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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ २८ इस लिये मेरे स्मरणका अभ्यास कर २३० ५३ अंतर्यामीका घात नहीं होता ४६ ५४ कठोरता ६४६ २९ इस लिये स्थितप्रज्ञ दक्ष रहता है ७२ ५५ कर्ता कारण और कर्म ७५४ ५६ कर्मका तिरस्कार और कर्म-फलमें आशा दोनों नहीं ११६ ३० इस लिये स्वधर्माचरण करना ९८ ५७ कर्मकी विविधताका विवेचन १३८ ३१ ईश्वर प्राप्तिके दो मार्ग ४०७ ५८ कर्म ज्ञान-फलका सुक्षेत्र कैसे होगा ७१५ ३२ ईश्वर शरणता ही शांतिका एकमेव साधन ८२० ५९ कर्म त्यागमें नैष्कर्म्यका दंभ ८२ ३३ ईश्वरार्पित कर्म सदैव पूर्ण है ६२ १६० कर्म नाशकी कर्मकुशलता ७८५ ३४ ईश्वरार्पित बुद्धिसे अनासक्त कर्म ५८ ६१ कर्म-प्रवृत्तिके बीजोंका विस्तृत विवेचन ७४१ ३५ ईश्वरार्पित साम्य-बुद्धि योगका सार है ६३ ६२ कर्म बुद्धि और धृतिका संबंध ७७८ ६३ कर्मयोग अधिक श्रेयस्कर १३३ ३६ उच्च स्थितिकी प्राप्तिके लिये अष्टांगयोगकी सीढियां १५६ ६४ कर्मयोगीका ब्रह्मयज्ञ १८० ६५ कर्मयोगीके लक्षण ११८ ३७ उठो और स्वधर्माचरणके लिये कर्म करो ९६ ६६ कर्मयोगीके विविधयज्ञ १२२ ६७ कर्मयोगीके विविध यज्ञोंकी तुलना १२४ ३८ उपहार लूटनेके किये यज्ञ ६६० ३९ उल्लसित अर्जुनका सेनावलोकन १८ ६८ कर्मरत रहकर कर्म-फल समर्पण ४१७ ४० उस चैतन्यकी व्यक्तव्यकता २४० ४१ उसे मैं अपना हृदय सिंहासन देता हूँ ८४४ ६९ कर्म सिद्धिका कारण अहंकार ७३९ १७० कर्म सिद्धिका कारण देह ७३८ ४२ ऊर्ध्वमूलका फल जाना ५८८ ७१ कर्म सिद्धिका कारण दैव ७४१ ४३ ऊर्ध्वमूल ब्रह्मका वर्णन ५७७ ७२ कर्मसिद्धिका कारण भिन्न भिन्न क्रिया ७४० ४४ एक श्लोकमें भारतका सार ८५७ ४५ एकही स्थान पर पहुंचनेवाले दो मार्ग १५५ ७३ कर्म सिद्धिके पांच कारण ७३७ ७४ कर्म सिद्धिके विविध कारण १७९ ४६ एकांतमें अरुचि जनसंघमें प्रीति ४९८ ७५ कर्माकर्म विवेचनमें ज्ञानी भी भ्रममें ११७ ४७ ऐसा यह अक्षरचैतन्य भक्तिसे स्पष्ट होता है २४१ ७६ कर्मातीत अवस्थामें कर्म-त्याग संभव ८१ ४८ ओं तत्सत् का दर्शन ७०१ ४९ ओंका महत्त्व ७०२ ७७ कवीकी नम्रता ६ ५० अंतःकरणका विवेचन ७५४ ७८ कवीकी नम्रता ८६१ ५१ अंतकालकी स्थितिका वर्णन २८७ ७९ कामक्रोधसे सदा सर्वत्र दूर ६६५ ५२ अंतर्मुख दृष्टिसे ज्ञान प्राप्त होता है ५३५ ८० काम प्रबोधनसे सदा कर्म-प्रवृत्ति ६६५ ज्ञानेश्वरी ३६

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