भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 524, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 524

स्व-शन उसका सु-कुमार । मानो मुख है प्रेमका घर । माधुर्यमें आये हैं अंकुर । ऐसे वे दांत ॥ ६१ ॥ आगे आगे चूता स्नेह-निर्झर । पीछे पीछे चलते हैं अक्षर । तब होता शब्दोंका अवतार । पहले आती कृपा ॥ ६२ ॥ उसका बोलना ही नहीं । बोलना चाहता जो कहीं । तो बोलना किसीको नहीं । चुभेगा कभी ॥ ६३ ॥ बोलनेमें होता क्या अधिक । चुभता क्या कोई बोल एक । होता क्या कोई सुन साशंका । रहता सावधान ॥ ६४ ॥ प्रतिपादित बात टूटेगी । किसीमें भीति उदित होगी । अन्य-बात उपेक्षित होगी । यही मनमें ॥ ६५ ॥ किसीका मन नहीं दुखाना । किसीकी भृकुटी न ऊठना । मनमें ही सोझता रहना । स्वस्थतासे ॥ ६६ ॥ कोई उनसे विनय करता । तब जो वह बोलने लगता । सुननेवाला है अनुभवता । यह है माय-बाप ॥ ६७ ॥ मानो नाद-ब्रह्मने लिया आकार । अथवा है गंगा-जलके तुषार । पतिव्रताका निर्मल मनोहर । वार्धक्य आया ॥ ६८ ॥ वैसा सत्य और कोमल । हित-मित किंतु सरल । मानो बोल होते कल्लोल । अमृतके हैं ॥ ६९ ॥ उपरोध विवाद बल । प्राणि-तापदायक बोल । उपहास शब्दका शूल । तथा मर्म-स्पर्शी ॥ २७० ॥ हठ आवेश कपट छल । आशा शंका प्रतारणा-बोल । ये अवगुण तज सरल । बोलता वह ॥ ७१ ॥ ज्ञानी-अहिंसकका देखना— वैसे ही उसकी पार्थ । होती है दृष्टि सतत । भृकुटिसे होती मुक्त । सर्वत्र ही ॥ ७२ ॥ ज्ञानेश्वरी ४५२