भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 47

क्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ८१ कारण और हेतु मिलनसे ३ क्षराक्षर पुरुष विचार ६२३ कर्म निर्माण ७४२ ४ क्षात्रधर्म महत्ता ५३ ८२ कार्य और गुण करुणाकी महत्ता २५० ५ क्षेत्रके विषयमें सभी ८३ कालवादियोंकी दृष्टिसे अज्ञानमें हैं ४३५ आत्माभास विवेक ४३४ ६ ग्रंथ लेखनका स्थल काल ८७० ८४ किंतु जो मद्भूत है वह किसी ७ गजपति वंदन १ भी कार्यसे अद्भूत पाता है २४५ ८ गणेशरूप गुरु वंदन ६७० ८५ किंतु विश्वमें सकाम भक्त ही ९ गीता और वेदकी समानता ८३७ अधिक है २७९ २१० गीताकी फलश्रुति ८५५ ८६ कुटिलता ४८५ ११ गीताकी महानताका कथन ८१८ ८७ कुलाकुलका अज्ञान ६४० १२ गीताकी वह धरोहर श्रीगुरु ८८ कृष्णका उपदेश ३३ कृपाका फल है २९९ ८९ कृष्णकी बात धृतराष्ट्रसे कहते १३ गीता महिमावर्णन ८५८ समय संजयकी मनस्थिति २१६ १४ गीतारत्न प्रासादका १९० कृष्ण प्रश्नका वास्तविक रूप कलशाध्याय ७१२ समझता है ५६१ १५ गीता वेदका भी मूलसूत्र है ८३६ ९१ कृष्णार्जुनके अद्वय-भावका १६ गीता-साधनाका सारांशमें वर्णन ८५१ पुनःकथन ८२० ९२ कृष्णार्जुनके संवादमें संजयका १७ गुण-दोष दर्शन ४७४ लय होना ८५२ १८ गुण निसारका विवेचन ५५९ ९३ कृष्णार्जुन-गुरुशिष्य प्रेमका १९ गुणनिसारसे मोक्ष प्राप्त वर्णन ७३५ होता है ५५९ ९४ कृष्णार्जुन-प्रेमका वर्णन ७१६ २२० गुणनिसारका साधन ५६६ ९५ केवल अनन्य भक्तिसे वह २१ गुण-द्वंद्वोंका स्थान ५५६ मिलता है ४०१ २२ गुणातीतकी समवृत्ति ५६४ ९६ केवल अभक्त मुझ एक को २३ गुणातीत कैसे होता है ५६१ अनेक रूपसे देखते हैं ११३ २४ गुणोंके कल्लोलमें निर्लिप्त ९७ केवल शास्त्रीय भक्तिसे मेरी तृप्ति रहता है ५६१ नहीं होती है २८८ २५ गुणोंके जालमें निर्लिप्त निष्कंप ९८ कोई भाग्यवान ही विश्वकी रहता है ५६२ विविधतामें एकता देख २६ गुरुकी मधुरा भक्ति ४६३ सकता है ५१८ २७ गुरुकी मानसपूजा ४६२ ९९ कर्मयोगी सदैव मुझे भोगता २८ गुरुकी वात्सल्य भक्ति ४६२ रहता है ८१३ २९ गुरुकृपाकी महिमा ७ २०० क्रोध ३४६ २३० गुरुगृह वियोग ४६१ १ क्षत्रियॉंका स्वभाव-धर्म ७८५ ३१ गुरुचिंतन प्रसाद सेवन ४६३ २ क्षमा ६४१ ३२ गुरुजीवनसे संपूर्ण समरसता ४६४ २० विषयसूचि

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