ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपने शिखरोंका जो भार । नहीं जानता है गिरिवर । भूमिका बोझ वराहावतार । नहीं जानता जैसे ॥ ४७ ॥ अनेक भूतोंके भारसे । पृथ्वी नहीं दबती जैसे । वह भी अनेक द्वंद्वोंसे । दबता नहीं ॥ ४८ ॥ नदी नद अनेक आते । जल-प्रवाह तीव्र लाते । समुद्र उसे समा लेते । अपनेमें जैसे ॥ ४९ ॥ वैसे उसके पास कभी कहीं । न सहना ऐसे कुछ भी नहीं । सहता जो कुछ है सभी कहीं । स्मरण भी न रखता ॥ ३५० ॥ उसको जो कुछ भी मिलता । उसको अपना कर लेता । सहनेका वहां नहीं पता । रहता कहीं ॥ ५१ ॥ यह जो अनाक्रोश क्षमा । जिसके पास प्रियोत्तम । जान तू वह है महिमा । ज्ञानका ही ॥ ५२ ॥ ऐसा पुरुष अर्जुन । ज्ञानका मानो जीवन । अब करें विवेचन । आर्जवका ॥ ५३ ॥ ५ ज्ञानका लक्षण, ऋजुता -- जान तू आर्जव है ऐसे । प्राणका सौजन्य हो जैसे । सबपे यह समान-से । रहता जान ॥ ५४ ॥ जैसे मुख देखकर प्रकाश । नहीं देता जिस भांति चंडांश । विश्वको एकसा ही अवकाश । जैसे देता गगन ॥ ५५ ॥ ऐसे होता इसका मन । सबसे एक ही समान । तथा वैसा होता वर्तन । एकसा ही ॥ ५६ ॥ जगतसे उसका परिचय । निकट का नाता है अतिशय । भाषा नहीं वहां आप-परया । सुननेमें आती ॥ ५७ ॥ मेल मिलाप सबसे । पानीका रहता जैसे । चित्तमें विकल्प ऐसे । रहता नहीं ॥ ५८ ॥ ४५९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग