भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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नाभीमें स्वयं जन्म लेता । गुरु-प्रेममें जो रमता । ध्यान-सुख अनुभवता । चितमें सदा ॥ ९४ ॥ कभी अपने भाव-बलसे । माता मान श्रीगुरुको जैसे । स्तन-पानके भावोन्मादसे । लेटता गोदमें ॥ ९५ ॥ या देख चैतन्य-तरुकी छाया । बनाके गुरु-कामधेनु गाय । बछडा बन आप पीछे गया । कल्पनामें गुरुके ॥ ९६ ॥ या मान गुरु-कृपा स्नेह-नीर । स्वयं बन उसमें जलचर । करता भक्ति-क्रीडा-विहार । कभी कल्पनासे ॥ ९७ ॥ होती गुरु-कृपा अमृत-वृष्टि । आप होता है सेवा-वृत्तिकी सृष्टि । इस प्रकारके संकल्पमें तुष्टि । पाता रहता वह ॥ ९८ ॥ बनता कुक्षि पक्ष बिन चेंदुवा । अपने मनमें वह है पांडव । उसके अथाह प्रेम-वैभव । इस भांतिके ॥ ९९ ॥ गुरुको पक्षिणी कर । चारा लेता चंचु पर । गुरुका जहाज कर । तरता आप ॥ ४०० ॥ गुरु-चिंतन, प्रसाद-सेवन -- जैसा भरा हुवा पूर्ण सागर । प्रसवता लहरपे लहर । वैसे ही ध्यानसे ध्यान-विचार । उमडते आते ॥ १ ॥ सदैव वह इस भांति । अंतरमें श्री गुरु-मूर्ति । भोगता अब बाह्यावर्ती । कैसे सुन तू ॥ २ ॥ करता मनमें निश्चय एक । करूंगा मैं गुरु-सेवा नेक । जिससे कहे गुरु स-कौतुक । कुछ मांग ले तू ॥ ३ ॥ देख ऐसी सबी उपासना । कहेंगे श्री गुरु हो प्रसन्न । तब करूंगा नम्र प्रार्थना । इस भांति मैं ॥ ४ ॥ कहूंगा श्री गुरुवर । मुझे देना ऐसा वर । बनूं सारा परिवार । मैं ही आपका ॥ ५ ॥ ४६३ क्षेत्र क्षेत्रज्ञयोग