ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआकाश भी है यदि टूटता । भूमिका मध्य-बिंदु ढलता । तो भी परावृत्त नहीं होता । चित्तसे वह ॥ ९५ ॥ हाथी पे किया फूलसे प्रहार । उसको नहीं लगता है मार । वैसे तीखे दुर्वचन प्रहार । उसको न करें अशांत ॥ ९६ ॥ जैसे क्षीरार्णव-कल्लोल । न कंपाता मंदराचल । या प्रचंड अग्निका ज्वाल । नहीं जलाता आकाश ॥ ९७ ॥ आती जाती है मानो लहर । किंतु चित्त न होता अस्थिर । क्षमा-धैर्यका वह आधार । कल्पांतमें भी ॥ ९८ ॥ स्थैर्यकी यह परि-भाषा । कही है मैंने सविशेष । देख यह लक्षण-दशा । अति स्पष्ट ॥ ९९ ॥ पराक्रम-पूर्ण यह स्थिरता । अपनेमें जो अंतर्बाह्य पाता । ज्ञानका सागर ही बनता । अपने आप ॥ ५०० ॥ ९ ज्ञानका लक्षण, इंद्रिय-निग्रह— सांप जैसे शत्रु का घर । सैनिक अपना हत्यार । लोभी अपना भंडार । नहीं भूलते ॥ १ ॥ अथवा इकलौता बालक । माताका सर्वस होता नेक । मधुपे जैसे मधु-मक्षिका । लोभिन होती ॥ २ ॥ इस भांति जो अर्जुन । करता स्वचित्त जतन । उन्हे न देता कभी स्थान । इन्द्रिय-द्वारमें ॥ ३ ॥ कहुता काम-भकाऊ सुनेगी । या आशाकी चुडैल देखेगी । अंतःकरणकी स्थिति जानेगी । इससे डरता हूं ॥ ४ ॥ बाहरकी ढीलको जैसे । साहसी पुरुष भी वैसे । मुट्ठीमें ही रखता वैसे । अपनी वृत्तिको ॥ ५ ॥ रखता है संयममें नित । अंतरको रखके सचेत । रखता तनको नियमित । आजीवन ॥ ६ ॥ ४७१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग