भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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कलश चढाया कत्थीका पोला । ऊपर चमकता सोना-सा पीला । वैसे क्या कामका है चित्रका फल । अंदर है गोबर ॥ ४७० ॥ वैसे है कर्म बाहरका । हीन-वस्तु नहीं मोलका । गंगामें धोनेसे मलका । घडा न होता शुद्ध ॥ ७१ ॥ अजी ! अंतर होता ज्ञानसे उज्ज्वल । तभी बाहर होता है कर्म निर्मल । किंतु कहां होता ज्ञान-कर्मका मेल । ऐसे संभव ॥ ७२ ॥ इसीलिये बाह्य-भाग । धोया कर्मसे सर्वांग । ज्ञानसे मिटाया जंग । अंतरंगका ॥ ७३ ॥ इससे अंतर बाह्य गया । एक निर्मलत्व ही भया । अथवा मात्र रह गया । शुचित्व ही ॥ ७४ ॥ सद्-भाव जो जीवगत । बाहर होता है प्रकटित । स्फटिक सदनमें स्थित । दीपक जैसे ॥ ७५ ॥ जिससे विकल्प उपजते । व्यर्थके विकार भी उठते । कु-प्रवृत्ति-बीजमें फूटते । अंकुर अनेक ॥ ७६ ॥ बात ऐसी सुन या देखता । चितपे तरंग न उठता । जैसे आकाश नहीं मलता । बादलोंसे ॥ ७७ ॥ वैसे इंद्रियां भोग-लिप्त । विषय-रत हो सतत । किंतु विकार नहीं स्फूर्ते । होते वहां ॥ ७८ ॥ किसी पथ पर किसी दिन । हो भली बुरी स्त्रीका दर्शन । नहीं होते विकार उत्पन्न । उसी भांति ॥ ७९ ॥ या पति-पुत्रसे आलिंगन । करे एक ही तरुणांगना । पुत्र-भावमें वहां स्फुरण । होता नहीं कामका ॥ ४८० ॥ जिसका हृदय है वैसे निर्मल । संकल्प-विकल्प ज्ञानमें कुशल । कृत्य-अकृत्य जानता जो सकल । सभी प्रकारके ॥ ८१ ॥ पानीमें जैसे हीरा नहीं भीगता । उबालनेसे कंकड नहीं गलता । वैसे जिसका चित्त नहीं लीपर्ता । विकल्पसे कभी ॥ ८२ ॥ ४६९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

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