ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचलता है जैसे पवन । वैसा है उसका मन । संदेह लोभ कभी न । करता वह ॥ ५९ ॥ माताके सम्मुख बालक । आता है जैसे निःशंक । वैसे ही लोगोंके सम्मुख । उसके विचार ॥ ३६० ॥ कमलिनी जैसे ही सु-विकसित । न करती सुगंध संकुचित । वैसे ही नहीं रहता गुपित । अंतःकरण उसका ॥ ६१ ॥ निर्मलता जो रत्नोंकी । रत्नसे भी किरणोंकी । आगे होती है मनकी । तथा है कृति ॥ ६२ ॥ सदा वह संकल्प रहित । रहता आत्मानुभव तृप्त । नहीं लीपता उसका चित्त । तथा तजता नहीं ॥ ६३ ॥ झेंप कभी दृष्टिमें । संदिग्धता वाणीमें । हीन-बुद्धि मनमें । नहीं आती ॥ ६४ ॥ इंद्रियां सभी प्रांजल । निष्प्रपंच औ' निर्मल । पंच-प्राण सर्व-काल । रहते मुक्त ॥ ६५ ॥ जैसे अमृतकी धार । वैसे उसका अंतर । या इन चिन्होंका घर । होता है वह ॥ ६६ ॥ ऐसा पुरुष धनुर्धर । ऋजुताका है अवतार । या ज्ञानने किया घर । उसमें सदैव ॥ ६६ ॥ ६ ज्ञानका लक्षण, आचार्योपासना-गुरुभक्ति— अब मैं इसके अनंतर । कहता गुरु-भक्ति-प्रकार । उनको सुन चित्त देकर । धनंजय तू ॥ ६८ ॥ मानो सभी प्रकारके सुदैव । जन्म देती है यह गुरु-सेवा । तथा पाता शोकाकुल जीव । ब्रह्म-पद परम ॥ ६९ ॥ कहता हूं आचार्योपासना । प्रकट रूपमें मैं अर्जुन । चित्त देकर इसे सुनना । निष्ठा-पूर्वक ॥ ३७० ॥ ज्ञानेश्वरी ४६०