भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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उनकी झारी बनूंगा । कुल्लेका पानी भी दूंगा । कुल्ल-पडगा भी बनूंगा । बनूंगा सर्वस ॥ १८ ॥ बांधूंगा हडप मैं । झेलूंगा थूक भी मैं । करूंगा दासता मैं । स्नानादीकी ॥ १९ ॥ बनूंगा गुरुका आसन । अलंकारिक परिधान । उपचारार्थ मैं चंदन । बन जाऊंगा ॥ ४२० ॥ बनूंगा रसोईदार । वैसे ही मैं उपहार । आरती मैं बनकर । उतारूं श्री गुरुको ॥ २१ ॥ श्री गुरु करेंगे आरोगन । मै ही बनूंगा पंगत-जन । मैं दूंगा भोजनोत्तर पान । आगे बढकर ॥ २२ ॥ उठाऊंगा मैं जूठन । सेज पर बिछावन । तथा चरण-सेवन । करूंगा मैं ही ॥ २३ ॥ आप बनूंगा मैं सिंहासन । करेंगे श्री गुरु आरोहण । तब होगा पूर्णत्व ही जान । सेवा-धर्मका ॥ २४ ॥ तथा श्री गुरूका मन । करेगा किसीका ध्यान । विषय जो विलक्षण । बन जाऊं मैं ॥ २५ ॥ श्रवणांगणमें श्री गुरूके । बनूंगा शब्द लक्षके । स्पर्श होगा जहां अंगांगके । बनूंग मैं वह ॥ २६ ॥ तथा श्रीगुरुके नयन । स्नेह-पूर्ण अवलोकन । करेंगे जो रूप-दर्शन । बनूंगा मैं आप ॥ २७ ॥ उनकी रसनाको जो रुचेगा । सभी वे रस मैं बन जाऊंगा । सुगंध-रूपसे मैं ही करूंगा । घ्राण-सेवा ॥ २८ ॥ ऐसे ब्रह्म-मनोगत । श्रीगुरु-सेवा समस्त । बनकर वस्तु जात । करूंगा मैं ॥ २९ ॥ जब तक रहेगा यह शरीर । तब तक होगी सेवा भी सुंदर । देहांत पर होगा जो चमत्कार । सुनो बुध्दिका ॥ ४३० ॥ ४६५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग (59)

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