता वह ॥ ४८ ॥ श्री गुरुका वह जूठन । सहसा पाकर प्रसन्न । होकर समाधि भी लीन । मानता वह ॥ ४९ ॥ गुरु-चरणके जो रज-कण । उडाता ज्यों सहज श्रीचरण । तदर्थ कैवल्य-सुख-दान । करता वह लीलासे ॥ ४५० ॥ अजी ! करना कितना विस्तार । गुरु-भक्तिका नहीं ओर-छोर । लहराया गुरु-भक्ति-सागर । कहा गया इतना ॥ ५१ ॥ जिसे प्रेम है इस भक्तिका । औत्सुक्य भी इस विषयका । रस न आता बिना सेवाका । चित्तमें अन्य ॥ ५२ ॥ तत्व-ज्ञानका वह आधार । ज्ञान लेता उससे आकार । ऐसा वह प्रत्यक्ष ईश्वर । ज्ञान उसका भक्त ॥ ५३ ॥ जान देता वहां साक्षात्कार । प्रत्यक्ष हो ज्ञान मुक्त-द्वार । विश्वमें वह अपरंपार । होता इस भांति ॥ ५४ ॥ गुरु-सेवामें मेरा आदर । अंतःकरणमें भर-पूर । इसलिये किया है विस्तार । इस विषयका ॥ ५५ ॥ वैसे मैं लूला हूं हाथोंसे । अंधा हूं भजन-ध्यानसे । लंगडा हूं गुरु-शुश्रूषासे । ऐसा मंद बुद्धि ॥ ५६ ॥ ४६७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग