ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतथा उपयोगी वस्तु आपके । उपकरण सभी यहांके । मेरे ही रूप बने उसके । आपकी कृपासे ॥ ६ ॥ ऐसा म मांगूंगा वर । हां कहेंगे गुरु वर । फिर वह परिवार । बनूंगा मैं ॥ ७ ॥ गुरु-जीवनमें संपूर्ण समरसता— उपकरण जात सकल । बन जाऊंगा मैं ही केवल । शुश्रूशा होगी तब सकल । वैभव-युक्त बन ॥ ८ ॥ गुरुवर माय अनेकोंकी । किंतु कर लूंगा मैं एककी । रज बनके पद-तलकी । उनकी कृपासे ॥ ९ ॥ पगलाऊंगा गुरु-अनुराग । लेंगे वे एक पत्नी-योग । मुझमें गुरु-अनुराग । लेगा क्षेत्र-संन्यास ॥ ४१० ॥ कितना ही बहे समीर । चार दिशाओंके अंदर । वैसे गुरु-कृपा-पंजर । बनूंगा मैं ॥ ११ ॥ अपने गुणोंका कर भूषण । गुरु-सेवा-स्वामिनीके चरण । सजाऊंगा बन मैं आच्छादन । भक्ति-पूर्वक ॥ १२ ॥ गुरु-स्नेहकी होगी वृष्टि । तले मैं पृथ्वी बन तुष्टि । पावुं ऐसी इच्छाकी सृष्टि । करता रहता ॥ १३ ॥ तथा श्रीगुरुका भवन । आप ही मैं सर्वस्व बन । करूंगा दास्य अनु दिन । वहांका सारा ॥ १४ ॥ आने जानेमें दातार । करेंगे देहरी पार । बनूंगा उसका द्वार । तथा द्वार-पाल ॥ १५ ॥ मैं गुरु-पादुका बनूंगा । उनको मैं ही चढ़ाऊंगा । छत्र-चामर भी बनूंगा । बारिबारिसे ॥ १६ ॥ बनूंगा मैं पथ-दर्शक । चंवर-धर हस्तक । औ' हाथमें ले दीपक । चलूंगा मैं ॥ १७ ॥ ज्ञानेश्वरी ४६४