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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ २२ अनिंदा ११७ ५१ अर्जुनके सात प्रश्न २२२ २३ अन्य अनेक ऊर्ध्व शाखाओंका ५२ अर्जुनको कृष्ण परब्रह्म विवेचन ५८७ होनेका भास ३११ २४ अन्य देवताओंसे पाये गये ५३ अर्जुनको विश्वरूप देखनेकी भोग नाशवंत होते हैं २१५ दिव्य दृष्टि दी ३३८ २५ अपने पथके शत्रुओंको ५४ अक्षोभ ६३९ जीतनेके बाद ८०६ ५५ अविचार ४९० २६ अपने भक्तके आलिंगनके लिये ५६ अविद्या सिंधु और स्वर्ग- दो हाथ कम पड़े ४२६ संसारसे मुक्तिकी प्रार्थना ४९० २७ अभय ३३१ ५७ अव्यक्त प्रकृतिका रूप ४३७ २८ अभिन्न शरणागतिसे सभी ५८ अव्यक्तोपासकसे व्यक्तो- मैं हो जाता हूँ ८३६ पासक भले ४१० २९ अभिमान ४८४ ५९ अव्यभिचारी भक्तिका विवेचन ५६६ ३० अभिमान ६४५ ६० अव्यभिचारी शत्रुतासे ३१ अभ्यास और वैराग्यसे भी मेरी प्राप्ति होती है २९० मन स्थिर होता है १९१ ६१ अशांति ४८५ ३२ अभ्यासकी महत्ता ४१८ ६२ अशास्त्रीय तामसिक श्रद्धा ६७८ ३३ अमानित्व ४४५ ६३ अशौच ४८६ ३४ अमानित्व ६४३ ६४ अहंकारके कारण अलग पड़ा ३५ अर्जुनका अद्वैतानुभव ३३० हुवा आत्मा अधिदैवत है २२५ ३६ अर्जुनका अनाड़ीपन ३९६ ६५ अहंकारका रूप ४५६ ३७ अर्जुनका किया हुवा ६६ अहंता छेदन ४१ विराट-स्तवन ३८२ ६७ अहम्ममताके भ्रमके ३८ अर्जुनका गंवारपन ३९५ कारण जन्म मरण २०७ ३९ अर्जुनका प्रत्युत्तर ३५ ६८ अहिंसा ६३५ ४० अर्जुनका भाग्य ८५६ ६९ अहिंसाका विवेचन ४४८ ४१ अर्जुनका महाभाग्य ३४७ ७० अहिंसा विवेचनमें वाग्विलासकी ४२ अर्जुनका संदेह १८० क्षमायाचना ४५६ ४३ अर्जुनका समरसैक्य २० ७१ आकारसे परे देखने पर ही ४४ अर्जुनकी आंतरिक द्विविधा ३३८ योगानुभव आता है २६१ ४५ अर्जुनकी उत्कट जिज्ञासा १६५ ७२ आचार्य वंदना ५२९ ४६ अर्जुनकी करुणा २० ७३ आचार्योपासना ४६० ४७ अर्जुनकी क्षमायाचना ३८२ ७४ आजके तूने विवस्वतसे ४८ अर्जुनकी प्रशंसा १६३ कैसे कहा १०९ ४९ अर्जुनकी मनोदशा ३२ ७५ आत्मज्ञका वर्णन १६० ५० अर्जुनकी-विभूति ७६ आत्मज्ञानका निश्चय न होने विस्तार-सुननेकी इच्छा ३१६ तक कर्म अनिवार्य है ७२३ ७७ आत्मज्ञानकी ले करवाल ५६२ ज्ञानेश्वरी २४

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