ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरज कण बनाके मैं तन । एकत्र करुंग उसी स्थान । पड़ेंगे श्री गुरुके चरण । जिस स्थानपे ॥ ३१ ॥ मेरे श्री गुरु स-कौतुक । करेंगे स्पर्श जो उदक । वहां ले जाऊंगा मैं ठीक । प्रवाहमें आप ॥ ३२ ॥ श्री गुरुकी जहां होती आरती । या गुरु-गृहमें जली ज्योति । बनाऊंगा उन दीपोंकी दीप्ति । अपने तेजसे ॥ ३३ ॥ झलते हैं जहां उनपे चंवर । लय करुंग वहां मैं प्राण-सार । पाऊंगा ऐसा मैं सेवाका आधार । श्रीगुरु चरणका ॥ ३४॥ करेंगे जहां जहां भी गुरु वास । वहां लय करूं शून्यमें आकाश । शरीर-गत पंच-तत्व विशेष । ले जाऊं श्री चरणोंमें ॥ ३५॥ जीकर या मरकर सतत । करूं ऐसे श्री गुरु-सेवा-व्रत । नहीं छोडूंगा औरोंको निश्चित । कल्पांतमें भी ॥ ३६ ॥ ऐसा जो धैर्य-संपन्न । सेवा-निरत है मन । होता है सीमा-विहीन । वह अपार ॥ ३७ ॥ रात्र-दिवस न जानता । अल्प बहुत न कहता । गुरु-आज्ञासे है खिलता । अधिकाधिक वह ॥ ३८ ॥ कार्य जो उसके निमित्त । होता गगनसे विस्तृत । करता अकेला समस्त । एक ही समयमें ॥ ३९ ॥ हृदयसे आगे दौड़ता । शरीर काजमें लगता । मनसे ही दौड़ा करता । काम करनेमें ॥ ४४० ॥ कभी कभी किसी काल । सुन श्री गुरुके बोल । करें अपना सकल । न्योच्छावर ॥ ४१ ॥ गुरु-सेवामें जो कृश । गुरु-प्रेममें संतोष । गुरु आज्ञामें निवास । करता आप ॥ ४२ ॥ गुरु-कुलमें जो स्व-कुलीन । गुरु-बंधु सौजन्य-सुजन । गुरु-सेवा व्यसनमें लीन । निरंतर जो ॥ ४३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४६६