ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रमांक विषय पृष्ठ क्रमांक विषय पृष्ठ ३३ गुरु-द्रोह ४८६ ५७ जीवन कृतार्थ हुवा है आज ८१७ ३४ गुरुप्रसादकी सूचना ७ ५८ जीवनभर जो मेरी सेवा ३५ गुरुमुखसे श्रवण करनेके बाद ही करता है अंतकालमें मैं पवित्र ज्ञानका अनुभव २५२ उसकी सेवामें आता हूँ २३५ ३६ गुरुवंदन २ ५९ जीवन भोगके लिये है और ३७ चंचल मनको कैसे स्थिर सब झूठ है ६५२ किया जाय १९० २६० जीव मुझसे अभिन्न भिन्न है ५९० ३८ चतुर्भुज सौम्य रूप देखनेकी ६१ जीव स्व-सामर्थ्यसे परमा- कामना ३९३ त्माको नहीं जान सकता ३१५ ३९ चांचल्य ४८७ ६२ जो जिस क्षणसे भक्त बना २४० चातुर्वण्य प्राकृतिक गुणोंके उसी क्षणसे मेरा बना २८६ कारण हैं २१४ ६३ जो देख भकुला रहा त्रिकोक ३६२ ४१ चार प्रकारके मेरे भक्त २११ ६४ जो मेरा रूप जानते हैं वे ४२ चित्सूर्यरूपी श्रीगुरु वंदन ७१० मद्रूप होते हैं ११२ ४३ चित्सूर्य श्रीगुरु वंदन ६२७ ६५ जो मेरे पास आता है वही ४४ चेतनाका विवेचन ४४१ शुद्ध पुण्य है २७६ ४५ चैतन्य विश्वाकार कैसे ६६ जो वास्तविक हितका होता है दीखता है ६१९ वही इंद्रियोंको दुःख ४६ चौदहवे अध्यायकी भूमिका ५२५ दायक है १८४ ४७ छठे अध्यायकी भूमिका १५२ ६७ जो सदा सर्वत्र मुझे देखता है ४८ छठे अध्यायकी भूमिका रूप- वह संदेह मुक्त है २८५ योगमार्ग दर्शन १५० ६८ जो सदैव मेरा स्मरण करता ४९ जन्मजन्मांतरके सत्यवचन है वह सदैव मुक्त है २४४ फलका यह गीतार्थ ६२७ ६९ ज्ञान और योगाका समन्वय ५६७ २५० जब सर्वत्र मैं हूं तब अलग २७० ज्ञान कर्म कर्ता मी त्रिगुणसे भजन कैसे २७० घिरे है ७५५ ५१ जहां मैं नहीं ऐसा स्थान नहीं २७१ ७१ ज्ञानका लक्षण ऋजुता ४५९ ५२ जागृत कुंडलिनी शक्तिका कार्य ७२ ज्ञानका लक्षण शांति ४५८ विवेचन १७२ ७३ ज्ञानका विवेचन ८१६ ५३ जाते समय जीव इंद्रियोंके ७४ ज्ञानकी महानता १२६ साथ जाता है ६०२ ७५ ज्ञानकी महानता ४४३ ५४ जिसने अंतःसुख नहीं देखा वह ७६ ज्ञानके पास ये दुष्ट आ विषय सुखके पीछे पडता है १४४ बसते हैं १०३ ५५ जिसने यह जान लिया वह ७७ ज्ञानके लिये वैराग्य है ५७४ मुक्त है ५१० ७८ ज्ञानखड्ग १२९ ५६ जीर्ण आयुष्य नौकामें बैठकर ७९ ज्ञान देनेमें उदार प्रसन्न प्रभु २३३ मूर्खता २९३ २८० ज्ञानदेवका सगुण कृष्ण ४२८ ज्ञानेश्वरी २८