भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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इसका नाम शुचिता । सार्थ है जान तू पार्थ । जहां देखो वहां बसता । निःशंक-ज्ञान ॥ ८३ ॥ ८ ज्ञानका लक्षण, स्थैर्य— तथा स्थैर्य जहां बसता । चित्तका घर बना लेता । वह पुरुष जान पार्थ । जीवन ज्ञानका ॥ ८४ ॥ लदा देह कार्य-रत । चलता अपना पथ । किंतु होता स्थिर-चित्त । अंतरंगमें ॥ ८५ ॥ बछडे परसे गायकी जैसे । न आती ममता वनमें वैसे । सती जानेमें पतिके भोगसे । प्रिय नहीं होते ॥ ८६ ॥ अथवा लोभी जाता है दूर । चित्त रहता गांठ ही पर । वैसे चलनेसे भी शरीर । चित्तसे वे अचल ॥ ८७ ॥ चलते रहते हैं बादल । रहता है आकाश निश्चल । भ्रमण-चक्रमें अचल । ध्रुव है जैसे ॥ ८८ ॥ पथिकोंका होता आवागमन । साथ पथ न चलता अर्जुन । वृक्ष भी नहीं छोडते स्वस्थान । वैसे जान तू ॥ ८९ ॥ वैसे ही चलन-वलनात्मक । शरीर है यह पंच भौतिक । पंच-भूतोर्मियोंमें वह एक । रहता है स्थिर ॥ ४९० ॥ जैसे बवंडरका कल्लोल । पृथ्वीको न करते चंचल । वैसे उपद्रवोंके उबाल । उसको डिगाते नहीं ॥ ९१ ॥ दैन्य-दुःखमें जो नहीं तपता । भय-शोकमें जो नहीं कांपता । शरीरके नाशमें नहीं ढलता । भयसे कभी ॥ ९२ ॥ आशा-आसक्तिके भारसे । वार्धक्य-व्याधिके विशेष भयसे । आगे औ' पीछे लगे रहनेसे । रहता जो निश्चल ॥ ९३ ॥ निंदा या तेजोवधसे अपमानित । काम-लोभादिकसे भी जो आच्छादित । किंतु अंतरंगमें रहता है शांत । रोम भी हिलता नहीं ॥ ९४ ॥ ज्ञानेश्वरी ४७०