ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
अध्याय १: अर्जुनविषादयोग
बंबईके बडे न्यायालयमें १९३८ को वह स्थान ज्ञानेश्वर भक्तोंके हाथमें आया । न्यायालयके इस विषयक निर्णयमें न्यायमूर्तिने स्पष्ट रूपसे मान्य किया है “ज्ञानेश्वरने पैठणसे आलंदी आते समय नेवासाके शिवमंदिरमें ज्ञानेश्वरी कही और वह नेवासा गांवका कुलकर्णी सच्चिदानंद बाबाने लिखी ऐसा इतिहास कहता है !” और ज्ञानेश्वरीमें इसका उल्लेख है ।
९ ज्ञानेश्वरी-
संत ज्ञानेश्वर और उनके विषयमें कई वादोंका विचार करनेके बाद ज्ञानेश्वरीके विष- यमें भी कुछ लिखना आवश्यक है और ज्ञानेश्वर विषयक वादोंका संबंध अनुवादकके कार्यसे कुछ भी नहीं आ सकता किंतु.ज्ञानेश्वरी विषयक वादका अनुवादकके कार्यसे संबंध आता है । ज्ञानेश्वरी महाराष्ट्रका प्रसिद्धतम ग्रन्थ है । इस ग्रन्थके विषयमें सामान्यतया मराठी भाषा भाषी प्रत्येक मनुष्यके हृदयमें एक अभिमान और आदर भाव है, और महाराष्ट्रमें “सच्ची ज्ञानेश्वरी कौनसी ?” इस विषयमें आजकल विद्वानोंमें अत्यंत मतभेद है । महाराष्ट्रमें स्थान स्थानपर अब तक ज्ञानेश्वरीकी ३२ हस्त लिखित प्राचीन पांडुलिपियां प्राप्त हुई हैं । इनमें सबसे प्राचीन पांडुलिपि संभवतः शा. श. १५५१ की लिखी हुई है और अंतिम प्रति शा. श. १७८२ की है । इनमेंसे चार प्रतियां ज्ञानेश्वर महाराजके भक्त मंडलके मठोंमेंसे प्राप्त हैं । तथा १२ देशके भिन्न भिन्न अनुसंधान संस्थानोंसे मिली हैं । अन्य व्यक्तिगत संग्रहकी है । इन ३२ ग्रन्थोंमें कमसे कम ओवियां ८९३२ हैं और अधिकसे अधिक ९५३५ हैं । स्थान स्थानपर अनेक पाठभेद हैं । गीताके श्लोकोंके साथ ओवियोंका अर्थ मेल न खासके इतना ओवियोंके स्थानांतर भी हुए हैं। इन सब पांडुलिपियोंको देख कर इनका संशोधन कर एक ग्रन्थ तैयार करना है । किंतु इसमें वादका विषय दूसरा ही है और वह कुछ हदतक भावात्मक है । इसके लिये. ज्ञानेश्वरीकी अध्ययन परंपराका इतिहास देखना आवश्यक-सा है । ज्ञानेश्वर महाराजने शा. श. १२१२ में-इ. स. १२९०-अपने ज्ञानेश्वरीप्रवचन समाप्त किये और कुछ वर्षोंमें महाराष्ट्र पर उत्तरसे मुस्लीम आक्रमण हुवा । इस आक्रमणकी तीव्रता ई. स. के १६ वे सदीमें कुछ कम हुई और ज्ञानेश्वरी ग्रंथकी ओर सामूहिक दृष्टिसे महाराष्ट्रका ध्यान गया । उस समय तक स्थान स्थान पर व्यक्तिगत रूपमें ज्ञानेश्वरीका पाठ आदि होता हीं होगा । संत नाम- देवके अनेक अभंगोंपर ज्ञानेश्वरीका प्रत्यक्ष प्रभाव दीखता है । कहीं कहीं तो ज्ञानेश्वरीके शब्दोंमें नामदेवने अपने अभंग गाये हैं । ई. स. १३५० तक नामदेवने इस तरह ज्ञानेश्वरीका प्रचार किया है और उन्होंने उत्तरमें भारतभर सर्वत्र भ्रमण किया है । उसके बादके साहित्यपर ज्ञानेश्वरीका ऐसा कोई प्रभाव नहीं दीखता । नामदेव ज्ञानेश्वरके करीब दो सौ वर्षके बाद, महाराष्ट्रमें और एक महान संत-पुरुषका जन्म हुवा और वे हैं संत एकनाथ महाराज । संत एकनाथ विद्वान थे । संस्कृतका भी अच्छा खास अध्ययन था । श्रीजनार्दन स्वामीके शिष्य। श्रीजनार्दन स्वामी विद्वान और अधिकार संपन्न श्रीगुरु । महाराष्ट्रमें यह श्रद्धा है कि स्वयं दत्तात्रेयसे उन्हे अकर्तात्मक बोधका रहस्य प्राप्त हुवा था और इन्ही श्री जनार्दनस्वामीके श्रीमुखसे एकनाथ महाराजने ज्ञानेश्वरी सुनी है । एकनाथ महाराज छ वर्षतक श्रीजनार्दन स्वामीके श्रीचरणोंमें रहकर आत्मबोध प्राप्त करनेके बाद वहांसे घर आये । ज्ञानेश्वर महाराजकी भांति एकनाथ महाराजका जीवन भी महाराष्ट्रको परम पावन है । एकनाथ महाराजके भागवतपर ज्ञानेश्वरीका अत्यधिक प्रभाव है । एकनाथ महाराजके साहित्यिक कार्यको ही देखा जाय तो उन्हे मराठी भाषाका व्यास कहा जा सकता है । उनकी करीब १ लाख ओवियां हैं ! उसके अलावा अभंग और भारूड
ज्ञानेश्वरी १६
ज्ञानेश्वर महाराजकी समाधिके करीब तीन सौ सालके बाद एक दिन एकनाथ महाराजको स्वप्न हुवा । स्वप्नमें ज्ञानेश्वर महाराजने कहा “ अजान वृक्षकी जड मेरे गलेमें जा रही है। मुझे बडा कष्ट हो रहा है ! तू आकर वह जड निकाल । ” एकनाथ महाराज, साथ कुछ लोगोंको लेकर आलंदी गये । उस समय समाधिस्थान पर जंगल बढ गया था । इस स्वप्नके बाद एकनाथ महाराजने वह जंगल काटकर उसको साफ कराया । ज्ञानेश्वर महाराजकी समाधिका वह पत्थर खोला जो श्री गुरु निवृत्तिनाथने लगाया था । वे समाधिमें गये । अजान वृक्षकी जो जड ज्ञानेश्वर महाराजकी गलेमें लग रही थी वह निकाली । उसी समय ज्ञानेश्वर महाराजने एकनाथ महाराजको ज्ञानेश्वरीकी प्रति तैयार करनेका आदेश दिया और एकनाथ महाराजने उस समय उपलब्ध अनेक प्रतियोंकी सहायतासे ज्ञानेश्वरीकी शुद्ध प्रति तैयार की । ” महाराष्ट्रके भावुक ज्ञानेश्वर भक्तोंमें यह घटना आदरसे कही सुनी जाती है। साथ ही साथ ज्ञानेश्वरीका वही पाठ अबतक प्रचलित रहा है जो यह माना जाता है कि ज्ञानेश्वर महाराजके आदेशसे एकनाथ महाराजने संशोधन करके प्रचलित किया था । इस घटनाके कई सौ वर्षके बाद महाराष्ट्रके प्रसिद्ध इतिहास संशोधक श्री. राजवाडेको बीडमें ज्ञानेश्वरीकी एक प्रति मिली । उन्होंने अपनी ऐतिहासिक दृष्टिसे विवेचन विश्लेषण करके “ एकनाथ पूर्वकालीन भाषा होने से ” तथा “अन्य कई वैज्ञानिक कारणोंसे ” यही ज्ञानेश्वरीकी असली प्रति होनेका निर्णय करके उसको प्रकाशित किया । इस पुस्तककी प्रस्तावनामें इतिहासाचार्य श्री. राजवाडेने “ वह शा. श. १२१२-१२४० के मध्य लिखी गयी थी” ऐसा लिखा है। इसके बाद कई विद्वानोंने इसीको “ असली ज्ञानेश्वरी ” मानना और कहना प्रारंभ किया और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिसे ज्ञानेश्वरीका विचार होना प्रारंभ हुवा । परिणाम स्वरूप ज्ञानेश्वरीके विषयमें कई वाद निर्माण हुए । इसमें ज्ञानेश्वरकालीन भाषा तथा एकनाथ कालीन भाषाका भी एक प्रश्न था । इससे, प्राप्त पांडुलिपियोंका दो खंडोंमें विभाजन हुवा । एकनाथ पूर्वकालीन ज्ञानेश्वरीकी प्रतियां और एकनाथोत्तर ज्ञानेश्वरीकी प्रतियां । इन सब बातोंमें यहां यह बात ध्यानमें रखना अत्यंत आवश्यक है कि “सुदैवसे श्रीसच्चिदानंद बाबाकी लिखी हुई अथवा तत्समकालीन ज्ञानेश्वरीकी प्रति अब तक नहीं मिली, वैसे ही प्रत्यक्ष एकनाथ महाराजने अपने हाथसे लिखी हुई ज्ञानेश्वरीकी शुद्ध प्रति भी उपलब्ध नहीं है” वह नष्ट होते समय, उससे पहले, उसकी जो नकल बनाकर रखी गयीथी वही आज उपलब्ध है। ऐसे समय संभव है कि नकल करते समय बुद्धिदोष, दृष्टिदोष तथा हस्तदोषसे कुछ गलतियां रह गयी हों अथवा पाठभेद हुवा हो । आगे चलकर ज्ञानेश्वर भक्तोंने परंपरासे पैठणके श्रीएकनाथ महाराजके मठमें जाकर उनके घरमें बैठकर कुछ प्रतियां बना लीं; इससे आज उपलब्ध प्रतियोंमें कुछ प्रतियां श्रीएकनाथ महाराजकी प्रतिसे मिलती जुल्ती हैं तो कुछ इतिहासाचार्य राजवाडेजीकी प्रतिसे मिलती जुल्ती हैं। ई.स.१९०८-९ में राजवाडे प्रतिका प्रकाशन हुवा अर्थात् उसके बाद ही यह वाद चल पडा । अनेक विद्वानोंने “ वही प्रति सच्ची ज्ञानेश्वरी मान कर ” उसमें जो छंद नहीं हैं वे सब “ प्रक्षिप्त हैं ” ऐसे कहना प्रारंभ किया भले ही वे छंद मूल विषय और तत्त्वज्ञानका सुंदर विवेचन करते हों ! और परंपरागत-सांप्रदायिक ! -विचारवंतोंने राजवाडे प्रतिमें जो विसंगतियां या असंगतियां हैं उनका स्पष्टीकरण कर दिखाया ! और वाद बढता गया । आग्रहपूर्वक, तर्कशुद्ध या तर्क-कर्कश शब्दोंका पिरामिड रचा गया और सत्य उसके नीचे दब गया । एक प्रकारसे “ राजवाडे प्रति विद्वन्मान्य ज्ञानेश्वरी " हो गयी । विद्वानोने सच्ची ज्ञानेश्वरीके प्रकाशन के लिये सरकारके पास दौड लगायी । १७ ज्ञानेश्वर (३) १०७४
मं. सरकारने उसके लिये एक “ज्ञानेश्वरी संशोधन मंडल” बनाया । उस मंडलमें सभी महाराष्ट्रके वयोवृद्ध प्रकांड पंडित ही हैं । उन्होंने इतिहासाचार्य राजवाडे प्रतिसे मिलती जुलती पांच प्रतियोंका विचार करके, प्रयत्नपूर्वक और निष्ठापूर्वक उन सबका संशोधन करके सरकार मान्य एवं विद्वन्मान्य ज्ञानेश्वरीका प्रकाशन किया । १० अनुवादकका अंतर्द्वन्द्व- ज्ञानेश्वरी विषयक यह वाद और इतिहास देखनेके बाद प्रस्तुत अनुवादकके सम्मुख एक प्रश्न था अनुवादके लिये कौनसी ज्ञानेश्वरी चुने ? अनुवादकने खूब सोचा, कुछ बुजुर्ग गुरुजनोंसे भी बात की और "विद्वन्मान्य ज्ञानेश्वरी" और "लोकमान्य ज्ञानेश्वरी" दोनोंका अध्ययन किया । अंतमें " केवल विद्वानोंके विरोधसे बचनेके लिये" अनुवादके लिये विद्वन्मान्य ज्ञानेश्वरी चुनी ! उसके ४-५ अध्यायोंका अनुवाद हुवा और इसी बीच ऐसे ही एक विद्वानसे मिलनेका मौका आया । ज्ञानेश्वरीके अनुवादके विषयमें चर्चा चली तो मैंने कहा-सरकारी ज्ञानेश्वरी ली है।” मेरा वह उत्तर सुनकर वे कुछ झल्लाये । मूल राजवाडेकी प्रति क्यों नहीं ली ? वही असली ज्ञानेश्वरी है । यदि शिवाजी महाराजने अपने हस्ताक्षरमें "शि" दीर्घ लिखा हो तो किसी विद्वानको वह ह्रस्व करनेका क्या अधिकार है !! अर्थात् शिवाजी महाराजका हस्ताक्षर जितना प्रामाणिक उतना ही राजवाडे ज्ञानेश्वरी प्रति प्रामाणिक ! यह उक्त विद्वान सज्जनका तर्क था । साथ साथ उस प्रकांड विद्वन्महाशयका यह भी एक तर्क था कि सरकार द्वारा संघटित उस मंडलमें महाराष्ट्रके सभी विद्वान नहीं थे। उस कमेटीके बाहर कोई गेलेलियो भी हो सकता है ? वस्तुतः गेलेलियो कभी किसी कमेटीका मेंबर तो नहीं बना अर्थात् जिस किसीको किसी कमेटी पर जानेका भाग्य ही नहीं मिला हो तो उसे अपने आपको गेलेलियो मान लेनेका अधिकार मिलही गया और अनुवादक भी कभी किसी कमेटीका सदस्य नहीं बना और आगे भी ऐसी कोई संभावना नहीं है । तब वह अपने आपको क्यों गेलेलियो न मान लें ? अस्तु; इन सब बातोंमें मुझे उक्त सज्जनसे और एक जानकारी मिली । फ्रान्ससे एक विद्वान सज्जन डॉ. द लेरे सात वर्षसे पूनामें रह कर मराठी भाषा सीख करके ज्ञानेश्वरीका फ्रेंच भाषामें अनुवाद कर रहे हैं । इसी उद्देश्यसे वे फ्रांससे पूना आये हैं। यह सब कहनेकें बाद मुझे उक्त सज्जनने बडे त्वेषके साथ कहा " डॉ. द लेरे ने भी श्री. दांडेकरकी प्रति ली है ! जो आता है वह दांडेकरकी प्रति लेता है या सरकारी प्रति लेता है ! जब राजवाडेकी सच्ची ज्ञानेश्वरी मिली है तब किसीको दूसरी ज्ञानेश्वरी लेनेका क्या अधिकार है ?" यह सब सुनकर मैं घर आया। पच्चीस रुपये देकर 'श्री. दांडेकर प्रति' खरीद ली । श्री. शं. वा. दांडेकरजी स्वयं सरकार द्वारा नियुक्त ज्ञानेश्वर संशोधन मंडलके अध्यक्ष हैं किंतु उन्होंने अपनी ओरसे श्री. एकनाथ महाराज द्वारा संपादित प्रति आवश्यक संपादन तथा गद्यानुवाद करके प्रका- शित की है । उसकी प्रस्तावनामें लिखा है “ ज्ञानेश्वरी संशोधनकार पैठणके श्री. एकनाथ महाराजकी समाधिके तीस वर्ष बाद ही उनके घरमें बैठकर उतारी गयी प्रति मिली थी । उसके आधारपर उसकी नकल करके तैयार की गयी प्रति श्री वेंकट स्वामीने - श्री. दांडेकरजीके गुरु बंधु-प्रकाशित की थी उसीको यहां जैसेके वैसे - अक्षर छापनेकी पुरानी पद्धति छोड़कर प्रकाशित किया गया है !" इस ज्ञानेश्वरीकी कीमत २५ रुपये अब ३० रुपये और सरकारी ज्ञानेश्वरी कोई आवृत्ति पांच या कोइ आवृत्ति आठ रूपयोंमें मिलती है फिर भी श्री दांडेकरकी ज्ञानेश्वरी १९५६ से १९६९ तक ज्ञानेश्वरी १८
करीब तीस हजार बिक गयी हैं। वैसे ही अन्य कुछ ज्ञानेश्वरी प्रतियां जो इसी एकनाथ महाराजकी संशोधित आवृत्तियां हैं हजारोंकी संख्यामे बिक रही हैं यद्यपि सरकारी ज्ञानेश्वरीसे उसकी कीमत दूनी तो है ही श्रीएकनाथ महाराज स्वयं विद्वान होनेके साथ महान संत भी थे। इसके अतिरिक्त श्रीएकनाथ महाराजने अपने श्रीगुरु जनार्दनस्वामीसे भी ज्ञानेश्वरी सुनी थी । तथा श्रीएकनाथ महाराजके बाद संत तुकाराम और समर्थ रामदासने भी वही ज्ञानेश्वरी पढी और उससे स्फूर्ति ली। आधुनिक युगमें भी श्री साखरे बुवा, श्री. विष्णुबुवा जोग, श्री. बंकट स्वामी, तथा सरकारी ज्ञानेश्वरी संशोधन मंडलके अध्यक्ष श्री दांडेकर जैसे विद्वान भी श्री. एकनाथ द्वारा संशोधित आवृत्ति पढते रहे, महाराष्ट्रके ज्ञानेश्वरभक्त, जो लाखों हैं श्रद्धा भक्तिसे उसीका नित्यपाठ करते हैं। एकनाथ कालसे आज तक, साढेचार सौ वर्षसे अधिक काल तक महाराष्ट्रके लाखों सहृदय भक्तजनोंने उसीका पाठ किया, उसीको कंठ किया, उससे स्फूर्ति ली, उससे प्रेरणा ली, उसीको अपने जीवनका आधार बनाया, उसी ज्ञानेश्वरीको माउली मानकर उपासना की, उससे तुष्ट और पुष्ट हुए, उसको मैं महाराष्ट्रका प्राति- निधिक ग्रंथ मानूं या चार (गेलेलियो) विद्वानोंके मान्य ग्रंथको ? जिनके पीछे कोई परंपरा नहीं, साधना नहीं, उपासना नहीं, यदि कुछ है तो आग्रह, तीखा, कर्कश, असंगत और विसंगत तर्क, अभिनिवेश, और एक प्रकारसे अनुभूतिशून्य शाब्दिक कसरत ! श्री. राजवाडे प्रति ही सच्ची ज्ञानेश्वरी है कहनेवाले विद्वानकी और एक बातने मुझे और अधिक अंतर्मुख किया; “जो कोई आता है सांप्रदायिक ज्ञानेश्वरी देखता है, इस नयी सच्ची ज्ञानेश्वरीका विचार ही नहीं करता !” इसी समय उन विद्वान महाशयने कहा था “फ्रांससे डॉ. द. लेरे आये हैं ! उन्होने सांप्रदायिक ज्ञानेश्वरी ली !” मैं सोचने लगा डॉ. द. लेरे साहबने “सांप्रदायिक” ज्ञानेश्वरी क्यों ली होगी ? इसीके उत्तरमें मुझे ऊपरके विचार सूझे । और ! “सांप्रदायिक” है क्या ? आजकल, कुछ शब्द अर्थ-शून्य-से हो गये हैं । “सांप्र- दायिक” यह शब्द एक गाली-सी बन गया है। ज्ञानेश्वरी जैसे महान ग्रंथके विषयमें भी सांप्रदायिक ग्रंथ और अ-सांप्रदायिक ग्रंथ । उसके अर्थके विषयमें भी सांप्रदायिक-अर्थ और अ-सांप्रदायिक अर्थ ! धर्म, राजनीति, तत्वज्ञान, भाषा, साहित्य आदि विषयमें भी “मैं प्राचीन कुछ नहीं मानता” कहने- वाला तथाकथित, प्रगति-प्रिय बुद्धिजीवियोंका एक “अ-सांप्रदायिक संप्रदाय” बन गया है जो सदैव पूर्वपरंपरासे कटकर अपने आपको अधांतरमें लटकनेवाले जड कटे वृक्षकी भांति लटकता हुवा किसी अज्ञात दिशामें प्रगति कर रहा है। यदि किसी प्रतिभा-संपन्न बुद्धिमान व्यक्तिके लिये किसी बातका नया अर्थ करना हो, समाजको नयी दृष्टि देनी हो, समाजको नया विचार और आचार देना हो, तो उसको अपनी पूर्व-परंपराका पूर्ण ज्ञान होना आवश्यक है। किसी भी तत्वज्ञान विषयक ग्रंथकी, उसके किसी विषयकी, “नयी व्याख्या” करनेसे प्रथम उसके पूर्वाचार्योने उस विषयक शब्दोंसे क्या क्या संकेत लिये हैं इसकी पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है। साथ साथ लेखकने कहां कहां किस अर्थमें किस शब्दका प्रयोग किया है यह भी जानना आवश्यक है। बिना इसके, केवल कोश और व्याकरण देख कर किया गया नया ! अर्थ अनर्थ कर सकता है। अर्थात जब तक किसीको किसी शब्द तथा उसके विचारकी पूर्व परंपराका यह पूर्ण ज्ञान नहीं है उसका किया हुवा नया- अर्थ अथवा दी हुयी नयी दृष्टि “अज्ञान वितरण समारोह ही” है, इसलिये निष्ठा पूर्वक अपनी पूर्व परंपराका पालन करना जन सामान्यका युग-धर्म है। असामान्य गेलेलियोंकी बात दूसरी है ! उनको कभी कहीं देखनेकी आवश्कता नहीं है। जो कुछ उनके प्रथम हो चुका है वह सब सांप्रदायिक है। असांप्रदायिका सब कुछ अपनेसे ही प्रारंभ होता है जैसे अंधेके लिये विश्वमें वह अकेलाही है ! ! अनुवादक इस श्रेणीका प्रतिभा संपन्न व्यक्ति हैही नहीं अथवा उसे अपने आपको अधांतरमें लटकनेवाले जड कटे वृक्षकी भांति बना लेनेका धैर्य है। वह प्रगति करना चाहता है १९ ज्ञानेश्वरी
किंतु सही दिशा जानकर और दिशा जाननेके बाद भी, उस दिशामें कौन कौन गयें यह देख कर, उनसे राह पूछ कर ही किसी रास्ते पर आगे बढ़ना चहता है। इसलिये अनुवादकने “केवल विद्वानोंके विरोधसे बचनेके “भय” से अथवा अज्ञात भावसे अपना नाम असंप्रदायिक आधुनिक विद्वानोंमें लिखानेके “लोभसे” अनुवादके लिये जो “सरकार मान्य और विद्वन्मान्य” ज्ञानेश्वरी चुननेकी गलती की थी उसको सुधारा ! १५०-२०० पृष्ठोंके भाषांतरको गंगार्पण करके श्रीएकनाथ महाराज द्वारा संशोधित सांप्रदायिक ज्ञानेश्वरी लेकर पुनः “ॐ नमोजी आद्य” से श्रीगणेश किया। साथ ही साथ अनुवाद करते समय जहां कहीं अर्थके लिये संदर्भ देखना पडा वहां श्रीसाखरे महाराज तथा श्री शं. वा. दांडेकरजी द्वारा संपादित श्रीबंकट स्वामीकी ज्ञानेश्वरीको ही प्रमाण माना है ! वैसे तो अनुवाद करते समय अनुवादकके सामने श्री साखरे महाराज, श्री शं. वा. दांडेकर तथा श्री भिडेकी सार्थ ज्ञानेश्वरी रही है। किंतु अर्थ निर्णय करते समय अनुवादकने न तो स्व-बुद्धिको प्राधान्य दिया न श्रीभिडेके अर्थको किंतु श्री साखरे महाराज अथवा श्री दांडेकरजीके किये गये तथाकथित सांप्रदायिक अर्थकोही प्राधान्य दिया है ! अस्तु; इतना स्पष्ट लिखनेके बाद ज्ञानेश्वरीके वादके विषयमें कुछ लिखना नहीं रहता तथा ज्ञानेश्वरी ग्रंथके विषयमें भी। क्यों कि वह पाठकके हाथमें दिया जा रहा है। ज्ञानेश्वरी मराठीका सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ माना जाता है। इस ग्रंथमें क्या क्या विषय हैं यह इस ग्रंथकी, अलग अलग प्रकारसे की गयी दो विषय-सूचियोंको देखनेसे पता चलेगा। मूलमें विषय सूची नहीं है। हिंदी अनुवाद छपते छपते यह नयी कल्पना सूझी और विषय सूची बनाई गयी। यह जो प्रयास हुवा है वह परंपरा- गत नहीं, हिंदी अनुवादमेंही पहली बार हुवा है। साथ साथ जो कुछ हुवा वह भी शीघ्रता या उता- वलेपनमें हुवा है। परिणामस्वरूप कुछ अटपटा भी लग सकता है। किंतु गहरे अध्येताओंके लिये जो अलग विषय विवेचन है वह अधिक चुस्त है। वह आचार्य श्री शं. वा. दांडेकरजीका बनाया हुवा है। उसमें कुछ परिवर्तन कर दिया गया है। सामान्य वाचकके लिये पहली विषय सूची सहायक होगी तो गहरे अध्ययनके लिये दूसरा विषय विवेचन मार्ग-दर्शक होगा । ११ अनुवादकके विषयमें कुछ- ज्ञानेश्वरी रामकथा या कृष्णकथा नहीं किंतु वेदांत-काव्य है। विषयकी गहनताके साथ मूलकी भाषा अत्यंत प्राचीन है। आज इस भाषाका रूप प्रचलित नहीं है। महाराष्ट्रका सामान्य सुशिक्षित नागरिक भी मूल ज्ञानेश्वरीको भली भांति नहीं समझ पाता। विद्वानोंके लिये भी वह भारी पडता है। ऐसी स्थितिमें एक कन्नड भाषाभाषी द्वारा प्राचीन मराठी वेदांत ग्रंथका हिंदी भाषामें किया गया अनुवाद, वह भी समवृत्तमें, एक प्रकारसे “अव्यापारेषु व्यापार” है। उछलते कूदते, भूतके बंगलेमें घुसनेके बाद, विच्छू कटे बंदरकी शराबके नशेमें की हुई मर्कट चेष्टा-सी ! किंतु केवल प्रेममें ऐसी मूर्खता करनेका साहस होता है। हिंदी भारतकी राष्ट्र-भाषा है। राष्ट्रके साथ जो प्रेम है, आदर या भक्ति है, वही राष्ट्र भाषासे होना स्वाभाविक है। हिंदीको राष्ट्र भाषा मान कर इ. स. १९३५ में हिंदी सीखने के लिये काशी गया। वहांसे लौट कर हिंदी प्रचारका कुछ काम किया। गांधीजीकी वानरसेनाका सैनिक बनकर जो कुछ हम लोगोंने उछल कूद की, इससे, या अन्य कारणोंसे, विदेशी शासनके स्थान पर स्वदेशी शासन आया। स्थिति बदली। स्वदेशी शासनमें जन-समान्यकी हिंदी भाषा वैधानिकरूपसे राज-भाषा बनकर भी केवल वैधानिक भाषा ही रही। हमारा दृष्टिकोण वैज्ञानिक और विशाल होता गया। उस विशालतामें भारत है या नहीं अथवा कहां है यह ढूँढनेपर भी पता नहीं चलता। ऐसी स्थितिमें भारतकी आनेवाली पीढी, लोक-भाषा हिंदीके ज्ञानेश्वरी २७ -
गवाक्षमेंसे वेदसे वर्तमानतक, आसेतु हिमाचलका, मंगलमय पावन दर्शन कर सके इस उद्देश्यसे यह सब काम चल रहा है । प्रस्तुत अनुवादकको इसमें जरा भी संदेह नहीं कि उसमें यह योग्यता नहीं है । इस महान कार्य करनेके लिये वह योग्य नहीं । उसकी इस अयोग्यताका उसको पूर्ण ज्ञान और भान है । किंतु जो योग्य हैं उनको, उनकी योग्यताके अनुसार अन्य बडी बडी बातें करनी हैं । बडे बडे काम हैं। साथ साथ यह काम भी करनाही है । इसीलिये, कुछ मूर्खता होगी, अव्यापारेषु व्यापार होगा, छोटी मोटी ही नहीं हिमालयकी-सी भी त्रुटियां रह जायेंगी, यह सब मानकर ही यह काम हाथमें लिया है ! अर्थात इस महाग्रंथमें जो त्रुटियां होंगी, भूलें होंगी, अशुद्धियां होंगी उसके लिये विद्वान लोग उदारतासे अनुवादकको क्षमा करनेकी कृपा करेंगे ऐसा विश्वास है !
इस क्षमा याचनाके बाद, ज्ञानेश्वरीके वृत्तके विषयमें एक दो बातें कहना अनुपयुक्त नहीं होगा । इस वेदांत-काव्यका छंद स्वाभाविक ही मराठीका अपना छंद है। ओवी और अभंग ये दो वृत्त मराठी संत-साहित्यका हृदय और मस्तिष्कसे हैं। ओवी छंदमें, जहां परमामृत, ज्ञानेश्वरी, अनुभवामृत, स्वानंद-लहरी, दास-बोध जैसे वेदांत काव्य ग्रंथ हे वहां कृष्ण चरित्रके अनेक प्रसंग, भागवत, रामायण, श्रीकृष्ण चरित्र, भारत जैसे चरित्र ग्रंथ भी हैं और कवियोंमें सर्वश्री मुकुंदराज, ज्ञानेश्वर, एकनाथ, श्रीकृष्णदयार्णव, रामदास और मुक्तेश्वर जैसे महान कवि हैं। ये सब काव्य प्रासादिक और विद्वन्मान्य हैं अभंग और ओवी इन दोनो छंदोंके विषयमें मराठीके अन्यान्य विद्वानोंने जो कुछ लिखा है उसका सार इतना ही है कि वैदिक अनुष्टुप छंदसे प्रेरणा लेकर इस छंदकी रचना की गयी है। ये दोनों अक्षर छंद हैं। अभंग और ओवी दोनोंका रूप एक है। कुछ विद्वानोंने लिखा है “ओवियोंकी मालिकाको अभंग कहते हैं।” ऐसे विधान उन दोनोंकी एक-रूपता बताते हैं इतना ही । किंतु वास्तविकता ऐसी नहीं है। “अभंग” शब्दके विषयमें संत नामदेवने कहां है “सम चरणमें अभंग । नहीं तान छंद-भंग।” “सम चरणमें” ये शब्द सूचक माने जाते हैं। जो वृंदावनके त्रिभंगी कन्हय्या की भांति बेढ पैरसे खडा न जोहोकर “समचरण” विठ्ठल-खडा है वह “अभंग-विठ्ठल” है। अभंगके साथ विठ्ठल शब्द जुडकर अभंग विठ्ठल बना । ऐसे विठ्ठल भक्ति परंपराका यह छंद “अभंग” है। साथ ही साथ “दो सोल्ह छंदोंके सम चरण पर खडा अभंग” । ऐसा इसका पहला भाग कहता है। किंतु किसी अभंग गायकने अक्षरोंको गिननेका प्रयास कभी नहीं किया है। अनेक संतोंके अभंगोका अध्ययन करके कुछ निरुद्योगी (!) विद्वानोंने मोटे तौर पर इसके कुछ प्रकार दिखायें हैं और उनको अलग अलग नाम भी दिये हैं। ज्ञानेश्वरको महाराष्ट्र जैसा माउली कहता है वैसे ज्ञानोबा भी कहता है और ज्ञानोबासे विनोबा तक आध्यात्मिक महाराष्ट्रने अपनी इस अभंग-वाणीको अक्षुण्ण रखा है। इस प्रकार यह छंद पारमार्थिक महाराष्ट्रके हृदयकमलका “अभंग” सुगंध है और ओवी इससे भी प्राचीन छंद है। ई. स. ११२९ में भी इसका दर्शन होता है। उस कालके एका ग्रंथमें इस छंदके विषयमे लिखा है कि -
पीसते कूटते ओवियां गाती हैं जो महाराष्ट्रमें ।
और स्वनामधन्य लोकमान्य तिलकजीके विषयमें कहा जाता है कि वे सदैव कहा करते थे “चक्की पर बैठते ही ओवियां अपने आप सूझती हैं!” ओवीके विषयमें कभी किसीने, कभी किसीने कुछ लक्षण लिखे हैं किंतु वे कभी सर्वमान्य नहीं हुए हैं। जैसे सोल्हवे शतमानके एक साहित्यिकने लिखा है “ओवीके पहले चरण छ से आठ अक्षरके हों और चौथा चरण चारसे छ अक्षरका।” किंतु ज्ञाने- श्वरीमें ही पहले तीन चरण छ से चौदह अक्षर तकके हैं। पहले तीन चरणमें अंतिम प्रास होता २१ ज्ञानेश्वर
है और चौथे चरणमें प्रास नहीं होता । इस ओवी छंदके मूलके विषयमें ऊपर कहा गया है कि वैदिक अनुष्टुप् छंदसे प्रेरणा लेकर इसका विकास किया गया है। किंतु कुछ विद्वानोंका कहना है कि यह कन्नड त्रिपदीका मराठी करण है पर कन्नड त्रिपदी छंद संभवतः वैदिक गायत्री छंदका कन्नडीकरण हो ! कुछ भी हो, ये दोनो छंद कहींसे आये हों, पर ये मराठी संत साहित्यके प्रकाशस्तंभ हैं ! महाराष्ट्रके शान और भक्तिके अमृतस्रोत हैं। महाराष्ट्र सारस्वतमें ओवियोंकी संख्या लाखोंसे गिननी होगी। साथ साथ प्रत्येक कविका एक न एक वैशिष्ट्य है। ओवी सुनते ही मराठी साहित्यका जानकार झट कह सकता है यह ओवी किसकी है इतना वह वैशिष्ट्य सु-स्पष्ट है। ओवियां जैसे ग्रंथस्थ हैं वैसे कुछ कंठस्थ भी हैं। विशेषतया गांवोंमें स्त्रियां या लडकियां, पीसते समय, कूटते समय, लडकियां झूले पर बैठ कर झूलते समय, मातायें बच्चोंको पालनेमें झुलाते समय, या गोदमें सुलाते समय ओवियां गाती हैं जो आज भी सुना जा सकता है। ये ओवियां तित- लियोंकी भांति बहुरंगी और क्षणिक उडती हुई रहती हैं। इनके विषय अनंत हैं। महाराष्ट्रका दैवत पांडुरंग और उस पांडुरंगके पगले संत तो इन ओवियोंका विशेष विषय है। साथ साथ अन्य देवी देवता भी इनका विषय बनता है। माता-पुत्रका प्रेम, भाई बहनका प्रेम, आदिका सुगंध लेकर ओवी तितली खूब उडती है। पति-पत्नीके बीच भी यह घुस कर उन्हे हंसा रुलाकर दो तन एक मन कर देती है। अर्थात ओवी छंद महाराष्ट्रीय जन जीवनकी माधुरी भी है जैसे महाराष्ट्रीय आध्य त्मिक अमृत सागरके अथांग तरंग हैं। इस दृष्टिसे ओवी छंदसे परिचित होना सही अर्थमें महा- राष्ट्रके हृदयसे परिचित होना है और ज्ञानदेवकी ओवियां तो विशेष कर। क्यों कि मराठी साहित्यके मर्मज्ञोंका कहना है मोरोपंतकी आर्या , ज्ञानेश्वरकी ओवियां और तुकारामके अभंग मराठी साहित्यकी निधि है। इसलिये ज्ञानेश्वरीके इस अनुवादका एक वैशिष्ट्य है जो इससे पहले हिंदीमें अनुवा- दित ज्ञानेश्वरीमें नहीं था। जो विशेषतायें हैं वे सब मूलकी देन हैं और त्रुटियां अनुवादककी अपनी, आशा है विद्वान् और साहित्यके मर्मज्ञ उदारता पूर्वक इसकी क्षमा करनेकी कृपा करेंगे ! बाबुराव कुमठेकर.
अकारादि क्रमसे ज्ञानेश्वरीकी विषय-सूची क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ कृतज्ञता के कुछ शब्द १ १ अक्रोध ६३६ ज्ञानेश्वर और ज्ञानेश्वरी ५ २ अक्षर पुरुषका वर्णन ६१५ ज्ञानेश्वरी विषयसूची २३ ३ अखंड सम चित्तता ४७९ अभ्यासार्थ विषय विश्लेषण ३७ ४ अगले अध्यायकी भूमिका १०५ ज्ञानेश्वरी ५ अज्ञान ३४७ १ अर्जुन-विषाद-योग १ ६ अज्ञानका रूप ५९७ २ सांख्य-योग ३२ ७ अज्ञानके लक्षण ६८४ ३ कर्म-योग ७६ ८ अज्ञानावृत्त प्रकाशही क्षेत्रज्ञ है ५६८ ४ ज्ञान-कर्म संन्यासयोग १०६ ५ कर्म-संन्यास-योग १३२ ९ अठारहवा अध्याय एकाध्यायी गीता है ७१७ ६ आत्म-संयमयोग १५२ ७ ज्ञानविज्ञानयोग २०० १० अदंभका विवेचन ३५७ ८ सातत्ययोग २२२ ११ अद्वैतमें क्रिया कर्म नहीं होता ९ समर्पणयोग २४९ किंतु भक्ति होती है ८१२ १० विभूति-चिंतनयोग २९८ १२ अद्रोह ६५२ ११ विश्व-रूप-दर्शनयोग ३३२ १३ अधिकार भेदसे उपदेश भिन्नता ७९ १२ भक्तियोग ४०५ १३ क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोग ४२९ १४ अध्यात्मज्ञानके बिना सब व्यर्थ ४९९ १४ गुणोत्कर्ष-गुण-निस्तारयोग ५३१ १५ पुरुषोत्तम दर्शनयोग ५७१ १५ अध्यात्मज्ञान ज्ञेय दर्शन ४८२ १६ देवासुर-संपद्विभाग-योग ६२५ १६ अनंत सूर्योंसे भी वह तेजस्वी रूप ३५३ १७ श्रद्धा-निरूपण-योग ६७० १८ सर्व-गीतार्थसंग्रह ईश्वर-प्रसाद-योग ७१० १७ अनहंकार ४७१ परिशिष्ट १८ अनन्य भक्तसे कहागया हृदयगूढ ८२९ १९ महारथियोंका परिचय १ २० कर्मयोगियोंका परिचय ४१ १९ अनादिसे ये दोनों मार्ग चले आये हैं ६४९ २१ विभूतियोंका परिचय ५५ २२ पौराणिक संदर्भ ८५ २० अनासक्त कर्मयोगीकी संन्यासावस्था ७९६ २३ विशेष शब्दोंका विशिष्ट अर्थ १०५ २४ कठिन शब्दकोश १९९ २१ अनासक्ति ४७९ २३
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ २२ अनिंदा ११७ ५१ अर्जुनके सात प्रश्न २२२ २३ अन्य अनेक ऊर्ध्व शाखाओंका ५२ अर्जुनको कृष्ण परब्रह्म विवेचन ५८७ होनेका भास ३११ २४ अन्य देवताओंसे पाये गये ५३ अर्जुनको विश्वरूप देखनेकी भोग नाशवंत होते हैं २१५ दिव्य दृष्टि दी ३३८ २५ अपने पथके शत्रुओंको ५४ अक्षोभ ६३९ जीतनेके बाद ८०६ ५५ अविचार ४९० २६ अपने भक्तके आलिंगनके लिये ५६ अविद्या सिंधु और स्वर्ग- दो हाथ कम पड़े ४२६ संसारसे मुक्तिकी प्रार्थना ४९० २७ अभय ३३१ ५७ अव्यक्त प्रकृतिका रूप ४३७ २८ अभिन्न शरणागतिसे सभी ५८ अव्यक्तोपासकसे व्यक्तो- मैं हो जाता हूँ ८३६ पासक भले ४१० २९ अभिमान ४८४ ५९ अव्यभिचारी भक्तिका विवेचन ५६६ ३० अभिमान ६४५ ६० अव्यभिचारी शत्रुतासे ३१ अभ्यास और वैराग्यसे भी मेरी प्राप्ति होती है २९० मन स्थिर होता है १९१ ६१ अशांति ४८५ ३२ अभ्यासकी महत्ता ४१८ ६२ अशास्त्रीय तामसिक श्रद्धा ६७८ ३३ अमानित्व ४४५ ६३ अशौच ४८६ ३४ अमानित्व ६४३ ६४ अहंकारके कारण अलग पड़ा ३५ अर्जुनका अद्वैतानुभव ३३० हुवा आत्मा अधिदैवत है २२५ ३६ अर्जुनका अनाड़ीपन ३९६ ६५ अहंकारका रूप ४५६ ३७ अर्जुनका किया हुवा ६६ अहंता छेदन ४१ विराट-स्तवन ३८२ ६७ अहम्ममताके भ्रमके ३८ अर्जुनका गंवारपन ३९५ कारण जन्म मरण २०७ ३९ अर्जुनका प्रत्युत्तर ३५ ६८ अहिंसा ६३५ ४० अर्जुनका भाग्य ८५६ ६९ अहिंसाका विवेचन ४४८ ४१ अर्जुनका महाभाग्य ३४७ ७० अहिंसा विवेचनमें वाग्विलासकी ४२ अर्जुनका संदेह १८० क्षमायाचना ४५६ ४३ अर्जुनका समरसैक्य २० ७१ आकारसे परे देखने पर ही ४४ अर्जुनकी आंतरिक द्विविधा ३३८ योगानुभव आता है २६१ ४५ अर्जुनकी उत्कट जिज्ञासा १६५ ७२ आचार्य वंदना ५२९ ४६ अर्जुनकी करुणा २० ७३ आचार्योपासना ४६० ४७ अर्जुनकी क्षमायाचना ३८२ ७४ आजके तूने विवस्वतसे ४८ अर्जुनकी प्रशंसा १६३ कैसे कहा १०९ ४९ अर्जुनकी मनोदशा ३२ ७५ आत्मज्ञका वर्णन १६० ५० अर्जुनकी-विभूति ७६ आत्मज्ञानका निश्चय न होने विस्तार-सुननेकी इच्छा ३१६ तक कर्म अनिवार्य है ७२३ ७७ आत्मज्ञानकी ले करवाल ५६२ ज्ञानेश्वरी २४
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ७८ आत्मरत कर्मसे कर्म-मुक्ति ८२ ३ स्वेच्छाचारी इह परमें शांति ७९ आत्मरत कर्मसे विकास और नहीं पाते हैं १६७ प्रकृतिरुंत्र कर्मसे विनाश ९६ ४ आहारका विविधरूप ५८० ८० आत्मरूपी गणेशवंदन ४२९ ५ इंद्रिय दमन ही इनको जीतनेका ८१ आत्मलक्ष्य ८३ उपाय है १०४ ८२ आत्मलीन ही कर्ममुक्त है ९० ६ इंद्रियनिग्रह ५७२ ८३ आत्मत्व प्राप्त पुरुष भी देहेंद्रियोंके ७ इंद्रिय विवेचन ४३८ साडसे क्लेश पाता है ७० ८ इंद्रियोंकी प्रबलता ६७ ८४ आत्महित और लोकहितार्थ कर्म ९१ ९ इंद्रियोंकी अंतर्मुख दृष्टिसे ८५ आत्मा और शरीरकी तुलना ईश्वरत्वका अनुभव होता है २५५ और संबंध ५२३ ११० इंद्रियोंसे सतत कर्म ८६ आत्मा कभी कर्ता नहीं होता ७४४ योगी अंतरंगमें निष्कर्म १५८ ८७ आत्माके एकत्वका विवेचन ५०९ ११ इच्छाका स्वरूप और द्वेष ४४० ८८ आत्मानात्म विचार ४३० १२ इनका जीवन सूत्र टूट चुका है ३७८ ८९ आत्मानात्म-विवेक जीववादी १३ इन दोनोंमेंसे तत्वता तुझे दृष्टिसे ४३२ कौन जानता है ? ४०७ ९० आत्मानात्म-साधनाका उपाय ५१० १४ इन सबसे अक्षरचैतन्य ९१ आत्मानात्म व्यवहारके भिन्न है २३७ राजहंस ५८७ १५ इस अभ्याससे मन निश्चल ९२ आत्मानुभवीका अमहंकारी बनता है १८४ देहभाव ७४६ १६ इस कर्म फलसे बढ़ता, नहीं ९३ आत्मा शरीरमें रह कर भी तो मुकता ७३३ न कुछ करता न लीपता ५२५ १७ इसका मूल रजोगुण है २०१ ९४ आयुर्वेदकी अहिंसा ४४८ १८ इसको अश्वत्थ क्यों कहते हैं ? ५८० ९५ आर्जव ६३४ १९ इसको महारुव कहते हैं ५६८ ९६ आसुरी गुणोंकी ओर संकेत ६४५ १२० इस गीता-ज्ञानकी परंपरा ८६५ ९७ आसुरी बर्तावसे अंतरात्माको २१ इस ज्ञानकी आदि परंपरा ८६६ दुःख ६६१ २२ इस ज्ञानसे मेरे समान ९८ आसुरी लोगोंके अभिमानका होते हैं ५३५ रूप ६५८ २३ इस दृश्यमान विश्वमें भी मैं ९९ आसुरी लोगोंके लिये ओतप्रोत भरा हूँ ५४१ ज्ञानेश्वरकी करुणा ६६४ २४ इस निश्चलताके सम्मुख दुःख १०० आसुरी वृत्ति चर्म-चेनुआ नहीं रहता १८४ आहार तोड़ती है ६५४ २५ इस अवधूतका फैलाव ५८३ १ आसुरी संपदाका वर्णन ६५० २६ इस योगकी प्राचीनता १०७ २ आसुरी संपदा विनाशक है ६४७ २७ इस लिये तू मेरे स्मरणपूर्वक युद्ध कर २२८ ३५ विषयसूचि
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ २८ इस लिये मेरे स्मरणका अभ्यास कर २३० ५३ अंतर्यामीका घात नहीं होता ४६ ५४ कठोरता ६४६ २९ इस लिये स्थितप्रज्ञ दक्ष रहता है ७२ ५५ कर्ता कारण और कर्म ७५४ ५६ कर्मका तिरस्कार और कर्म-फलमें आशा दोनों नहीं ११६ ३० इस लिये स्वधर्माचरण करना ९८ ५७ कर्मकी विविधताका विवेचन १३८ ३१ ईश्वर प्राप्तिके दो मार्ग ४०७ ५८ कर्म ज्ञान-फलका सुक्षेत्र कैसे होगा ७१५ ३२ ईश्वर शरणता ही शांतिका एकमेव साधन ८२० ५९ कर्म त्यागमें नैष्कर्म्यका दंभ ८२ ३३ ईश्वरार्पित कर्म सदैव पूर्ण है ६२ १६० कर्म नाशकी कर्मकुशलता ७८५ ३४ ईश्वरार्पित बुद्धिसे अनासक्त कर्म ५८ ६१ कर्म-प्रवृत्तिके बीजोंका विस्तृत विवेचन ७४१ ३५ ईश्वरार्पित साम्य-बुद्धि योगका सार है ६३ ६२ कर्म बुद्धि और धृतिका संबंध ७७८ ६३ कर्मयोग अधिक श्रेयस्कर १३३ ३६ उच्च स्थितिकी प्राप्तिके लिये अष्टांगयोगकी सीढियां १५६ ६४ कर्मयोगीका ब्रह्मयज्ञ १८० ६५ कर्मयोगीके लक्षण ११८ ३७ उठो और स्वधर्माचरणके लिये कर्म करो ९६ ६६ कर्मयोगीके विविधयज्ञ १२२ ६७ कर्मयोगीके विविध यज्ञोंकी तुलना १२४ ३८ उपहार लूटनेके किये यज्ञ ६६० ३९ उल्लसित अर्जुनका सेनावलोकन १८ ६८ कर्मरत रहकर कर्म-फल समर्पण ४१७ ४० उस चैतन्यकी व्यक्तव्यकता २४० ४१ उसे मैं अपना हृदय सिंहासन देता हूँ ८४४ ६९ कर्म सिद्धिका कारण अहंकार ७३९ १७० कर्म सिद्धिका कारण देह ७३८ ४२ ऊर्ध्वमूलका फल जाना ५८८ ७१ कर्म सिद्धिका कारण दैव ७४१ ४३ ऊर्ध्वमूल ब्रह्मका वर्णन ५७७ ७२ कर्मसिद्धिका कारण भिन्न भिन्न क्रिया ७४० ४४ एक श्लोकमें भारतका सार ८५७ ४५ एकही स्थान पर पहुंचनेवाले दो मार्ग १५५ ७३ कर्म सिद्धिके पांच कारण ७३७ ७४ कर्म सिद्धिके विविध कारण १७९ ४६ एकांतमें अरुचि जनसंघमें प्रीति ४९८ ७५ कर्माकर्म विवेचनमें ज्ञानी भी भ्रममें ११७ ४७ ऐसा यह अक्षरचैतन्य भक्तिसे स्पष्ट होता है २४१ ७६ कर्मातीत अवस्थामें कर्म-त्याग संभव ८१ ४८ ओं तत्सत् का दर्शन ७०१ ४९ ओंका महत्त्व ७०२ ७७ कवीकी नम्रता ६ ५० अंतःकरणका विवेचन ७५४ ७८ कवीकी नम्रता ८६१ ५१ अंतकालकी स्थितिका वर्णन २८७ ७९ कामक्रोधसे सदा सर्वत्र दूर ६६५ ५२ अंतर्मुख दृष्टिसे ज्ञान प्राप्त होता है ५३५ ८० काम प्रबोधनसे सदा कर्म-प्रवृत्ति ६६५ ज्ञानेश्वरी ३६
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ८१ कारण और हेतु मिलनसे ३ क्षराक्षर पुरुष विचार ६२३ कर्म निर्माण ७४२ ४ क्षात्रधर्म महत्ता ५३ ८२ कार्य और गुण करुणाकी महत्ता २५० ५ क्षेत्रके विषयमें सभी ८३ कालवादियोंकी दृष्टिसे अज्ञानमें हैं ४३५ आत्माभास विवेक ४३४ ६ ग्रंथ लेखनका स्थल काल ८७० ८४ किंतु जो मद्भूत है वह किसी ७ गजपति वंदन १ भी कार्यसे अद्भूत पाता है २४५ ८ गणेशरूप गुरु वंदन ६७० ८५ किंतु विश्वमें सकाम भक्त ही ९ गीता और वेदकी समानता ८३७ अधिक है २७९ २१० गीताकी फलश्रुति ८५५ ८६ कुटिलता ४८५ ११ गीताकी महानताका कथन ८१८ ८७ कुलाकुलका अज्ञान ६४० १२ गीताकी वह धरोहर श्रीगुरु ८८ कृष्णका उपदेश ३३ कृपाका फल है २९९ ८९ कृष्णकी बात धृतराष्ट्रसे कहते १३ गीता महिमावर्णन ८५८ समय संजयकी मनस्थिति २१६ १४ गीतारत्न प्रासादका १९० कृष्ण प्रश्नका वास्तविक रूप कलशाध्याय ७१२ समझता है ५६१ १५ गीता वेदका भी मूलसूत्र है ८३६ ९१ कृष्णार्जुनके अद्वय-भावका १६ गीता-साधनाका सारांशमें वर्णन ८५१ पुनःकथन ८२० ९२ कृष्णार्जुनके संवादमें संजयका १७ गुण-दोष दर्शन ४७४ लय होना ८५२ १८ गुण निसारका विवेचन ५५९ ९३ कृष्णार्जुन-गुरुशिष्य प्रेमका १९ गुणनिसारसे मोक्ष प्राप्त वर्णन ७३५ होता है ५५९ ९४ कृष्णार्जुन-प्रेमका वर्णन ७१६ २२० गुणनिसारका साधन ५६६ ९५ केवल अनन्य भक्तिसे वह २१ गुण-द्वंद्वोंका स्थान ५५६ मिलता है ४०१ २२ गुणातीतकी समवृत्ति ५६४ ९६ केवल अभक्त मुझ एक को २३ गुणातीत कैसे होता है ५६१ अनेक रूपसे देखते हैं ११३ २४ गुणोंके कल्लोलमें निर्लिप्त ९७ केवल शास्त्रीय भक्तिसे मेरी तृप्ति रहता है ५६१ नहीं होती है २८८ २५ गुणोंके जालमें निर्लिप्त निष्कंप ९८ कोई भाग्यवान ही विश्वकी रहता है ५६२ विविधतामें एकता देख २६ गुरुकी मधुरा भक्ति ४६३ सकता है ५१८ २७ गुरुकी मानसपूजा ४६२ ९९ कर्मयोगी सदैव मुझे भोगता २८ गुरुकी वात्सल्य भक्ति ४६२ रहता है ८१३ २९ गुरुकृपाकी महिमा ७ २०० क्रोध ३४६ २३० गुरुगृह वियोग ४६१ १ क्षत्रियॉंका स्वभाव-धर्म ७८५ ३१ गुरुचिंतन प्रसाद सेवन ४६३ २ क्षमा ६४१ ३२ गुरुजीवनसे संपूर्ण समरसता ४६४ २० विषयसूचि
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ३३ गुरु-द्रोह ४८६ ५७ जीवन कृतार्थ हुवा है आज ८१७ ३४ गुरुप्रसादकी सूचना ७ ५८ जीवनभर जो मेरी सेवा ३५ गुरुमुखसे श्रवण करनेके बाद ही करता है अंतकालमें मैं पवित्र ज्ञानका अनुभव २५२ उसकी सेवामें आता हूँ २३५ ३६ गुरुवंदन २ ५९ जीवन भोगके लिये है और ३७ चंचल मनको कैसे स्थिर सब झूठ है ६५२ किया जाय १९० २६० जीव मुझसे अभिन्न भिन्न है ५९० ३८ चतुर्भुज सौम्य रूप देखनेकी ६१ जीव स्व-सामर्थ्यसे परमा- कामना ३९३ त्माको नहीं जान सकता ३१५ ३९ चांचल्य ४८७ ६२ जो जिस क्षणसे भक्त बना २४० चातुर्वण्य प्राकृतिक गुणोंके उसी क्षणसे मेरा बना २८६ कारण हैं २१४ ६३ जो देख भकुला रहा त्रिकोक ३६२ ४१ चार प्रकारके मेरे भक्त २११ ६४ जो मेरा रूप जानते हैं वे ४२ चित्सूर्यरूपी श्रीगुरु वंदन ७१० मद्रूप होते हैं ११२ ४३ चित्सूर्य श्रीगुरु वंदन ६२७ ६५ जो मेरे पास आता है वही ४४ चेतनाका विवेचन ४४१ शुद्ध पुण्य है २७६ ४५ चैतन्य विश्वाकार कैसे ६६ जो वास्तविक हितका होता है दीखता है ६१९ वही इंद्रियोंको दुःख ४६ चौदहवे अध्यायकी भूमिका ५२५ दायक है १८४ ४७ छठे अध्यायकी भूमिका १५२ ६७ जो सदा सर्वत्र मुझे देखता है ४८ छठे अध्यायकी भूमिका रूप- वह संदेह मुक्त है २८५ योगमार्ग दर्शन १५० ६८ जो सदैव मेरा स्मरण करता ४९ जन्मजन्मांतरके सत्यवचन है वह सदैव मुक्त है २४४ फलका यह गीतार्थ ६२७ ६९ ज्ञान और योगाका समन्वय ५६७ २५० जब सर्वत्र मैं हूं तब अलग २७० ज्ञान कर्म कर्ता मी त्रिगुणसे भजन कैसे २७० घिरे है ७५५ ५१ जहां मैं नहीं ऐसा स्थान नहीं २७१ ७१ ज्ञानका लक्षण ऋजुता ४५९ ५२ जागृत कुंडलिनी शक्तिका कार्य ७२ ज्ञानका लक्षण शांति ४५८ विवेचन १७२ ७३ ज्ञानका विवेचन ८१६ ५३ जाते समय जीव इंद्रियोंके ७४ ज्ञानकी महानता १२६ साथ जाता है ६०२ ७५ ज्ञानकी महानता ४४३ ५४ जिसने अंतःसुख नहीं देखा वह ७६ ज्ञानके पास ये दुष्ट आ विषय सुखके पीछे पडता है १४४ बसते हैं १०३ ५५ जिसने यह जान लिया वह ७७ ज्ञानके लिये वैराग्य है ५७४ मुक्त है ५१० ७८ ज्ञानखड्ग १२९ ५६ जीर्ण आयुष्य नौकामें बैठकर ७९ ज्ञान देनेमें उदार प्रसन्न प्रभु २३३ मूर्खता २९३ २८० ज्ञानदेवका सगुण कृष्ण ४२८ ज्ञानेश्वरी २८
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ८१ ज्ञानपूर्वक जो स्वधर्माचरण १३ तभी जीवको ब्रह्म-स्वराज नहीं करते उनकी गति १०० मिलेगा १०४ ८२ ज्ञान प्राप्तिका उपाय ६२९ १४ तभी मैं उनको दंड देता हूँ ६६२ ८३ ज्ञान प्राप्तिका साधन १२५ १५ तमप्रधान मृत्युसमय २४५ ८४ ज्ञान प्राप्तिके बाद और १६ तमोगुणके लक्षण ५५६ कुछ पाना नहीं रहता ६२८ १७ तमोगुणीका स्वभावधर्म ५५३ ८५ ज्ञान मनुष्यके हृदयमें होता है ५३४ १८ तामस कर्ताके लक्षण ७६९ ८६ ज्ञानी अहिंसकका चलना ४५० १९ तामस कर्मका लक्षण ७६४ ८७ ज्ञानी अहिंसकका देखना ४५२ ३२० तामसिक आहारका विवेचन ६८३ ८८ ज्ञानी अहिंसकका बोलना ४५१ २१ तामसिक कर्म त्याग ७२५ ८९ ज्ञानी अहिंसककी कार्य प्रणाली ४५३ २२ तामसिक ज्ञानका विवेचन ७५८ २९० ज्ञानीकीबुद्धि इंद्रातीत होती है ७५० २३ तामसिक तप ६९३ ९१ ज्ञानीके अहिंसक मनका स्वरूप ४५४ २४ तामसिक दान ६९७ ९२ ज्ञानी ज्ञानसे मोक्ष पाता है ५७३ २५ तामसिक धृतिके लक्षण ७७७ ९३ ज्ञानी भक्तका महान अनुभव २१३ २६ तामसिक बुद्धिके लक्षण ७७५ ९४ ज्ञानी भक्त सदा सर्वत्र २७ तामसिक यज्ञका विवेचन ६८५ एको भावसे मुझे ही देखता है २६९ २८ तामसिक सुखका विवेचन ७८२ ९५ ज्ञानेश्वरका उपसंहार २४८ २९ तीन प्रकारके कर्मफल ७३१ ९६ ज्ञानेश्वरका देश भाषा प्रेम १५३ ३३० तीन प्रकारके सुखका विवेचन ७७९ ९७ ज्ञानेश्वरका पंथराज १६५ ३१ तीनों गुण, समय समय पर ९८ ज्ञानेश्वरका मातृभाषा प्रेम ३०१ बदलते हैं ५४९ ९९ ज्ञानेश्वरका राष्ट्र-प्रेम ८५६ ३२ तीनों गुणोंका परिणाम ५५५ ३०० ज्ञानेश्वरकी सहज वाक्स्फूर्ति ४८२ ३३ तीसरे पुरुषोत्तमका वर्णन ६१७ १ ज्ञानेश्वर कृत कृष्ण वर्णन १६५ ३४ तुम कौन हो प्रभु ३७६ २ ज्ञानेश्वर महाराजका विनय ६२४ ३५ तू इससे दूर रहकर मेरी ३ ज्ञानेश्वर स्तुति सुमन ८७१ भक्ति कर २९५ ४ ज्ञानेश्वर स्तुति सुमन ८७२ ३६ तू दैवी संपदाका स्वामी है ६४८ ५ ज्ञानेश्वरी ग्रंथके विषयमें ८६२ ३७ तेज २१ ६ ज्ञानेश्वरी ग्रंथ संशोधन वृत्तांत ८७१ ३८ तेन त्यक्तेन शेष प्रसाद सेवन ८७ ७ ज्ञेयका स्वरूप ३३ तेरहवे अध्यायका उपसंहार ५२८ ८ ज्ञेयकी पूर्वपीठिका ५०० ३४ तेरा दर्शन सब कुछ देता है ८४८ ९ तत्कारसे होनेवाले लाभ ७०३ ३५ तेरे तेजसे सारा विश्व ३१० तप ६३४ संतप्त है ३६१ ११ तपका स्वरूप ६८८ ३६ तेरे बिना कुछ भी न होनेसे १२ तब वह न रहनेकासा संदेह भी नहीं रहा ८४९ रहता है ८१४ ३७ तेरे मेरे अनेक जन्म मैं जानता हूं ११० २४ विषय सूचि
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ३८ तो कर्म करने क्यों कहता है ७६ ६५ धृतिका विवेचन ५४२ ३९ त्याग ६३८ ६६ धैर्य ६४२ ३४० त्याग और संन्यासका ६७ नमस्कार भक्तिसे सद्रूप अर्थैकत्व ७१७ होते हैं २६७ ४१ त्याग भी तीन प्रकारका ७२३ ६८ नष्ट होना शरीरका ४२ त्याग वृत्तिका रहस्य ७२१ स्वभाव ही है ४७ ४३ दंभ ४८४ ६९ नाशवंत वस्तुओंकी इच्छासे ४४ दंभ ६४४ आराधना करनेवाले ही ४५ दम ६३२ अधिक २१४ ४६ दया ६३८ ३७० नित्य नैमित्तिक कर्मोंका ४७ दर्प ६४५ विवेचन ७१९ ४८ दान ६३२ ७१ निरहंकार निष्काम कर्म कर ८३ ४९ दिनरात मेरा चिंतन करनेवाला ७२ निराकार योगमार्ग ४०७ भक्त मुझे जानता है ४०८ ७३ निराग्रह वृत्तिसे जीवनयापन ४१६ ३५० दीन अर्जुनकी अनन्य शरणता ३७ ७४ निर्मल देह पक्व फलकी भांति ५१ दूसरे अध्यायकी प्रस्तावना ३१ अलिप्त होता है ७९५ ५२ दृश्य और द्रष्टाका अद्वयभाव ३५४ ७५ निर्विशेष तेरा वंदन कैसे करूं? ७११ ५३ देहधारीको कर्म अनिवार्य ७३० ७६ निष्काम एकनिष्ठ भक्ति ४८० ५४ देहाभिमान ४८९ ७७ निष्काम कर्मयोगीकी ५५ देहाहंकार आत्मबोधमें लय महानता १४० होनेके बाद ७४७ ७८ निष्काम भक्तसे मैं अत्यंत ५६ दैवी गुणोंकी महानता ६४३ प्रेम करता हूँ ४८० ५७ दोनों सेनामें केवल पांडव ७९ निष्काम भावसे दिये गये ही बचेंगे ३७९ शुष्क भोजनका आनंद १५४ ५८ दो भक्तोंकी भेंट आनंद ३८० नैष्कर्म्यका अर्थ आलस्य नहीं १३४ महोत्सव है ३०९ ८१ नैष्कर्म्य भावका दर्शन १३९ ५९ द्वंद्वचिंता छोडकर ८२ पंद्रहवे अध्यायकी भूमिका ५७४ स्वचिंतन करना ८०० ८३ परं दृष्ट्वा निवर्तते ६७ ३६० द्वैत गुरु शिष्योंके संवादमें ८४ परमात्माका मनोगत ३७३ अद्वैतके परेका अनुभव ६११ ८५ परमात्माकी असामान्य ६१ द्वैतस्थितिमें जाकर गुरुशिष्य उदारता ३४१ संवाद ८४० ८६ परिवर्तन देहोंका होता है ४७ ६२ धर्म-रक्षणके लिये ८७ पार्थका प्रश्न, कर्म त्याग मेरा अवतार ११० या कर्म योग ? १३२ ६३ ध्यान देने पर आनंद सिंहासन ८८ पावित्र्य ४६६ पर चढ़ते हैं २१६ ८९ पितृरूपमें गुरु वंदन २४८ ६४ धृतराष्ट्रकी जडताका दर्शन ८५४ ज्ञानेश्वरी ३०
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ १९० पुण्यकी समाप्तिके बाद १४ ब्रह्मांडका पूर्ण रूप ५४० पुनः मृत्युलोक २७५ १५ ब्रह्मा, इंद्रादि भी पुनर्जन्मसे ९१ पुरुषोत्तमका विवेचन ६२० मुक्त नहीं २३७ ९२ प्रकृतिके आठ गुणोंकी १६ ब्राह्मणोंका स्वभाव धर्म ७८५ सहायतासे ब्रह्मांड निर्माण ५३९ १७ भक्त और भगवानका ९३ प्रकृतिके गुणोंसे सामर्थ्य ८६६ होनेवाला भास ७९३ १८ भक्तकी स्थिति गुण विकास ४१९ ९४ प्रकृतिके ये त्रिगुण १९ भक्तकी क्षमायाचना ४२४ सर्वव्यापी हैं ७८३ ४२० भक्त केवल मेरा प्रेम सुख ९५ प्रकृति प्रेरित कर्मयोग का चाहता है ३१० मौका ५१० २१ भक्त भय उद्वेग रहित ४२१ ९६ प्रकृतिवादियोंकी दृष्टिसे २२ भक्त मनोरथार्थे विश्वरूप बना ३६० आत्मनात्म विवेक ४३२ २३ भक्त मुझे अत्यधिक मधुर हैं ४२७ ९७ प्रभो तूने अपने हृदयका २४ भक्तिके अष्टसिद्धि भाव २९६ दर्शन दिया ३३६ २५ भक्तिपंथ सरल है ४१२ ९८ प्रत्येक कर्मके प्रथम २६ भगवानका हेतु अर्जुनका मोह ३६९ आयास होते हैं ७९४ २७ भगवानकी अनंत विभूतियोंकी ९९ प्रापंचिक ज्ञान विज्ञान है २०० कल्पना ३१८ ४०० फिर अपनेमें अपना रूप २८ भगवानकी उपाधिता ६१३ आप देखना ५९३ २९ भगवानकी प्रधान विभूतियां ३१९ १ बहिर्मुख मनको अंतर्मुख ४३० भवद्रुमका विस्तार ५७९ करनेकी साधना २३३ ३१ भवद्रुमका स्वरूप ५८० २ बावलकी भांति जो बनता ३२ भिन्न अस्तित्व रखकर और बिगडता है वह २२५ शरणागति ९३४ ३ बारहवे अध्यायकी भूमिका ४०४ ३३ भोगलीप्सा ४८६ ४ बुद्धिका लक्षण ४३७ ३४ भोगार्थ असीम आशा और वैर ६५५ ५ बुद्धिके तीन प्रकार ७७१ ३५ मदप्रिय ज्ञानी भक्त २११ ६ बुद्धिने जो स्वीकार किया ३६ मद्रूपका क्षणिक अनुभव ४१५ उसको देखनेकी इच्छा ३३४ ३७ मनका विवेचन ४३८ ४ बुद्धियोगका वज्र कवच ५७ ३८ मन-बुद्धि आदिका मुझमें लीन हो ८ ब्रह्म और योगका स्वरूप २३० जानेसे मद्रूप हो जाते हैं ४१४ ९ ब्रह्मतत्त्व सिद्धिका विवेचन ७९८ ३९ ममत्वसे भी भक्त मुझसे ४१० ब्रह्म-दर्शनकी कृतार्थता ५०४ मिलते हैं २९१ ११ ब्रह्म प्राप्तिके पथके ये शत्रु ८०४ ४४० महाभारतका वर्णन ३ १२ ब्रह्म-प्राप्तिके समयका विवेचन ८०७ ४१ मातृरूपसे गुरुवंदन ४०५ १३ ब्रह्मलीन होकर जो ४२ मानवके निःसीम स्थितिका नहीं लौटते ५९८ विवेचन १४८
५१ विषयसूचि
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ४३ मानसिक तप सात्त्विक ६९० ६४ मैं उनका हो जाता हूँ जो मेरी ४४ मार्दव ६३९ निष्काम भक्ति करता है २८१ ४५ मुझ पर अपार कृपा कर मेरी ६५ मैं केवल निमित्तमात्र हूँ ४६६ रक्षा की ३३७ ६६ मैं गुरुकी कठपुतली हूँ ७ ४६ मुझमें मिलनेके बाद कोई भिन्नता ६७ मैं तो आँखोंसे दीखता हूँ ३०२ नहीं रहती २९० ६८ मैं भक्तोंके कीर्तनमें रहता हूँ २६५ ४७ मुझसे निर्मित त्रिगुणोंने मुझे ६९ मैं सबका संहार करनेवाला ढक दिया २०७ काल हूँ ३७७ ४८ मुझे जाननेके लिये इंद्रियोंको ७० मैं सर्वत्र हूँ यह विश्व मेरा अंतर्मुख करो ३०४ विस्तार है २५४ ४९ मुझे जाननेवाला कोई एकाद ७१ मैं सर्वव्यापी हूँ ३०८ होता है २०१ ७२ मैं सर्वव्यापी हूँ किंतु २१६ ५० मुझे निष्काम प्रेम चाहिए २८२ ७३ मैं स्वयं कर्मरत हूँ ८२ ५१ मूर्ख लोग हृदयको छोड़ कर बाह्य ७४ मोक्षके लिये स्वधर्ममें आस्था सुखकी ओर दौड़ते हैं २५३ अनिवार्य है ७९२ ५२ मृत्युके समय असहाय स्थितिमें ७५ मोह आंधीमें फंसकर भगवद् स्मरण होगा क्या ? २३४ तामांधमें ६५९ ५३ मृत्युके समयकी पहली स्थिति ७६ मोहग्रस्त धृतराष्ट्रकी जिज्ञासा ८ चैतन्य प्रधान २४४ ७७ मौन छोड़ कर गुढ़ गुण वर्णनके ५४ मृत्यु समयकी दो स्थितियां २४२ लिये क्षमा ६२६ ५५ मेरा चित्त हो श्रीकृष्ण ७८ मौन भूषणादिसे गुरु पूजन ७१२ गुण-वर्णनमें समर्थ ४०६ ७९ यश ६२२ ५६ मेरा वह परम पद ५९७ ८० यज्ञके भी तीन प्रकार हैं ६८५ ५७ मेरी भक्ति करनेका अर्थ सब ८१ यज्ञादिके आदि लेनेका कुछ मुझे समर्पण करना २९५ मंगलनाम ७०० ५८ मेरी भक्तिमें कुल जाति आदिका ८२ यह अध्याय शांत और अद्भुत बंधन नहीं २८९ रसका प्रयागराज है ३३२ ५९ मेरे शुद्ध रूपमें कल्पनासे विश्व ८३ यह अनुपम ग्रंथरत्न है ६८८ उत्पन्न होता है २५५ ८४ यह नहीं करना चाहिए ८४१ ६० मेरे स्मरण पूर्वक जो शरीर ८५ यह गीता आत्मज्ञानकी लता है ६२२ छोड़ता है वह मद्रूप होता है २२८ ८६ यह नाम शुद्ध पर ब्रह्म है ७०६ ६१ मेरे भक्तोंसे जो यह गीता ८७ यह विज्ञान है २०२ कहेगा वह मद्रूप होगा ८६६ ८८ यह शब्द ब्रह्मका नवनीत ६३८ ६२ मैं अंधोंके हाथमें पड़ा ८९ यह सब मिथ्या स्फुरण है मोति-सा हूँ २६४ उस मैं का स्वरूप ८१५ ६३ मैं अकेला सबमें भरा हूँ ६०५ ९० यह सब मैं ही हूँ अविद्याके कारण भिन्न दीखता है २३६ ज्ञानेश्वरी ३२
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ९१ यह सुनकर अंधा धृतराष्ट्र १९ लोक क्षयके लिये आसुरी अंतःकरणसे भी अंधा रहा ३३१ लोगोंका जन्म है ६५३ ९२ यह स्थिति स्वयं प्राप्त ५२० लोक संग्रहार्थ कुशलता करनी होती है १५९ पूर्वक कर्म ९४ ९३ युद्ध परांगमुखता २३ २१ वर्ण व्यवस्थाके आधार भी ९४ युद्ध वर्णन ७ त्रिगुण हैं ७८३ ९५ ये सभी अध्याय मैने २२ वर्णानुसार सहज कर्म ही गुरु कृपासे गाये हैं २२६ अधिकार है ७८९ ९६ योग-ज्ञान व्यवस्था ६३२ २३ वह भाग्य अर्जुनको मिला जो ९७ योग साधनाका प्रारंभ और किसीको नहीं मिला ३९९ ऐसे करना १६८ २४ वही प्राज्ञ इस परमात्म-पदको ९८ योग साधनाका पाता है ५९५ स्थान ऐसा हो १६७ २५ वाणीका तप सात्त्विक ६८९ ९९ योग साधनाका विस्तार २६ वास्तविक अहिंसा ४५० और परिणाम १७१ २७ विजय गया अब दूर ५६९ ५०० योग साधनामें आसन १६८ २८ विदेहावस्था में किये गये १ योगाग्निसे सतत उपासना १२० मुक्त कर्म ७४८ २ योगी आत्म-धर्म आत्मामें और २९ विश्वमें प्रत्येक बातका उद्देश्य देह-धर्म देहमें देखता है ६०३ होता है ७४२ ३ रहो हृदयमें सदा ५३० विश्वरूपकी अद्भुतता ३५० अनुरक्त मेर ६८ ३१ विश्वरूपकी भयानकतासे ४ राजस दुःखका लक्षण ७८१ विह्वल सृष्टि ३५२ ५ राजस ज्ञानका विवेचन ७५७ ३२ विश्वरूपके प्रत्येक रोम-कूप ६ राजसिक आहारका विवेचन ६८२ जड़में एक सृष्टि ३४३ ७ राजसिक कर्ताके लक्षण ७६७ ३३ विश्वरूपके प्रत्येक रोम-कूपमें ८ राजसिक कर्मके लक्षण ७६२ रूप विविधता ३४४ ९ राजसिक कर्मत्याग ७२६ ३४ विश्वरूपके प्रत्येक रोम-कूपमें ५१० राजसिक तप ६९२ वर्ण विविधता ३४४ ११ राजसिक दान ६९६ ३५ विश्वरूपके संबंधमें अर्जुनकी १२ राजसिक धृतिके लक्षण ७७५ जिज्ञासा ३५७ १३ राजसिक बुद्धिके लक्षण ७७३ ३६ विश्वरूपमें अनेक देवताओंका १४ राजसिक यज्ञका विवेचन ५४५ दर्शन ३४५ १५ रजोगुणीके लक्षण ५४५ ३७ विश्वरूप विसर्जन ३९८ १६ रजोगुणीका स्वभाव धर्म ५५२ ३८ विश्व ही मेरा घर ऐसी भावना ४२५ १७ रोगसे असावधान ४१६ ३९ विषय विस्तारके लिये १८ लज्जा ३४० निवृत्तिनाथका उलाहना १४७ ३३ विषयसूचि (3)
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ५४० विषयीको आत्म सुख नहीं मिलता ६८ ६३ शौच ६४२ ४१ विषयोंका स्पष्टीकरण ४१९ ६४ श्रद्धाका विविध रूप ६७६ ४२ वृद्धावस्थासे अनजान ५१२ ६५ श्रद्धा भी तीन प्रकारकी ६७४ ४३ वेद आज्ञाके अनुसार कर्त्तव्य कर्म ६६७ ६६ श्रद्धा हीन कार्य कभी सफल नहीं होता ७०८ ४४ वेद वादियोंके वाग्जालमें नहीं आवो ५९ ६७ श्रीकृष्णका अर्जुन प्रेम ३३० ४५ वेदोंकी कृपणता और गीताकी उदारता ८३९ ६८ श्रीकृष्णका भक्त-प्रेम ३३५ ४६ वेदोंको भी अगम्य ब्रह्मपद २५२ ६९ श्रीकृष्णकी भक्तवत्सलता ३५२ ४७ वैभव पूर्ण पूजनसे मैं किसीका नहीं होता २८२ ५७० श्रीकृष्णद्वारा इंद्रिय निग्रहका निरूपण १८१ ४८ वैराग्य ४७२ ७१ श्रीगुरूका सामर्थ्य २१२ ४९ वैराग्य और अभ्याससे अज्ञा-नको दूरकरना अधियज्ञ २५७ ७२ श्रीगुरूकी अवर्णनीय महिमा २९९ ५५० वैराग्यका लाभ और श्रीगुरूका लोभ ७९९ ७३ श्रीगुरूकी मानस पूजा ५७१ ५१ वैश्य तथा शूद्रोंका स्वभाव धर्म ७८२ ७४ श्री गुरूको वंदन १५४ ५२ व्यवहारिक अहिंसा ४४९ ७५ श्री गुरु निवृत्तिनाथका आध्यात्मिक वर्णन २९८ ५३ शरणागतिका विवेचन ८३३ ७६ श्रीगुरु निवृत्तिनाथकी महिमा ८६२ ५४ शरीरके मूल-भूत छत्तीस तत्व ४३६ ७७ श्रीमद्भगवद्गीता महिमा ५ ५५ शरीरके विषयमें भिन्न भिन्न विचार ४३० ७८ श्रोताओंकी ओरसे वक्ताका यशोगान १६४ ५६ शरीर नाशवान है ९७ ७९ श्रोताओंको ज्ञानेश्वर महाराजका उद्बोधन १०६ ५७ शरीर-भाव रहित आत्मा अधियज्ञ २२७ ५८० श्रोताओंको नमन ६ ५८ शरीर है जितना आत्मज्ञानभी अपना- ६०० ८१ संकल्पवादियोंकी दृष्टिसे आत्मानात्म विवेक ४३३ ५९ शांति ६३७ ८२ संकल्प-शून्य मन चैतन्यमय हो सर्व-व्यापी होता है १३५ ५६० शारीरिक तप सात्विक ६२८ ८३ संघात और क्षेत्र विवेचन ४४२ ६१ शास्त्रपूर्वक श्रद्धापूर्वक पूजनेवाले लागोंकी गति ६७३ ८४ संतका पावन चरित ४२२ ६२ शास्त्रोक्त निष्काम कर्ममें आत्मज्ञान मिलता है ७९० ८५ संतजनोंसे कविकि विनय ३३३ ८६ संतोंको ही आत्म-दर्शनकी शक्यता है ४५ ८७ संदेह विनाशका घर १२६ ८८ संन्यासकी परिभाषा-काम्य कर्मका त्याग ७१८ ८९ संन्याससे मूल अविद्या नहीं रहती ७३४ ज्ञानेश्वरी ३४
क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ५९० संपूर्ण ब्रह्मांड ही विश्वरूपमें १४ सबको त्रिवेणी ज्ञानसुलभ हो भर गया ३४८ इसलिये देशी भाषामें ९१ संसारमें कुछ दुखी और कुछ यह घाट रचा ३३३ सुखी क्यों ? ५०७ १५ सभी अहंकारकी भूत ९२ संसार वृक्ष उन्मूलून चेष्टामें आते हैं २१० कैसे करना ? ५८८ १६ सभी प्रकारके मोहसे ९३ संसारवृक्षका पहला पल्लव ५७९ मुक्त मनुष्य २४७ ९४ संसारवृक्षका बीज और बड ५७७ १७ सभी साकार वस्तुओंमें ९५ संसारवृक्षकी कल्पना ५७५ ओतप्रोत अविनाशी हम २२४ ९६ सकल जन-जीवनका जीवन १८ सभी सुख दुख उसीमें लीन ७३ वैश्वानर मैं हूं ६०६ १९ सभी स्वभावके आधीन ८२४ ९७ सरकर्म तीर्थमें उज्वल होनेसे ६२० २० सम दृष्टिसे कर्म करना ७२९ सत्व-संशुद्धि होती है ७२४ २१ सम बुद्धिसे लड ५७ ९८ सत्भावसे होनेवाले लाभ ७०४ २२ समरस भक्तिकी अद्वयावस्था ८१७ ९९ सत्य ६३५ २३ समर्पणका रहस्य ८२१ ६०० सत्वको स्पष्ट करने रज तम २४ समर्पणका भाव ४६३ कहे गये हैं ६९८ २५ सरल बुद्धि जिज्ञासुके १ सत्वगुणके लक्षण ५४४ सम्मुख गुह्यका उद्घाटन २४२ २ सत्व रज तम इन तीन गुणोंके २६ सरल शब्दोंमें उपदेश दो ७७ कारण पुनर्जन्म ५४३ २७ सरस्वती वंदन २ ३ सत्व संशुद्धि ६३१ २८ सर्वत्र परमात्म दर्शनका ४ सत्वस्थका स्वभाव-धर्म ५५० सरल मार्ग १८४ ५ सदा विषय-सेवन ४९५ २९ सर्वत्र सभी तू ही तू भरा है २५६ ६ सन्मार्ग पर चलनेवालेकी कभी ६३० सर्वत्र सुखका वर्णन २७७ दुर्गति नहीं होती १९३ ३१ सर्वेंद्रिय मन वचन प्राणसे ७ सबका नाश करनेवाली मुझमें लीन हो ८३० दैवी शक्ति ३६९ ३२ स-संकोच विश्वरूप ८ सबका मूल आधार ५६९ दर्शनकी प्रार्थना ३३९ ९ सबके अज्ञानका कारण भी मैं ६०९ ३३ सहज नित्यत्व है अध्यात्म २२४ ६१० सबके लिये मेरा द्वार खुला है २१२ ३४ सातवे अध्यायका उप संहार २१९ ११ सबके हृदयमें जो आत्म ३५ सात्विक आहारका महत्व ६१८ स्फुरण है ६०८ ३६ सात्विक आहारका विवेचन ७५७ १२ सब कोई मुझसे ही ३७ सात्विक कर्ताके लक्षण ७६६ उत्पन्न हुए हैं ३०४ ३८ सात्विक कर्मके लक्षण ७६१ १३ सबको तेरे दांत पीस रहे हैं ३७३ ३९ सात्विक ज्ञानका विवेचन ७५७ ६४० सात्विक तप ६९३ ३५ विषयसूचि