ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 544, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंमनके महाद्वार पर । प्रत्याहारके थाने पर । यम-दमके चौकीदार । बिठाता सदैव ॥ ७॥ आधार-नाभि-कंठमें । बंध-त्रयके घरमें । चन्द्र-सूर्य संपुटमें । सुलाता नित ॥ ८ ॥ समाधि-शैयाके पास पार्थ । लांघ रखता ध्यान सतत । तथा चित्त-चैतन्यमें रत । रखता उमगसे ॥ ९ ॥ यह जो चित्तकी स्थिति है । कहाता चित्त-निग्रह है । यही सदैव विजय है । ज्ञानका ही ॥ ५१० ॥ जिसकी आज्ञा सदैव अर्जुन । झेलता रहता अंतःकरण। उसको मनुष्याकारमें जान । आज्ञा-स्वयं ॥ ११ ॥ इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च । जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८ ॥ १० ज्ञानका लक्षण, वैराग्य— विषयोंके विषयमें । सदा वैराग्य मनमें । भर आता उमंगमें । जिसके है ॥ १२ ॥ वमन किया हुवा अन्न । न चाहता रसना-मन । न होती इच्छा-अलिंगन । करने की प्रेतसे ॥ १३ ॥ जैसे विष भोजन नहीं भाता । जलते घरमें न जाया जाता । व्याघ्र-गव्हहरमें नहीं करता । वसति-स्थान ॥ १४ ॥ तप्त लोह-रसमें जैसे । कूदा नहीं जाता है वैसे । तकिया न करता जैसे । अजगरका कोई ॥ १५ ॥ इस भांति जिसको अर्जुन । विषय-वार्ता न भाती जान । इन्द्रिय-सुखमें विषयान्न । नहीं जाने देता ॥ १६ ॥ चित्तमें निरहंकार विषयोंमें विरक्तता । जन्म-मृत्यु-जरा रोग दुःख दोष विवेचना ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ४७२