भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ७८ आत्मरत कर्मसे कर्म-मुक्ति ८२ ३ स्वेच्छाचारी इह परमें शांति ७९ आत्मरत कर्मसे विकास और नहीं पाते हैं १६७ प्रकृतिरुंत्र कर्मसे विनाश ९६ ४ आहारका विविधरूप ५८० ८० आत्मरूपी गणेशवंदन ४२९ ५ इंद्रिय दमन ही इनको जीतनेका ८१ आत्मलक्ष्य ८३ उपाय है १०४ ८२ आत्मलीन ही कर्ममुक्त है ९० ६ इंद्रियनिग्रह ५७२ ८३ आत्मत्व प्राप्त पुरुष भी देहेंद्रियोंके ७ इंद्रिय विवेचन ४३८ साडसे क्लेश पाता है ७० ८ इंद्रियोंकी प्रबलता ६७ ८४ आत्महित और लोकहितार्थ कर्म ९१ ९ इंद्रियोंकी अंतर्मुख दृष्टिसे ८५ आत्मा और शरीरकी तुलना ईश्वरत्वका अनुभव होता है २५५ और संबंध ५२३ ११० इंद्रियोंसे सतत कर्म ८६ आत्मा कभी कर्ता नहीं होता ७४४ योगी अंतरंगमें निष्कर्म १५८ ८७ आत्माके एकत्वका विवेचन ५०९ ११ इच्छाका स्वरूप और द्वेष ४४० ८८ आत्मानात्म विचार ४३० १२ इनका जीवन सूत्र टूट चुका है ३७८ ८९ आत्मानात्म-विवेक जीववादी १३ इन दोनोंमेंसे तत्वता तुझे दृष्टिसे ४३२ कौन जानता है ? ४०७ ९० आत्मानात्म-साधनाका उपाय ५१० १४ इन सबसे अक्षरचैतन्य ९१ आत्मानात्म व्यवहारके भिन्न है २३७ राजहंस ५८७ १५ इस अभ्याससे मन निश्चल ९२ आत्मानुभवीका अमहंकारी बनता है १८४ देहभाव ७४६ १६ इस कर्म फलसे बढ़ता, नहीं ९३ आत्मा शरीरमें रह कर भी तो मुकता ७३३ न कुछ करता न लीपता ५२५ १७ इसका मूल रजोगुण है २०१ ९४ आयुर्वेदकी अहिंसा ४४८ १८ इसको अश्वत्थ क्यों कहते हैं ? ५८० ९५ आर्जव ६३४ १९ इसको महारुव कहते हैं ५६८ ९६ आसुरी गुणोंकी ओर संकेत ६४५ १२० इस गीता-ज्ञानकी परंपरा ८६५ ९७ आसुरी बर्तावसे अंतरात्माको २१ इस ज्ञानकी आदि परंपरा ८६६ दुःख ६६१ २२ इस ज्ञानसे मेरे समान ९८ आसुरी लोगोंके अभिमानका होते हैं ५३५ रूप ६५८ २३ इस दृश्यमान विश्वमें भी मैं ९९ आसुरी लोगोंके लिये ओतप्रोत भरा हूँ ५४१ ज्ञानेश्वरकी करुणा ६६४ २४ इस निश्चलताके सम्मुख दुःख १०० आसुरी वृत्ति चर्म-चेनुआ नहीं रहता १८४ आहार तोड़ती है ६५४ २५ इस अवधूतका फैलाव ५८३ १ आसुरी संपदाका वर्णन ६५० २६ इस योगकी प्राचीनता १०७ २ आसुरी संपदा विनाशक है ६४७ २७ इस लिये तू मेरे स्मरणपूर्वक युद्ध कर २२८ ३५ विषयसूचि