भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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बंबईके बडे न्यायालयमें १९३८ को वह स्थान ज्ञानेश्वर भक्तोंके हाथमें आया । न्यायालयके इस विषयक निर्णयमें न्यायमूर्तिने स्पष्ट रूपसे मान्य किया है “ज्ञानेश्वरने पैठणसे आलंदी आते समय नेवासाके शिवमंदिरमें ज्ञानेश्वरी कही और वह नेवासा गांवका कुलकर्णी सच्चिदानंद बाबाने लिखी ऐसा इतिहास कहता है !” और ज्ञानेश्वरीमें इसका उल्लेख है ।

९ ज्ञानेश्वरी-

संत ज्ञानेश्वर और उनके विषयमें कई वादोंका विचार करनेके बाद ज्ञानेश्वरीके विष- यमें भी कुछ लिखना आवश्यक है और ज्ञानेश्वर विषयक वादोंका संबंध अनुवादकके कार्यसे कुछ भी नहीं आ सकता किंतु.ज्ञानेश्वरी विषयक वादका अनुवादकके कार्यसे संबंध आता है । ज्ञानेश्वरी महाराष्ट्रका प्रसिद्धतम ग्रन्थ है । इस ग्रन्थके विषयमें सामान्यतया मराठी भाषा भाषी प्रत्येक मनुष्यके हृदयमें एक अभिमान और आदर भाव है, और महाराष्ट्रमें “सच्ची ज्ञानेश्वरी कौनसी ?” इस विषयमें आजकल विद्वानोंमें अत्यंत मतभेद है । महाराष्ट्रमें स्थान स्थानपर अब तक ज्ञानेश्वरीकी ३२ हस्त लिखित प्राचीन पांडुलिपियां प्राप्त हुई हैं । इनमें सबसे प्राचीन पांडुलिपि संभवतः शा. श. १५५१ की लिखी हुई है और अंतिम प्रति शा. श. १७८२ की है । इनमेंसे चार प्रतियां ज्ञानेश्वर महाराजके भक्त मंडलके मठोंमेंसे प्राप्त हैं । तथा १२ देशके भिन्न भिन्न अनुसंधान संस्थानोंसे मिली हैं । अन्य व्यक्तिगत संग्रहकी है । इन ३२ ग्रन्थोंमें कमसे कम ओवियां ८९३२ हैं और अधिकसे अधिक ९५३५ हैं । स्थान स्थानपर अनेक पाठभेद हैं । गीताके श्लोकोंके साथ ओवियोंका अर्थ मेल न खासके इतना ओवियोंके स्थानांतर भी हुए हैं। इन सब पांडुलिपियोंको देख कर इनका संशोधन कर एक ग्रन्थ तैयार करना है । किंतु इसमें वादका विषय दूसरा ही है और वह कुछ हदतक भावात्मक है । इसके लिये. ज्ञानेश्वरीकी अध्ययन परंपराका इतिहास देखना आवश्यक-सा है । ज्ञानेश्वर महाराजने शा. श. १२१२ में-इ. स. १२९०-अपने ज्ञानेश्वरीप्रवचन समाप्त किये और कुछ वर्षोंमें महाराष्ट्र पर उत्तरसे मुस्लीम आक्रमण हुवा । इस आक्रमणकी तीव्रता ई. स. के १६ वे सदीमें कुछ कम हुई और ज्ञानेश्वरी ग्रंथकी ओर सामूहिक दृष्टिसे महाराष्ट्रका ध्यान गया । उस समय तक स्थान स्थान पर व्यक्तिगत रूपमें ज्ञानेश्वरीका पाठ आदि होता हीं होगा । संत नाम- देवके अनेक अभंगोंपर ज्ञानेश्वरीका प्रत्यक्ष प्रभाव दीखता है । कहीं कहीं तो ज्ञानेश्वरीके शब्दोंमें नामदेवने अपने अभंग गाये हैं । ई. स. १३५० तक नामदेवने इस तरह ज्ञानेश्वरीका प्रचार किया है और उन्होंने उत्तरमें भारतभर सर्वत्र भ्रमण किया है । उसके बादके साहित्यपर ज्ञानेश्वरीका ऐसा कोई प्रभाव नहीं दीखता । नामदेव ज्ञानेश्वरके करीब दो सौ वर्षके बाद, महाराष्ट्रमें और एक महान संत-पुरुषका जन्म हुवा और वे हैं संत एकनाथ महाराज । संत एकनाथ विद्वान थे । संस्कृतका भी अच्छा खास अध्ययन था । श्रीजनार्दन स्वामीके शिष्य। श्रीजनार्दन स्वामी विद्वान और अधिकार संपन्न श्रीगुरु । महाराष्ट्रमें यह श्रद्धा है कि स्वयं दत्तात्रेयसे उन्हे अकर्तात्मक बोधका रहस्य प्राप्त हुवा था और इन्ही श्री जनार्दनस्वामीके श्रीमुखसे एकनाथ महाराजने ज्ञानेश्वरी सुनी है । एकनाथ महाराज छ वर्षतक श्रीजनार्दन स्वामीके श्रीचरणोंमें रहकर आत्मबोध प्राप्त करनेके बाद वहांसे घर आये । ज्ञानेश्वर महाराजकी भांति एकनाथ महाराजका जीवन भी महाराष्ट्रको परम पावन है । एकनाथ महाराजके भागवतपर ज्ञानेश्वरीका अत्यधिक प्रभाव है । एकनाथ महाराजके साहित्यिक कार्यको ही देखा जाय तो उन्हे मराठी भाषाका व्यास कहा जा सकता है । उनकी करीब १ लाख ओवियां हैं ! उसके अलावा अभंग और भारूड

ज्ञानेश्वरी १६